कम बारिश के कारण यूपी, बिहार और झारखंड में सूखे का संकट
इस साल बरसात के तीन महीने बीत गए, पर पूर्वी राज्यों में एक दिन भी ढंग की वर्षा नहीं हुई है। पूर्वी राज्य अर्थात बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में इसका असर धान की खेती पर पड़ा है। धान की रोपाई कम होने से इसका असर धान की पैदावार पर होगा क्योंकि यही तीनों राज्य देश में धान के पैदावार वाले मुख्य राज्य हैं।

वर्षा की कमी की वजह से होने वाले संकट का मुकाबला करने के लिए किसानों को मक्का, अरहर व दूसरे मोटे अनाज लगाने की सलाह दी जा रही है। धान की फसल में कमी को मोटे अनाज की पैदावार से कुछ सीमा तक थामा जा सकता है। बिहार के पूर्वी हिस्से में मक्के की खेती बड़े पैमाने पर होती है। लेकिन धान की उपज नहीं होने पर इनसे कितनी मदद मिल पाएगी, यह तो समय ही बताएगा। धान की उपज कम होने पर चावल आयात करने की नौबत भी आ सकती है क्योंकि चावल इस इलाके का मुख्य भोजन है।
भारत में मानसून के आंकड़े 1901 से रखे जा रहे हैं, तब से पहली बार ऐसा हुआ है कि झारखंड और उत्तर प्रदेश में इतनी कम वर्षा हुई है। इस साल झारखंड में एक जून से 14 अगस्त के बीच 395.8 मिलीमीटर वर्षा हुई है, जो सामान्य से 39 प्रतिशत कम है। दो जिलों-चतरा और जामतारा में किसी भी सप्ताह सामान्य वर्षा नहीं हुई। वर्षा में सर्वाधिक कमी पाकुड़ (72 प्रतिशत), साहेबगंज (70 प्रतिशत), जामताडा (69 प्रतिशत), गिरिडीह (66 प्रतिशत), चतरा (60 प्रतिशत), गढ़वा (57 प्रतिशत), देवघर (56 प्रतिशत), दुमका (52 प्रतिशत) और पलामू (51 प्रतिशत) जिलों में रही है। जलाशयों के लिहाज से देखें तो छह मुख्य जलाशयों में दस वर्षों के औसत के मुकाबले इस वर्ष 11 अगस्त को केवल 30 प्रतिशत जल मौजूद था। इन जलाशयों में पिछले साल इस समय 78 प्रतिशत पानी भरा था।
उत्तर प्रदेश में 14 अगस्त तक 263 मिलीमीटर वर्षा रिकार्ड की गई जो सामान्य से 44 प्रतिशत कम है। उत्तर प्रदेश इस वर्ष सबसे कम वर्षा वाला प्रदेश बना हुआ है। सर्वाधिक पीडित जिले फरुखाबाद (79 प्रतिशत), जौनपुर, गाजियाबाद, गौतमबुध्द नगर (72 प्रतिशत), कानपुर देहात व कुशीनगर ( 71 प्रतिशत), रामपुर (70 प्रतिशत) मऊ (69 प्रतिशत), बागपत (65 प्रतिशत), ज्योतिबा फुले नगर और चंदौली ( 64 प्रतिशत), गोंडा व बहराइच (63 प्रतिशत), बलिया (62 प्रतिशत), कौशांबी (61 प्रतिशत), बस्ती (60 प्रतिशत), अमेठी (58 प्रतिशत) और अयोध्या (53 प्रतिशत) हैं। 14 अगस्त तक राज्य के आठ प्रमुख जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का केवल 28 प्रतिशत पानी भरा था। पिछले साल इस समय इनमें कुल क्षमता का 53 प्रतिशत पानी भरा था।
बिहार में इस मौसम में आमतौर पर बाढ़ आई होती है। इस साल ऐसी स्थिति नहीं है। वर्षा में 39 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है। यही नहीं, नहरों में पानी नहीं है, जलाशय खुद प्यासे हैं। इसका सीधा असर धान की खेती पर पड़ा है। बहुत बड़े इलाके में रोपनी भी नहीं हुई। जहां नलकूप आदि की सहायता से रोपनी हो गई है, वहां भी वर्षा नहीं होने से फसल सूख जाने की आशंका है।
आंकड़ों के लिहाज से इस वर्ष अभी तक पिछले साल के मुकाबले आधे से भी कम वर्षा हुई है। यह वर्षा भी छिटपुट हुई है। खेतों में पानी इकट्ठा होने वाली वर्षा कभी नहीं हुई। इसलिए केवल वर्षा के आधार पर धान की रोपाई कहीं नहीं हो पाई। वही लोग रोपाई कर पाए जिनके पास नलकूप की सुविधा उपलब्ध है या किसी छोटी नदी की धारा पास से गुजरती है। लेकिन वर्षा नहीं होने से उनकी फसल के भी नष्ट हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
कृषि विभाग से जारी धान की रोपाई के आंकड़ों के अनुसार राज्य में केवल 35 प्रतिशत रोपाई हुई है। हालत यह है कि 14 जिलों में पांच प्रतिशत से भी कम धान की रोपाई हुई है। केवल पश्चिम चंपारण और पूर्णिया में 81 प्रतिशत रोपाई हो सकी है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम चंपारण व पूर्णिया राज्य के उत्तरी छोर पर हैं और दोनों जिलों में पहाड़ी नदियों का जाल सा है। लोगों ने पंपसेट से नदी से पानी निकालकर रोपाई कर ली है, पर वर्षा नहीं होने से उन जिलों में भी धान की फसल पर संकट है। कृषि विभाग के अनुसार, इस वर्ष धान की रोपाई का लक्ष्य 35 लाख 12 हजार हेक्टेयर था, जबकि रोपाई महज सात लाख हेक्टेयर से कुछ अधिक इलाके में हो सकी है।
धान की खेती के मामले में नलकूपों से भी अधिक मदद नहीं मिल पाती। वैसे सरकारी नलकूप जर्जर हालत में हैं। दो तिहाई से ज्यादा नलकूप खराब पड़े हैं। इस समय बिहार में 10,240 नलकूप हैं जिनमें से केवल 3800 ही ठीक ठाक हालत में हैं। 6440 खराब पड़े हैं। इनमें भी 300 से ज्यादा नलकूप केवल नाम के रह गए हैं। वे नेशनल हाईवे में चले गए हैं या नदी की धारा में बह गए हैं। इन्हें सरकारी रिकार्ड से हटा देने की कार्रवाई चल रही है। जो नलकूप काम चलाऊ हालत में हैं, उनसे करीब 1लाख 14 हजार हेक्टेयर में खेती के लिए पानी मिल पा रहा है। जबकि उनसे आमतौर पर 3 लाख हेक्टेयर में पानी मिलना चाहिए था।
यही हालत नहरों की है। अधिकतर नहरों से पानी गायब है। जिनमें पानी है भी तो पानी नहर के अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पा रहा। राज्य की तीन नहर प्रणालियों- सोन, गंडक व कोसी के अलावा उत्तर कोयल नहर प्रणाली की हालत बेहद खराब है। राज्य में लगभग 36 हजार किलोमीटर नहरों का संजाल है। इनमें से आधी तो एकदम सूखी हैं क्योंकि उनसे संबंधित जलाशयों में पानी नहीं है। इनमें सोन व गंडक नहरों से कुछ इलाके में थोड़ा-बहुत लाभ मिलता भी है लेकिन वैशाली, जहानाबाद, अरवल आदि जिलों में नहरों में धूल उड़ रही है।
भोजपुर जिले में इंद्रपुरी बराज में दो दशकों में पहली बार इतना अधिक जल संकट उत्पन्न हुआ है। जिले के आरा मुख्य नहर को भी पानी नहीं मिल पा रहा है। दुर्गावती जलाशय से भी काफी कम पानी मिल पा रहा है। गंडक नहर के कमान क्षेत्र में गोपालगंज व छपरा जिले में नहरों की हालत खराब है। कुछ इलाकों में सरकार ने नहरों में बारी बारी से पानी छोड़ने की व्यवस्था लागू की है।
राज्य में छोटे-बड़े 23 जलाशय हैं, उनमें भी पानी नहीं है। केवल एक जलाशय बदुआ में 51 प्रतिशत पानी है। पांच जलाशय पूरी तरह सूख गए हैं। चार जलाशयों में पांच प्रतिशत पानी है। बदुआ को छोड़कर सभी जलाशयों में भराव क्षमता का आधा से कम पानी है। जलाशय की यह हालत कभी नहीं हुई। पिछले तीन साल में यह सबसे खराब स्थिति है।
कुल मिलाकर वर्षा नहीं होने से बिहार में सुखाड़ के हालात है। अगर तत्काल वर्षा नहीं हुई तो अकाल जैसे हालात भी उत्पन्न हो सकते हैं। वर्षा की कमी होने से नदियों में भी पर्याप्त पानी नहीं है। कोशी को छोड़कर सभी छोटी-बड़ी नदियां खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं। कोशी में भी केवल सुपौल में पानी खतरे के निशान से कुछ उपर है। बिहार ही नहीं, नेपाल तराई की ज्यादातर नदियों में पानी कम है।
कुल मिलाकर जब से मानसून के अंकड़े रखे जा रहे हैं, इस साल जुलाई महीने में पूर्वी व उत्तर पूर्वी प्रदेशों में सबसे कम वर्षा हुई है। यह कमी 45 प्रतिशत तक है। पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मणिपुर भी वर्षा की कमी वाले प्रदेशों में हैं। भारतीय मौसम विभाग, पुणे में क्लाइमेट रीसर्च डिविजन के प्रमुख पुलक गुहा ठाकुरता के अनुसार, इस वर्ष बरसात में बंगाल की खाड़ी में केवल तीन निम्न दबाव प्रणाली विकसित हुई, उनमें से किसी की गति बिहार, उत्तर प्रदेश व झारखंड की दिशा में नहीं हुई। सभी ओड़ीसा के तटों से टकराकर समाप्त हो गई। वर्षा में बड़े पैमाने पर कमी का यही कारण है। इसके अलावा पूर्व-पश्चिम निम्न दबाव मानसून टर्फ अपनी सामान्य स्थिति से दक्षिण की ओर ही रह गई। अब देखना ये है कि राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार सूखे की इस संभावित स्थिति से कैसे निपटते हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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