इंडिया गेट से: कांग्रेस क्यों नहीं चाहती कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा बने?
कांग्रेस अपनी जड़ों में कैसे मठ्ठा डालती है इसका ताज़ा सबूत उस समय मिला जब उसने जम्मू कश्मीर में रह रहे सभी भारतीय मतदाताओं को विधानसभा चुनाव में वोटिंग के अधिकार का विरोध किया। कांग्रेस के नेता पता नहीं किस दुनिया में रह रहे हैं, वे अभी भी 370 वाली स्थिति से उबर नहीं पाए हैं।

यह तो आपको याद ही होगा कि तीन साल पहले जब लोकसभा में अनुच्छेद 370 में मिले जम्मू कश्मीर के विशेषाधिकार को खत्म करने का एलान किया जा रहा था तो कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने क्या कहा था। उन्होंने संसद में खड़े हो कर कह दिया था कि "कश्मीर पाकिस्तान के साथ डिस्प्यूट का मामला है, यह मामला संयुक्त राष्ट्र में भी है, इसलिए भारत 370 हटाकर कश्मीर की स्थिति में बदलाव नहीं कर सकता।" तब क्योंकि सारे देश में कांग्रेस की छीछालेदर हुई थी, तो कांग्रेस ने अधीर रंजन का बचाव नहीं किया था।
लेकिन अधीर रंजन ने जो भी कहा था, वह अपने मन से नहीं कहा था। इसके दो प्रमाण आप के सामने रख रहा हूँ। पहला वही लाइन कांग्रेस के बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने पिछले साल यह बयान देकर दोहराई कि कांग्रेस सत्ता में आई तो अनुच्छेद 370 में मिले जम्मू कश्मीर के विशेषाधिकार को वापस बहाल करेगी। अब कांग्रेस ने कहा है कि वह जम्मू कश्मीर में रह रहे सभी भारतीय मतदाताओं को वोट का अधिकार देने के चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। अब इससे साफ़ हो गया है कि कांग्रेस अब भी वह कश्मीर का भारत में पूरी तरह विलय होने देना नहीं चाहती।
वैसे तो यह होना ही था कि 370 हटने के बाद कश्मीर में रह रहे हर व्यक्ति को वोट का अधिकार मिले। जैसा कि सारे भारत में यही नियम लागू है कि जो जहां रह रहा है, वह वहां का वोटर बन सकता है। लेकिन वह दो जगहों पर वोटर नहीं बन सकता। यह तो सबको पता था कि पंजाब से लाकर जम्मू कश्मीर में बसाए गए सफाई कर्मचारियों और बंटवारे के समय पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से आ कर बसे शरणार्थियों को तो वोट का अधिकार मिलेगा ही। इन दोनों वर्ग के नागरिकों को लोकसभा में वोट डालने का अधिकार था, लेकिन राज्य पर अब तक काबिज रहे नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने इन नागरिकों को न विधानसभा में वोट डालने का अधिकार दिया था, न चुनाव लड़ने का। वे 75 साल से दोयम दर्जे के नागरिक बने हुए थे।
अनुच्छेद 370 में मिले जम्मू कश्मीर के विशेषाधिकार की वकालत करने वाली कांग्रेस और बाकी राष्ट्रीय दलों ने भारतीय नागरिकों को वोट का अधिकार नहीं दिए जाने पर कभी सवाल नहीं उठाया था। इनमें नागरिक अधिकारों की वकालत करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल है। सफाई कर्मचारियों के साथ 75 साल तक इससे भी ज्यादा नाइंसाफी हुई। राज्य विधानसभा से प्रस्ताव पास करके सफाई कर्मचारियों के बच्चों को राज्य की नौकरियों से वंचित कर दिया गया था। उनके बच्चे भले ही पीएचडी कर लें, उन्हें जम्मू कश्मीर में रहना है तो सफाई कर्मचारी ही बनना पड़ेगा।
अब जबकि विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन हो चुका है और अगले साल विधानसभा के चुनाव करवाने की तैयारी चल रही है तो जम्मू-कश्मीर के मुख्य निर्वाचन अधिकारी हृदेश कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से आ कर बसे नागरिकों, सफाई कर्मचारियों के साथ साथ दूसरे राज्यों के जो लोग यहां रह रहे हैं, वे भी अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल करवाकर वोट डाल सकते हैं। इसके लिए उन्हें मूल निवासी प्रमाण पत्र की कोई जरूरत नहीं है। दूसरे राज्यों के नागरिक जो केन्द्रीय सेवाओं में काम कर रहे हैं, वे सभी और सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षाबलों के जवान भी वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करा सकते हैं।
मतलब, जो भी 1 अक्टूबर 2022 तक 18 साल का हो जाएगा, वो अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा सकता है। फाइनल वोटर लिस्ट 25 नवंबर को जारी होगी जिसमें 20 से 25 लाख नए वोटर शामिल हो सकते हैं। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी को ऐसी आशंका कतई नहीं थी, इसलिए जैसे ही चुनाव आयोग से घोषणा हुई, इन दोनों दलों और अन्य क्षेत्रीय दलों में खलबली मच गई। फारुख अब्दुला ने तुरंत गुप्कार एलायंस की मीटिंग बुलाकर राज्य में रह रहे बाहरी लोगों को वोट का अधिकार दिए जाने का विरोध किया।
इस मीटिंग की खास बात ये रही कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी बैठक में शामिल हुई और बाहरी लोगों को वोटर बनाए जाने का विरोध किया। इस तरह भाजपा का साथ छोड़ने के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने बाला साहेब ठाकरे की कश्मीर नीति को भी छोड़ दिया। इस सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस, जनता दल (यू), एएनसी, भाकपा, माकपा और अकाली दल भी शामिल हुए। फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि बाहरी लोगों को मतदान के अधिकार के निर्णय को किसी भी हालत में मंजूर नहीं करेंगे। केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के इस कदम का विरोध करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
उनकी आशंका तो जायज ही है कि गैर जम्मू-कश्मीर वासियों को मतदान के अधिकार का नतीजा यह होगा कि कल विधानसभा बाहरी लोगों के हाथों में होगी। अब्दुल्ला ने कहा कि यह फैसला जम्मू कश्मीर की पूरी आबादी की पहचान को बर्बाद कर देगा। आबादी की पहचान यानी मुस्लिम स्टेट। अब उनसे कोई पूछे कि जब जम्मू कश्मीर के गुलाम नबी आज़ाद ने महाराष्ट्र की वासिम लोकसभा सीट और मुफ्ती मोहम्मद सईद ने यूपी की मुजफ्फरनगर सीट से चुनाव लड़ा तो इन राज्यों के लोगों ने तो नहीं कहा कि वे यहाँ आ कर कैसे वोटर बने और कैसे चुनाव लड रहे हैं? बल्कि दोनों क्षेत्रों की जनता ने उन्हें लोकसभा में भी भेजा। गुलाम नबी को तो महाराष्ट्र ने दो बार राज्यसभा में भी भेजा।
कांग्रेस और माकपा ने राज्य में रह रहे सभी नागरिकों को वोट का अधिकार दिए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह कर खुद को पूरी तरह एक्सपोज कर लिया है। कांग्रेस की जम्मू-कश्मीर प्रभारी रजनी पाटिल और माकपा के नेता एम. वाई तारिगामी का इस संबंध में बयान आया है। असल में इन सभी दलों को अब यह लगने लगा है कि बाहरी वोटरों के बूते भारतीय जनता पार्टी जम्मू कश्मीर में अगली सरकार बना सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में पीडीपी को 28 और भाजपा को 25 सीटें मिलीं थीं, हालांकि पीडीपी के साथ मिल कर सरकार बनाने से उसकी छवि खराब हुई लेकिन 370 हटने के बाद उसका अपना वोट बैंक उसके साथ लौट आया है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने इस संबंध में ट्वीट करके अपनी आशंका जाहिर की है। उन्होंने लिखा है कि ''क्या भारतीय जनता पार्टी जम्मू कश्मीर के वास्तविक मतदाताओं के समर्थन को लेकर इतनी असुरक्षित है कि उसे सीटें जीतने के लिए अस्थायी मतदाताओं को आयात करने की जरूरत है?" स्पष्ट है कि जम्मू कश्मीर का अगला चुनाव जम्मू कश्मीर की स्थिति को पूरी तरह बदल देगा। शायद इसी बात से कांग्रेस नेतृत्व परेशान है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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