क्या अब बीजेपी को नहीं लगता मुसलमानों को आरक्षण से धर्मांतरण का ख़तरा?
नई दिल्ली। बीजेपी कभी धार्मिक आधार पर आरक्षण की प्रबल विरोधी थी। खासकर मुसलमानों को आरक्षण के नाम से ही वह बेचैन हो उठती थी। बीजेपी के अधिवेशनों में, बीजेपी नेताओं के भाषणों में यह भावना खुलकर प्रकट होती रही है। मगर, 2019 के आम चुनाव में हार के डर ने बीजेपी को अपने इस रुख पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया। कभी बीजेपी का रुख होता था कि मुसलमानों को आरक्षण देने से धर्मांतरण बेलगाम हो जाएंगी, मगर अब 124वें संविधान संशोधन में बीजेपी ने अन्य धर्मों के साथ-साथ मुसलमानों के लिए आरक्षण को भी स्वीकार कर लिया है।

धर्म आधारित आरक्षण का रास्ता खुला
मोदी सरकार ने धर्म आधारित आरक्षण का रास्ता खोल दिया है। अनारक्षित वर्ग में 10 फीसदी आरक्षण को ‘सबके लिए' बताने से यह नयी स्थिति बनी है। नये संशोधन बिल में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हर धर्म के गरीब तबके को आरक्षण देने का प्रावधान है। मगर, इस पहल से और अधिक आरक्षण की मांग ने भी जोर पकड़ लिया है। अब सभी धर्म, और खासकर मुसलमान अपने लिए और अधिक कोटे की मांग कर रहे हैं।
देश में न जाति आधारित आरक्षण रहा है, न धर्म आधारित
हमारे देश में न जाति आधारित आरक्षण रहा था, न ही धर्म आधारित। केवल समूह के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान रहा है। ये समूह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अति पिछड़ा वर्ग के रूप में मौजूद हैं। इन वर्गों में उस तबके को जगह मिलती है जिनकी पहचान शैक्षिक और सामाजिक आधार पर पिछड़े वर्ग के रूप में होती है। इसे तय करने के लिए राज्यों में केन्द्र में पिछड़ा आयोग है।

धर्मांतरण पर भी अक्षुण्ण रहता रहा है आरक्षण
आरक्षित वर्ग के वे लोग, जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिलता है। ऐसे लोग मुसलमान भी हो सकते हैं, ईसाई या किसी और धर्म के भी। मगर, इन्हें व्यक्ति के रूप में नहीं, समूह के रूप में ही यह लाभ मिलता है। कहने का मतलब ये है कि अगर कोई एससी से जुड़ा व्यक्ति इस्लाम कबूल कर लेता है तो उसे एससी समूह में होने का लाभ जारी रहता है, वह ख़त्म नहीं होता।
आर्थिक आधार पर आरक्षण की पैरोकार रही है बीजेपी
बीजेपी का रुख हमेशा से धर्म के आधार आरक्षण के ख़िलाफ़ रहा है। बल्कि,वह जातिगत आरक्षण की भी पैरोकार नहीं रही है। बीजेपी आर्थिक आधार पर आरक्षण की समर्थक रही है। जिन्हें शक हो, वे मोहन भागवत के समय-समय पर इस बाबत दिए गये बयानों को देख सकते हैं। आरक्षण की समीक्षा की बात भी आरएसएस करता रहा है।

जब बीजेपी ने मुसलमानों के लिए आरक्षण को बताया था षडयंत्र !
बीजेपी ने रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट के उस हिस्से का भी पुरजोर विरोध किया था जिसमें मुसलमान समेत अल्पसंख्यक वर्ग के लिए ओबीसी कोटे में हिस्सा बढ़ाकर 15 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की गयी थी। बीजेपी का इस मामले में विरोध कितना प्रबल है उसे समझना हो तो फरवरी 2010 में बीजेपी के इंदौर राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित प्रस्ताव पर एक नज़र डाल लें - "दलित मुस्लिमों को आरक्षण देने और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में मुसलमानों का प्रतिशत बढ़ाना न सिर्फ मुसलमानों को राजनीति में आरक्षण देने जैसा खतरनाक षड्यंत्र है बल्कि इससे धर्मांतरण को भी बड़े पैमाने पर शह मिलेगी।"

सच्चर कमेटी के खिलाफ बीजेपी ने खोला था मोर्चा
बीजेपी ने सच्चर कमेटी के ख़िलाफ़ तो मानो मोर्चा ही ले लिया था। सच्चर कमेटी ने मुसलमानों की हालत दलितों और आदिवासियों से भी बदतर बताया था। सच्चर कमेटी को मुसलमानों के हालात जानने के लिए बनी देश की पहली सरकारी कमेटी मानी जाती है। सच्चर कमेटी के बारे में खुद नरेंद्र मोदी और उनकी गुजरात सरकार का रुख भी उल्लेखनीय है।
गुजरात की मोदी सरकार ने सच्चर कमेटी को अवैध बताया था!
मैट्रिक से पहले अल्पसंख्यक छात्रों को वजीफा देने संबंधी यूपीए सरकार की योजना का गुजरात की मोदी सरकार ने विरोध किया था। गुजरात हाईकोर्ट ने जब सरकार की दलील नहीं सुनी, तो मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। नवंबर 2013 में सच्चर आयोग के बारे में मोदी सरकार की सोच सर्वोच्च न्यायालय के सामने खुलकर व्यक्त हुई थी- "सच्चर कमेटी न संवैधानिक थी और न कानूनी। इसने सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी जैसे अल्पसंख्यकों की सुध नहीं ली। इसलिए यह किसी योजना का आधार नहीं हो सकती। कमेटी का मकसद सिर्फ मुसलमानों की मदद करना था।"

खुद तुष्टिकरण की राह पर बीजेपी!
आश्चर्य है कि जो बीजेपी अल्पसंख्यक छात्रों को वजीफा देने के ख़िलाफ़ थी, सच्चर कमेटी को कांग्रेस और यूपीए सरकार की तुष्टिकरण बता रही थी, वही बीजेपी 2019 के आम चुनाव से चंद महीना पहले बिल्कुल बदल गयी लगती है। बीजेपी ने उन राजनीतिक दलों से लीड ले ली है जो अपने-अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर चुनाव के समय आरक्षण पर जुमले और नारेबाजी का सहारा लेती रही हैं।
मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग ने जोर पकड़ा
समाजवादी पार्टी के नेता आज़म खां ने मुसलमानों के लिए अनारक्षित वर्ग को आरक्षण का आधा यानी 10 में से 5 फीसदी कोटा देने की मांग की है। वहीं, टीआरएस नेता और तेलंगाना सरकार ने अपनी उस मांग को दोहराया है जिसमें मुसलमानों के लिए 15 फीसदी और अनुसूचित जनजातियों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की मांग की गयी थी। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के बाद से ही मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग करते रहे नेताओं ने अपनी आवाज़ अब और बुलन्द कर दी है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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