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India and Canada: उतार चढ़ाव भरे रहे हैं भारत-कनाडा के राजनयिक संबंध

India and Canada: भारत कनाडा के बीच बिगड़ते राजनयिक संबंधों के बीच कुछ लोग इस बात की दुहाई दे रहे हैं कि भारत का कनाडा से हमेशा अच्छा रिश्ता रहा है लेकिन वर्तमान मोदी सरकार की नीतियों के कारण कनाडा से भारत का रिश्ता खराब हुआ है। सच्चाई ऐसी नहीं है। आजादी के बाद से ही भारत-कनाडा सम्बन्ध लगातार बनते बिगड़ते रहे हैं। सिर्फ पिछले पचास वर्षों का दौर देखा जाए तो ये सम्बन्ध उतने अच्छे तो कभी नहीं रहे जितना कि तथाकथित प्रगतिशील बताने पर तुले हैं।

भारत में हाल ही में संपन्न हुए जी-20 की बैठक में जैसी विचित्र हरकतें जस्टिन ट्रूडो ने की थीं, उनपर पहले ही लोग आश्चर्य जता रहे थे। किसी देश का प्रधानमंत्री पहले तो आकर होटल के कमरे में मीनमेख निकाले, जबकि दूतावासों को पहले ही सूचना होती है कि उसके देश के लोग कहाँ कैसे ठहरने वाले हैं, थोड़ा अजीब था। इसके बाद जब वापस कनाडा जाते समय उनका हवाईजहाज ही खराब बताकर उन्हें रुकना पड़ा तो और विचित्र स्थिति बनी। इतना होने तक वो प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर पहले ही निज्जर पर बात कर चुके थे और भारत की ओर से खालिस्तानियों को जगह देने के लिए कनाडा से शिकायत भी दर्ज करवा दी गयी थी।

Diplomatic relations between India and Canada have been full of ups and downs

जब सम्बन्ध बिगड़ने लगे और बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की बयानबाजी तक जा पहुंची तो अपने निजी स्वार्थों के लिए भारत के कुछ लोग भी कहने लगे कि भारत-कनाडा के सम्बन्ध तो बड़े अच्छे थे। सच्चाई का इस "अच्छे सम्बन्ध" से कुछ लेना-देना नहीं है। भारत-कनाडा के सम्बन्धों का मतलब ही बीच में रंगभेद का आ जाना होता है। गोरे होने के कारण खुद को श्रेष्ठ और भूरे रंग के कारण भारतीय लोगों को ओछा समझने का कनाडा का पुराना इतिहास रहा है।

इस तरह का भेदभाव भारतीय लोगों के साथ न किया जाए, इसके लिए रानी विक्टोरिया ने 1858 में कहा था कि भारतीय लोगों को पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में रंग, जन्म-नस्ल इत्यादि के आधार पर भेदभाव नहीं झेलना पड़ेगा। जाहिर है ये आदेश करने की जरूरत ही इसलिए पड़ी होगी क्योंकि कहीं भेदभाव किया जा रहा होगा।

कनाडा और भारत दोनों ही उस समय ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आते थे इसलिए सेना में गए कई लोग भारत से कनाडा जाकर बसने भी लगे। उस समय पश्चिमी कनाडा में आबादी कम थी इसलिए कई भारतीय वहाँ बसे लेकिन उन्हें रंगभेद का सामना करना पड़ा। उस दौर में सेना से जाने के कारण अधिकांश लोग पुलिस सेवा में डाले गए या लकड़ी काटने और जंगल साफ़ करने का काम करने लगे। कनाडा के निवासी गोरे लोगों से उनका कम से कम संपर्क हो ये सुनिश्चित किया गया। इसे "एथनिक गेटकीपिंग" कहा जाता है जो आज भी जारी है।

आजादी के बाद के भारत में कनाडा ने नेहरु के दौर में (1960 के दशक तक) कुछ बांध इत्यादि बनाने में भारत की मदद की। ये दौर (1951) कोलम्बो प्लान का काल था जब कई पश्चिमी देश जो पहले उपनिवेशवादी शासक थे, वो अपने पुराने उपनिवेशों, यानि दक्षिणी देशों की मदद कर रहे थे। तमिलनाडु का कुंडाह पॉवरहाउस प्रोजेक्ट कनाडा की मदद से ही बना था। नीलगीरी की पहाड़ियों पर बने इस प्रोजेक्ट के नाम में ही ये दिख जायेगा क्योंकि ये विदेशी मदद से बना था, इसलिए नदी की जिन दो धाराओं से पानी को मोड़ा जाता है, उनके नाम अंग्रेजी "अव्लांच" और "एमराल्ड" हैं, भारतीय नाम नहीं हैं।

नेहरु के बाद इंदिरा गांधी कनाडा की संसद के संयुक्त सत्र में जाने वाली दूसरी भारतीय प्रधानमंत्री बनी। वो 19 जून 1973 को गयी थीं और उनसे पहले नेहरु अक्टूबर 1949 में गए थे। अगर 1950 से 1970 के बीस साल छोड़ दें तो दोनों देशों में कभी बहुत ज्यादा मैत्री नहीं रही। इंदिरा गाँधी ने मई 1974 में परमाणु परीक्षण करवाया और कनाडा ने भारत से संबंध तोड़ लिए। बाद में भारत पर आरोप लगा कि विस्फोट में प्रयुक्त यूरेनियम इत्यादि का परिशोधन कनाडा के दिए "सिरस" न्यूक्लियर रिएक्टर के जरिये किया गया है।

इसके बाद से कनाडा ने कहा कि वो केवल उन्हीं देशों से परमाणु शोध सम्बन्धी जानकारी साझा करेगा जिन्होंने एनपीटी (नॉन प्रोलिफ़रेशन ऑफ न्यूक्लियर वेपन्स) और कोम्प्रेहेंसिव न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रीटी (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर किये हों। भारत और पाकिस्तान दोनों ने एनपीटी पर हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर रखा है, इसलिए दोनों देशों से आणविक शोध से जुड़ा सम्बन्ध कनाडा ने करीब पचास वर्ष बंद रखा।

ऐसा भी नहीं है कि तथाकथित सख्त प्रधानमंत्री कहलाने वाली इंदिरा गांधी के दौर में ही ये सम्बन्ध बिगड़े थे। गठबंधन सरकार के मुखिया आई.के. गुजराल जब प्रधानमंत्री थे तो फरवरी 1997 में उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि भारत आणविक हथियारों को नष्ट करने के पक्ष में तो है मगर सीटीबीटी और एनपीटी अभी जिस रूप में है, वो विकसित देशों के पक्ष में और विकासशील देशों के विरुद्ध है। इस बयान के बाद कनाडा से संबंध और बिगड़े। इसके करीब 12-13 वर्ष बाद जाकर 2010 में भारत-कनाडा के बीच एनसीए (न्यूक्लियर कोऑपरेशन अग्रीमेंट) हुआ और फिर 2015 में आगे का समझौता हुआ जिसमें पांच साल में भारत को 3,000 मेट्रिक टन परिशोधित यूरेनियम दिया जाना था।

कनाडा से संबंधों के इसी उतार चढाव के बीच ही कनाडा से आ रहे एयरइंडिया 182 (कनिष्क) हवाई जहाज पर 1985 में खालिस्तानियों का आतंकी हमला हुआ था। कनिष्क-182 पर हुए इस आतंकी हमले में कई भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक मारे गए थे। इसके बाद 1990 के दौर में भारत से कनाडा के सम्बन्ध थोड़े से बदले। देखा जाये तो 1970-90 के बीच बिगड़े संबंधों के कारण ही कनाडा ने 1982 के दौर से ही भारतीय एजेंसियों की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया था और आतंकी हमला हुआ।

कनाडा के तब के प्रधानमंत्री जीन च्रेटिन जनवरी 1996 में दो मंत्रियों और 300 व्यापारियों के समूह के साथ भारत आये थे और भारत के प्रधानमंत्री गुजराल भी सितम्बर 1996 में अधिकारिक दौरे पर कनाडा गए थे। चंडीगढ़ में कनाडा के हाईकमीशन का इसी दौर (जनवरी 1997) में उद्घाटन किया गया था। भारत और कनाडा के बीच आतंकवाद पर एक वर्किंग ग्रुप भी इसी दौर में बना था। पूर्व प्रधानमंत्री गुजराल के फरवरी 1997 के बयान के बाद स्थितियां काफी हद तक ठंडी ही रहीं। कनाडा इंडिया फाउंडेशन 2007 में बनकर दोनों देशों के सम्बन्ध बनाने और मजबूत करने पर दस वर्ष बाद काम शुरू कर पाया।

जी-20 की ही बैठक के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह भी जून 2010 में टोरंटो (कनाडा) गए थे। इस हिसाब से अगर 2015 के 3,000 मिट्रिक टन परिशोधित यूरेनियम देने के कनाडा के समझौते को मिलाकर भी देखा जाये तो भारत-कनाडा सम्बन्धों को 'बहुत अच्छा' या 'बहुत पुराना' तो हरगिज नहीं कहा जा सकता।

बाकी जो सम्बन्ध कभी बहुत प्रगाढ़ नहीं हो पाए, वो कनाडा में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती संख्या के साथ सुधरेंगे ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामले कोई एक दो वर्ष के नहीं बल्कि दशकों के मामले होते हैं। फिलहाल ट्रूडो और उनके समर्थकों के हिन्दुफोबिया से बचने के लिए कनाडा में रहने वालों के लिए भारत ने एडवाइजरी जारी कर रखी है। भारत-कनाडा के व्यापारिक संबंधों की बात करें तो व्यापार के मामले में भारत कनाडा के लिए दसवां सबसे महत्वपूर्ण देश होता है। इसलिए हमें भी प्रगाढ संबंधों की उम्मीद भले न हो लेकिन हालात सुधरने की उम्मीद जरूर बनाए रखनी चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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