Yamuna: नदी किनारे बसने वाले बाढ़ की शिकायत नहीं करते
Yamuna: भारत कोई शुष्क देश नहीं है। मरूभूमि के कुछ जिलों को छोड़ दें तो पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक नदियां पूरे भारत में धमनियों की तरह तैरती हैं। पूरी भारतीय सभ्यता नदियों के किनारे ही विकसित हुई है। इसलिए हम नदियों के साथ जीवन जीने के अभ्यस्त हैं। वेदों की रचना कुभा नदी से लेकर सिन्धु नदी के बीच हुई। उपनिषद गोमती नदी के तट पर रचे गये। ज्ञान विज्ञान और अध्यात्म की साधना के लिए तो नदियां ही आकर्षित करती रही हैं। फिर वो गंगा नदी हो या नर्मदा, यमुना नदी हो कि गोदावरी या कावेरी, ब्रह्मपुत्र हो कि इंद्रावती। हर नदी का अपना विशिष्ट नाम और गुण है और उस पर उसके किनारे रहने वालों को गर्व भी।
इसलिए नदी किनारे रहनेवाला समाज कभी बाढ़ की शिकायत नहीं करता। शताब्दियों से उसके किनारे रहते हुए उसे अनुभव में आ गया है कि नदी कब कौन सा रूप धरती है। जैसे ब्रह्मपुत्र उग्र नदी है। वर्षाकाल में वह विकराल रूप धारण कर लेती है। इसलिए उसके किनारे रहने वाले लोगों ने ब्रह्मपुत्र को अपने अनुरुप ढालने की बजाय ब्रह्मपुत्र के स्वभाव के अनुकूल अपनी जीवनशैली विकसित कर ली। बिहार में नदियों के किनारे रहने वाले लोग भी नदियों के साथ जीने के अभ्यस्त थे। लेकिन बीते कुछ दशकों में जब उन्होंने नदियों को अपने स्वभाव के अनुरूप ढालने का प्रयास शुरु कर दिया तब से बाढ़ बिहार की स्थाई समस्या बन गयी है।

कुछ ऐसा ही हाल अब उन नगरों का होने लगा है जिन्होंने नदी के स्वभाव के अनुरूप अपनी जीवनशैली विकसित करने की बजाय नदी को अपनी जरूरतों के हिसाब से सीमित करना शुरु कर दिया। यही वो शहर हैं जो नदियों के रास्ते में आ गये हैं और शिकायत भी नदी की ही कर रहे हैं। इसमें सबसे पहला नाम अगर किसी का है तो वह देश की राजधानी दिल्ली का है जिसने यमुना नदी का अतिक्रमण करना ही अपने विस्तार का आधार बना लिया है। इस बार जब यमुना नदी खतरे के निशान से तीन मीटर ऊपर बहने लगी तो पूरे देश में दिल्ली डूब गयी का शोर मच गया।
लेकिन यही पानी आनन फानन में आईटीओ बैराज के जाम पड़े गेट को काटकर आगे की ओर बढ़ाया गया तो बाढ़ मथुरा, वृन्दावन और आगरा में पहुंच गयी। लेकिन वहां बाढ़ का न तो कोई बड़ा समाचार बना और न ही वहां के लोगों ने वैसी शिकायत की जैसी दिल्लीवाले कर रहे थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वो यमुना को सिर्फ नदी नहीं मानते, मां और महारानी मानते हैं। मां या महारानी घर में आ जाए तो कोई शिकायत करता है क्या? इसके उलट वृन्दावन में लोगों ने यमुना मैया को धन्यवाद देना शुरु किया कि न जाने कितने दशक बाद यमुना मैया उस कालीदह घाट तक आई जहां कभी कन्हैया ने कालिया मर्दन किया था।
साधु संत इस बात पर प्रसन्न हैं कि यमुना मैया चलकर हमारे द्वार तक तक आई हैं। उन्हें लगता है कि द्वापर युग वापस आ गया। यमुना मैया फिर से वहीं आ गयीं जहां से कन्हैया के काल में बहा करती थीं। मथुरा वृन्दावन में तो यमुना को महारानी भी कहा जाता है। 'वृन्दावन धाम को वास भलो, जहां पास बहै यमुना पटरानी, जो जन नहाय के ध्यान धरै, बैकुण्ठ मिले तिनको रजधानी।' जो नगर की पटरानी या महारानी हों वो दो चार दिनों के लिए नगर में भ्रमण करने आ जाएं तो कोई शिकायत क्यों करेगा? मथुरा का विश्राम घाट यमुना महारानी की गोद में समा गया तो किसी ने शिकायत नहीं की बल्कि यमुना जी की जयजयकार करने लगा। यमुना महारानी इतने पास आयीं हैं तो जयकारा तो लगना ही चाहिए।
बाढ़ में भी मथुरा वृन्दावन का यह उल्लास इसलिए दिखा क्योंकि यह दिल्ली जैसा नदी से कटा हुआ समाज नहीं है। यमुना सूखती हैं तो मथुरा वृन्दावन के लोगों के प्राण सूखते हैं। शायद इसी सूखते प्राणों से उन्होंने एक कहावत विकसित कर ली कि कलियुग में दो लीलाएं हो रही हैं। पहली यमुना जी अपने घाटों को छोड़कर दूर जा रही हैं और दूसरी श्री गिरिराज जी तिल तिल नीचे जा रहे हैं। ऐसे में अगर यमुना महारानी लौटकर दोबारा अपने पुराने घाटों की ओर पहुंच जाएं तो यह उनके लिए कलियुग में द्वापर का दर्शन है। नहीं तो साल भर यमुना में उड़ेली गयी दिल्ली की गंदगी का बोझ मथुरा वृन्दावन की महारानी को भी उठाना पड़ता है।
दिल्ली अगर यमुना नदी के किनारे न बसी होती तो शायद यमुना की इतनी दुर्दशा नहीं होती। 22 किलोमीटर की यात्रा में पूरी नदी का 60 प्रतिशत प्रदूषण अकेले दिल्ली यमुना में उड़ेल देती है। लेकिन समस्या अकेले फैक्टरी या घरेलू प्रदूषण का नहीं है। रही सही कसर अवैध अतिक्रमण ने पूरी कर दी है। सोनिया विहार से लेकर बदरपुर खादर तक मानों पूरी दिल्ली के पास बसने के लिए यमुना का पेट ही बचा है। क्या सरकारी और क्या गैर सरकारी। सबको यमुना नदी की खाली जमीन ही चाहिए। अब ऐसे में यमुना नदी में पानी की बाढ़ आ जाए तो अपना अपराध देखने की बजाय उस नदी को ही दोष देना शुरु कर देते हैं जिनकी भूमि पर अतिक्रमण किया है।
यही वह संवेदनहीन बर्बरता है जिसे हमने नये जमाने के नाम पर सीख लिया है। जो धार्मिक सामाजिक आधार हमें नदियों से जोड़ता है उसका दर्शन वृन्दावन में तो होता है लेकिन दिल्ली में नहीं होता। नदी भूमि में अतिक्रमण मथुरा वृन्दावन में भी है लेकिन कम से कम वो इस अपराध बोध को स्वीकार तो करते हैं। इसके उलट दिल्ली जैसा शहर सारा दोष कभी नदी के माथे पर तो कभी सरकार के माथे पर डाल देता है। यहां के लोग ऐसा शायद इसलिए करते हैं ताकि उनके माथे पर लगे अतिक्रमण के दाग पर कोई सवाल न उठा दे।
दिल्ली में जैसे यमुना का पानी खतरे के निशान से थोड़े समय के लिए ऊपर नीचे हो रहा है वैसे ही मथुरा वृन्दावन में भी 'बिहारी जी का चरण स्पर्श करके' यमुना महारानी पीछे लौट रही हैं। लेकिन एक बाढ़ ने दो अलग समाजों का दृष्टिकोण हमारे सामने रख दिया है। एक वह समाज है जो बाढ़ के पानी का स्वागत करता है और दूसरा वह समाज है जो हाहाकार मचाने लगता है। दोनों ही समाज भारत में ही हैं और मात्र दो सौ किलोमीटर की दूरी पर बसे हैं। लेकिन दोनों की मानसिकता में मानों दो योजन की दूरी आ गयी है। यह दूरी भारत के लिए बाढ़ से ज्यादा विनाशकारी है। नदी के लिए भी और हमारे लिए भी।
दिल्ली नदी किनारे बस तो गयी लेकिन उसे नदी के साथ जीवन जीना नहीं आया। कभी आता भी था, तो नदी के साथ सहजीवन की समझ को समय के साथ दिल्लीवालों ने भुला दिया। इसलिए वह नदी का अतिक्रमण भी करता है और कभी पानी की बाढ़ हो जाए तो वृन्दावन की तरह उल्लास में डूब जाने की बजाय शिकायत की गठरी खोलकर बैठ जाता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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