Delhi Waterlogging: बेढंगे विकास के दलदल में धंस रही दिल्ली

Delhi Waterlogging: दिल्ली पानी पानी है। प्रगति मैदान का नया अंडरपास बंद कर दिया गया। एनडीएमसी और एमसीडी का ऐसा कोई वार्ड नहीं बचा जहां जल जमाव ने व्यवस्था की पोल नहीं खोली। यह सब तब हुआ है जब दिल्ली को जलमग्न होने से बचाने के लिए पूर्व की तुलना में ज्यादा खर्च किया गया। बरसात में हो रहे जी 20 देशों की बैठकों की मेजबानी के नाम पर दिल्ली को सुसज्जित रखने का भरोसा दिया गया। सभी विभागों को अतिरिक्त सावधानी बरतने और अधिक व्यय करने की छूट दी गई।

बीते शनिवार और रविवार की भारी बरसात में दो सौ से ज्यादा जल जमाव की शिकायतें मिलीं। नगरीय व्यवस्था को पटरी पर लाने वाले कर्मचारी पसीना पसीना होते रहे। कहीं सड़कें धंस गई, तो कहीं मकान ढह गए। कई इलाकों में बरसात के पानी के साथ अप्लावित नालों का पानी घरों में घुस आया। सावन की बरसात ने राजधानी दिल्ली के जनजीवन को नरकीय व्यवस्था का साक्षात्कार करा दिया।

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हालांकि दिल्ली वालों के लिए यह नई बात नहीं है। हर बरसात में कमोबेश यही हाल होता है। मगर इस बार जुलाई महीने की अतिवृष्टि ने 41 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ा है। दो दिनों में आसमान से 258.8 मिलीमीटर पानी आ गिरा है। यह साल भर की अनुमानित बरसात का 34 प्रतिशत पानी है, जो अचानक से दिल्ली की धरती पर बरसा है। बारिश का पानी एक जगह तो रुकता नहीं। वह नालों और नदियों के रास्ते समुद्र तक जाता है। लेकिन दिल्ली में पानी के यमुना नदी तक पहुंचने के सारे रास्ते जाम हैं। कंक्रीट और सीमेंट से ढकी दिल्ली की जमीन में पानी सोख पाने की क्षमता तो है नहीं और ज्यादातर नाले चोक हुए पड़े हैं। बाकी काम अतिक्रमण और कूड़ा पैदा करने की हमारी सोच ने कर रखा है।

दिल्ली में पानी इतना नहीं बरसा कि इसे भारी बरसात कहा जाए लेकिन दिल्ली के लोग इतने से ही बेहाल हैं। नालियों की बहाव क्षमता के जबाव देने से कई इलाकों की सड़कें पानी से भरी हुई हैं। छोटे वाहनों का सड़क पर उतरना मुश्किल हो गया। डीटीसी की विशाल बसें सड़कों पर जैसे तैसे रेंगती नजर आईं और ऐतिहासिक मिंटो ब्रिज पर एक बार फिर से वाहनों के डूब जाने का फोटो सेशन का दौर शुरु हो गया।

जल भराव से दिल्ली के दूर दराज की कच्ची पक्की कालोनियां ही नहीं लुटियन्स दिल्ली भी परेशान है। आधुनिक नगरीय व्यवस्था के प्रतीक नए संसद भवन के ठीक सामने मौजूद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के प्रांगण में कश्ती उतारने लायक जल जमाव हो गया। केंद्र सरकार के दफ्तरों वाले विशाल भवनों से लेकर दिल्ली सरकार से सचिवालय और विधानसभा तक में सम्यक भाव से बरसात का पानी सब ओर भर गया।

दो करोड़ से ज्यादा आबादी वाली दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी वाली मलिन बस्तियों, कच्ची कालोनियों की तो बात ही छोड़ दीजिए। बेहतरीन नगरीय व्यवस्था का दंभ भरने वाली नई दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन यानी एनडीएमसी के मोस्ट वीआईपी आबादी वाले लुटियंस जोन और पॉश दक्षिणी दिल्ली के इलाके तक का सिवेज सिस्टम जवाब दे गया है। टीन टप्पड़ वाले मोहल्ला क्लिनिक और मॉडर्नाइजेशन का इंतजार कर रहे दिल्ली सरकार के अस्पतालों की बदहाली पर बात न भी करें तो केंद्र सरकार के अधीन आने वाले एम्स और सफदरजंग जैसे विशाल अस्पतालों का सिवेज़ तंत्र बुरी तरह से जवाब दे गया। इस बरसात की शुरुआत ने ही एक जान ले ली थी जब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लापरवाही में हुए जल जमाव के कारण खंभे में करंट उतर आया और प्रीत विहार की एक युवती की मौत अपने परिवार के देखते देखते हो गयी। इसके अलावा बरसात में बिजली के खुले खंभों व तारों से फैले करंट की चपेट में आकर राजधानी के चार अन्य लोगों की जान जाने की दुखद सूचना है।

नगरीय व्यवस्था को शर्मसार करने वाली ये घटनाएं तब हो रही हैं जब दिल्ली में जी 20 देशों के विदेशी मेहमानों का जमघट लगा है। जी 20 की मेजबानी के नाम पर दिल्ली को सुसज्जित रखने में संसाधनों पर अतिरिक्त व्यय किया गया है।

इस बरसात ने बड़ी होशियारी से बता दिया है कि सिर्फ लंबी चौड़ी विकास की योजनाओं पर सिर खपाकर और अप्रत्याशित व्यय करके हम बच नहीं सकते। बल्कि हमारे लिए नगरीय व्यवस्था में सुधार पर नए सिरे से सोचने और काम करने की जरूरत आन पड़ी है। एक तो विशाल आबादी को जलजमाव से बचाने का एक उपाय सिवेज सिस्टम को परफेक्ट करना है। इस परफेक्शन के बिना बसी अनियमित कॉलोनियां असभ्यता की निशानी हैं, और असभ्य तरीके से आबादी क्षेत्र का विस्तार मानवता के खिलाफ किसी अपराध से कम नहीं है।

दूसरा याद रखने की जरूरत है कि हमारे पूर्वजों ने नदी किनारे ही शहरों या महानगरों को बसाने का फैसला क्योंकर लिया? नगरीय सभ्यता में नदियां सदा पूजनीय क्यों रही हैं? मसलन शिप्रा के किनारे उज्जैन, अलकनंदा के किनारे बद्रीनाथ, ताप्ती के किनारे सूरत, गोमती के किनारे लखनऊ, गंगा के किनारे काशी और प्रयाग, सरयू के किनारे अयोध्या, कृष्णा के किनारे विजयवाड़ा, कावेरी के किनारे श्रीरंगपट्टनम, झेलम के किनारे श्रीनगर, तो ब्रह्मपुत्र के किनारे ही डिब्रूगढ़ बसा है। तीन तरफ से महासागर और एक ओर से हिम अच्छादित भारतीय उपमहाद्वीप की पवित्रता में गंगा, यमुना, सिंधु, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी आदि को खास महत्व है।

लेकिन दिल्ली के बारे में बात हो तो अक्सर लोग भूल जाते हैं कि यह शहर यमुना नदी के किनारे बसा है। मानों दिल्ली वालों की चेतना में यमुना का कोई वास ही नहीं है। वो उस तरह से यमुना नदी से अपनी पहचान नहीं जोड़ पाते जैसे नदियों के किनारे बसे दूसरे शहरों के लोग उससे अपनी पहचान को जोड़ते हैं। इसलिए यमुना नदी से दिल्ली वालों का कोई जुड़ाव ही नहीं है। अब जिससे आपका अपना कोई जुड़ाव ही न हो तो उसकी चिंता आप कैसे करेंगे?

इस बाढ़ में नालों के बारे में ही नहीं, नदी के प्रति भी चेतन होना होगा। उस तक पानी के पहुंच के सभी रास्तों को जाम से मुक्त करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे गाड़ियों को जाम से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। यमुना के प्रति सामूहिक आभार प्रकट किए बिना दिल्ली का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। प्रकृति दिल्ली में उतनी ही आबादी का भार वहन कर सकती है जितनी यमुना नदी की वहन क्षमता होगी। यमुना की क्षमता उसके प्रवाह मार्ग को सुगम बनाकर और सैकड़ों नालों से यमुना में प्रवाहित हो रहे मल जल को रोकने से बच सकती है।

लेकिन विकास की अंधी दौड़ में मानों दिल्ली उल्टी दिशा में दौड़ पड़ी है। सरकार की योजनाएं और सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही ही दिल्ली के डूबने का इकलौता कारण नहीं है। नदी और पानी को लेकर दिल्ली में रहने वालों की मलिन मानसिकता भी इसके डूबने का एक बड़ा कारण है। दिल्ली के फ्लड प्लेन में बस्तियां बसना बदस्तूर जारी है। जहां पानी जमीन में जा सकता था वहां कंक्रीट का जंगल पैदा हो गया है। रही सही कसर उपभोग के अपशिष्ट प्लास्टिक के कचरे ने पूरी कर दी है। जैसे जैसे उपभोगवादी मानसिकता बढ़ रही है वैसे वैसे प्लास्टिक का कचरा बढता जा रहा है जो नदी और नालों को चोक कर रहा है।

हमारे यहां शास्त्र हों या सामाजिक सिद्धांत। सब पानी को पाने और संभालने का ही उपदेश देते हैं। लेकिन दिल्ली वालों को अक्सर पानी मिलता नहीं लेकिन मिलता है तो उसे संभालना नहीं जानते। नतीजा थोड़ी सी भी बारिश हो तो दिल्ली डूब जाया करती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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