Floods: क्राउडसोर्स डाटा कर सकता है बाढ़ से बचाव

Floods: सोशल मीडिया और वाट्सएप पर अनावश्यक सूचनाओं की बाढ़ ने भले ही आम आदमी को डुबा रखा है, लेकिन देश के कई हिस्सों में सोशल मीडिया से हासिल क्राउडसोर्स डाटा की मदद से सही समय पर जल भराव वाली जगहों की पहचान की जा रही है और जल भराव का निदान भी निकाला जा रहा है। समझ नहीं आता कि दिल्ली की सरकार को ऐसे किसी प्रयोग का ख्याल अब तक क्यों नहीं आया?

इस समय दिल्ली पूरी तरह पानी में डूबी हुई है, क्या पॉश इलाके और क्या जेजे कॉलोनी। सभी जगह पानी के जमाव का आतंक बराबर है। आईएसबीटी कश्मीरी गेट, लालकिला, लोहे वाला पुल, सिविल लाइंस, मजनू का टीला, खजूरी सब डूबे हुए हैं। जिस दिल्ली सरकार के मुखिया की छवि एनजीओ और स्वैच्छिक संस्था वाली थी, उन्होंने आने वाली इस आफत की तैयारी को पूरी तरह अनदेखा कर दिया, जिसका परिणाम आज पूरी दिल्ली भुगत रही है।

delhi Floods: how mobile Crowdsourced data can prevent floods

वाट्सएप से निकला रास्ता

अधिक समय नहीं हुआ जब बेंगलुरु में भारी बारिश ने इंफोसिस में कार्यरत सॉफ्टवेयर इंजीनियर 22 वर्षीया भानुरेखा की जान ले ली थी। घटना बेंगलुरु के सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट स्थित केआर सर्किल के अंडरपास में पानी भर जाने से हुई थी। पानी कार में भी भर गया जिससे भानुरेखा का दम घुट गया। इस घटना के बाद यह बेंगलुरु में फिर से दुहराया ना जाए, इस संकल्प के साथ एक स्वयंसेवी संस्था सक्रिय हुई। संस्था ने एक वाट्सएप नंबर जारी किया जहां बेंगलुरु के अलग अलग हिस्सों में जल जमाव और बाढ़ की स्थिति का सामना करने वाले व्यक्ति को सिर्फ 'फ्लडमैप' लिखकर भेजना होता है। उसके बाद स्वयंसेवी संस्था की तरफ से फोन पर सारी जानकारी विस्तार से ली जाती है। एक सप्ताह में ही शहर के अंदर लगभग 100 अलग अलग स्थानों से लोग अपनी समस्या के साथ इस वाट्सएप नंबर से जुड़े। यह सारा डाटा इकट्ठा करके संस्था एक रिपोर्ट बनाकर 'बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका' को सौंपने वाली है।

मुम्बई में भी अब पहले जैसे हालात नहीं

पिछले दशक में दिल्ली की तरह मुम्बई भी लगातार जल जमाव और बाढ़ के संकट से जूझ रही थी। 2005 की बाढ़ का जिक्र होते ही मुम्बईकर आज भी डर जाते हैं। उस साल मुम्बई में 24 घंटे के अंदर 90 सेन्टीमीटर की बारिश हुई थी। डूबे हुए घरों और कारों की तस्वीर जो पहले बरसात में मुम्बई की पहचान रही है, इस साल वह स्थान दिल्ली ने हासिल कर लिया है। मुम्बई अपनी समस्या से लड़कर यदि आज उसे काफी हद तक नियंत्रित कर पाया है तो इसके पीछे बड़ी वजह सही समय पर पानी के भराव को पहचानने और उसे नियंत्रित करने की तकनीकी है। इसमें मुम्बई के नागरिकों की मदद वहां आईआईटी से जुड़ी एक टीम ने की। उन्होंने सोशल मीडिया ट्वीटर को गपशप और लंतरानी की जगह क्राउडसोर्स डाटा के लिए इस्तेमाल किया, जिससे मुम्बई के किसी भी क्षेत्र में पानी इकट्ठा होने पर सही समय पर उन्हें जानकारी मिल जाए।

आईआईटी मुम्बई के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में डॉ. सुबीमल घोष के नेतृत्व में एक आटोमेटेड प्रोग्राम के जरिए बाढ़ से जुड़े सारे डाटा को ट्वीटर से एक जगह इकट्ठा कर लिया जाता है। इस तरह पानी इकट्ठा होने की घटना और उसका स्थान दोनों की जानकारी वास्तविक समय पर उपलब्ध हो जाती है। बारिश के समय आम मुम्बई वासी ट्वीटर पर अपने क्षेत्र का हाल लिखता है और उनकी स्थिति को डॉ. घोष की टीम मॉनिटर करती है।

बाढ़ से जुड़ी क्राउडसोर्स डाटा की उपयोगिता के मूल्यांकन के लिए मुम्बई में पिछले साल सबसे अधिक वर्षा वाले दिन 5 जुलाई 2022 का सारा डाटा इकट्ठा किया गया। फिर अन्य सालों के बाढ़ से जुड़े ट्वीट को एक जगह एकत्रित करके, इन सबकी मदद से मुम्बई में बाढ़/ जल भराव का एक मानचित्र बनाया गया, जिसमें महानगर के अंदर पिछले कुछ वर्षो में सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों की पहचान की गई।

जल जमाव/ बाढ़ की सटीक जानकारी

ग्रेटर मुम्बई की नगरपालिका ने आटोमेटिक वेदर नेटवर्क स्टेशन बिठाया। वर्तमान में मुम्बई में इनके स्टेशनों की संख्या 60 है। आटोमेटिक वेदर स्टेशन से अन्य जानकारियों के साथ-साथ, पन्द्रह-पन्द्रह मिनट पर वर्षा के पूर्वानुमान की जानकारी भी मिलती है। लेकिन इससे पानी लगने और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने की जानकारी नहीं मिलती। स्टेशन से बाढ़ के संबंध में जो जानकारी दी जाती है, वह अनुमान पर आधारित होती है। जबकि क्राउडसोर्स डाटा से सटीक जानकारी मिल जाती है। जिस क्षेत्र से सबसे अधिक और निरंतर ट्वीट जल जमाव से संबंधित किए जा रहे हों, उसकी जानकारी क्राउडसोर्स डाटा पर आ जाती है। फिर उसका मिलान वेदर स्टेशन से मिले रेनफॉल डाटा के साथ कर लिया जाता है। इस तरह जल भराव और अत्यधिक वर्षा से जुड़ी सटीक जानकारी उपलब्ध हो जाती है।

बाढ़ की स्थिति को समझने के लिए जल जमाव की सही स्थिति सही समय पर साफ होनी आवश्यक है। यदि पानी का भराव है तो वह कितना है? एड़ियों तक है, घुटने तक है या पानी कमर तक या उससे ऊपर आ गया है। ट्वीटर पर जब लोग रिअल टाइम पर जल जमाव की समस्या लिख रहे होते हैं। उसे एक जगह इकट्ठा करते हुए वास्तविक समय पर चुनौती का सही-सही आकलन हो जाता है। यदि जनता किसी खास हैस टैग के साथ जानकारी शेयर करे तो सूचना इकट्ठा करने में जुटी टीम के लिए यह सुविधाजनक होता है। जैसे दिल्ली के लिए हैश टैग दिल्ली रेन्स (#DelhiRains) या हैशटैग दिल्ली रेन्स डाटा (#DelhiRainsData)।

अब डाटा को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं के स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण भी किया गया है। अलग अलग क्षेत्रों से लोगों को जोड़कर सूचना कैसे साझा करनी है, इसका विशेष फॉरमेट भी समझाया जा रहा है। यदि सही समय पर सूचना मिलती रहे तो क्राउडसोर्स डाटा के माध्यम से भारी जल जमाव अथवा बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने के एक से तीन दिन पहले इस काम में लगे शोधार्थी स्थिति का आकलन प्रस्तुत कर सकते हैं।

मुम्बई के अंदर खार, दहीसर, मलाड, बोरीवली, हिंदमाता और गांधी मार्केट ये छह बाढ़ के हॉट स्पॉट रहे हैं। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि क्राउडसोर्स डाटा की मदद से छह में से चार हॉट स्पॉट पर बीएमसी ने जल जमाव को नियंत्रित करने में कामयाबी पा ली है। ऐसा उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का ही कहना है।

अगर एक ओर मुंबई और बंगलौर की तर्ज पर दिल्ली में भी डूब क्षेत्रों की रियल टाइम में पहचान और प्रबंधन किया जाए तो बार बार दिल्ली में आने वाली बाढ़ की यह समस्या बहुत कम हो सकती है। इसके साथ ही दिल्ली में अतिरिक्त पानी के प्रबंधन की दिशा में भी सोचना होगा ताकि बूंद बूंद को तरसती दिल्ली में जब पानी आये तो इस तरह दिल्ली को डुबाकर बेकार न बह जाए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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