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Dark Pattern: ऑनलाइन शॉपिंग में डार्क पैटर्न का शिकार होते ग्राहक

Dark Pattern: बात चाहें सेवाओं की हो या उत्‍पादों की, ऑनलाइन शॉपिंग आज हमारी लाइफ का हिस्सा बन चुकी है। यह अलग बात है कि अक्‍सर अज्ञानता या लापरवाही, हमारे नुकसान की वजह बन जाती है। लेकिन, यह हमेशा आपकी गलती नहीं होती। ज्‍यादातर मामलों में आप बाजार की एक खास रणनीति का शिकार बनते हैं। मार्केटिंग की दुनिया में इसे डार्क पैटर्न कहते हैं। यानि उपभोक्‍ता को अंधेरे में रखने की रणनीति। यह एक ऐसी रणनीति है, जिसके केंद्र में ग्राहक को भगवान नहीं, बल्कि 'बकरा' मानने की सोच मौजूद रहती है।

अब केन्द्र सरकार ने ई-कॉमर्स वेबसाइटों के जरिए हर रोज हो रही इस ठगी का संज्ञान लिया है। इसके लिए गाइडलाइंस का ड्राफ्ट तैयार किया गया है और जनता से इस बारे में सुझाव मांगे गये हैं। इन गाइडलाइंस को अंतिम रूप दिए जाने के बाद, ई-कॉमर्स प्‍लेटफॉर्मों को इनका पालन करना बाध्‍यकारी होगा। उल्‍लंघन की स्थिति में कंपनी पर दस लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

Dark Pattern: Customers becoming victims of dark pattern in online shopping

दो महीने पहले डिपार्टमेंट ऑफ कन्‍ज्‍यूमर अफेअर्स, एडवर्टाइजिंग स्‍टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया तथा स्‍टेकहोल्‍डर्स के बीच एक साझा मीटिंग हुई थी, जिसमें ऑनलाइन बाजार में छलावा प्रचार के लगातार बढ़ रहे चलन पर लगाम लगाने पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया। ताजा गाइडलाइंस, इसी मंथन से बाहर आई हैं।

डार्क पैटर्न टर्म कोई नया नहीं है। पहली बार इसका इस्‍तेमाल वर्ष 2010 में एक ब्रिटिश रिसर्चर हैरी ब्राइनल ने किया था। उपभोक्‍ता अनुभवों पर शोध कर रहे ब्राइनल ने डार्क पैटर्न को उन यूजर इंटरफेस तकनीकों और डिजाइनों के संदर्भ में प्रस्‍तुत किया था, जिनकी मदद लेकर उपभोक्‍ता को चालाकी से शब्‍दों और पेशकशों के जाल में फँसाया जाता है। उसे यकीन दिलाया जाता है कि अगर वह उसी वक्‍त वह चीज खरीदे तो उसका फायदा होगा। अगर वह फैसला लेने में थोड़ी सी भी देर करता है तो उस लाभ से वंचित हो जाएगा, जिसका ऑफर उसे दिया जा रहा है।

इसका अनुभव कई बार आपने ऑफलाइन, खासकर स्‍ट्रीट शॉपिंग के दौरान भी किया होगा, जब आपको दुकानदार कहता है कि अगर इसी वक्‍त आप अमुक चीज खरीदते हैं तो वह 'इतने' में दे सकता है, दोबारा आने पर वह 'उतने' से कम में नहीं मिलेगी। आप फँस जाते हैं, जबकि वास्‍तविकता यह है कि अगर आप एक दिन बाद भी उसके पास आते हैं और उसे याद दिलाते हैं कि कल वह यह चीज 'इतने' में दे रहा था तो थोड़े से नखरे दिखाने के बाद आपको उसी राशि में वह चीज दे देगा।

इसी रणनीति को आप ऑनलाइन शॉपिंग में भी महसूस कर सकते हैं। 'सिर्फ एक घंटे तक' मिलने वाली 50 फीसदी की छूट, हो सकता है कि आपको एक हफ्ते बाद भी जारी नजर आए। 'केवल तीन आइटम बाकी' का मतलब यह नहीं कि आपने अगर वह आइटम तभी नहीं लिया तो स्‍टॉक खत्‍म हो जाएगा। आप उसे खरीदिए मत, सिर्फ संदर्भ के लिए अपनी शॉपिंग कार्ट में एड करके रख दीजिए। पंद्रह दिन बाद देखिए, वह अभी भी स्‍टॉक में मिलेगा।

उपभोक्‍ता व्‍यवहार को प्रभावित करने में बेहद कारगर, विपणन की ऐसी रणनीति कारोबार के लिए फायदेमंद भले ही साबित होती हों, लेकिन नैतिकता की दृष्टि से ये अनुचित ही कही जाएंगी। बिजनेस बढ़ाने के लिए इस प्रकार के झूठ को ठगी ही कहा जाएगा। डार्क पैटर्न के अंतर्गत हो रही ऐसी ऑनलाइन जालसाजियॉं सिर्फ 'कीमत बढ़ जाएगी' या 'स्‍टॉक खत्‍म हो जाएगा' जैसे मासूम से लगने वाले झूठों तक सीमित नहीं हैं। यहॉं कम से कम आपको उतना सामान तो मिल ही जाता है, जितनी कि आपने रकम खर्च की होती है। कई जगह आपको होने वाला नुकसान, कल्‍पना से कहीं अधिक होता है।

सरकारी गाइडलाइंस, आपको इन्‍हीं संभावित नुकसानों से बचाने के लिए हैं। फिलहाल इस क्रम में डार्क पैटर्न के अंतर्गत जारी दस प्रकार की रणनीतियों को चिन्हित किया गया है। अगर आप अक्‍सर इंटरनेट का इस्‍तेमाल करते हैं तो आपने इनमें से कई को जरूर महसूस किया होगा।

इन रणनीतियों में आपको अस्‍पष्‍ट, अधूरी या जटिल भाषा में जानकारी देना, इंटरफेस के इस्‍तेमाल के लिए अपना डेटा प्रदान करने और संबंधित वेबसाइट द्वारा कुकीज के इस्‍तेमाल पर सहमति देने के लिए मजबूर करना शामिल है। आपको इस बारे में या तो जानकारी दी ही नहीं जाती या अधूरी जानकारी दी जाती है कि आपके द्वारा दी गई सहमति या जानकारियों का क्‍या इस्‍तेमाल किया जा सकता है। इस रणनीति को प्राइवेसी वाशिंग कहते हैं।

लेकिन, कई ऐसी भी हैं जो सीधे-सीधे आपको ठग रही हैं और आप चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। जैसे कि आप गूगल पर कोई प्रॉडक्‍ट, मान लीजिए कि ए कंपनी के स्‍मार्ट फोन का एक्‍स मॉडल सर्च करते हैं। आपको अलग-अलग साइटों पर उसकी अलग-अलग कीमत नजर आती है। आप सबसे सस्‍ता वाला विकल्‍प चुनते हैं। लेकिन, जब आप उस लिंक को ओपेन करते हैं तो पाते हैं कि उसकी कीमत सर्च इंजन पर प्रदर्शित कीमत से अधिक नजर आ रही है। हालांकि इसमें आपके पास वापस जाने का विकल्‍प है। लेकिन, कई बार तो आप सीधे वेबसाइट पर जाएं, तो भी फँस जाते हैं। आपको प्रॉडक्‍ट की कीमत कुछ और दिखाई जाती है, शॉपिंग कार्ट में भी वही कीमत नजर आती है, लेकिन जब आप उसके लिए पेमेंट कर रहे होते हैं तो वह कीमत अचानक बढ़ी नजर आने लगती है। इस प्रकार की ठगी को बेट एंड स्विच (Bait and Switch) कहा जाता है।

ऐसी ही एक रणनीति सरप्राइज बिलिंग भी है, इसका अनुभव भी आपको हुआ होगा। कई बार आप एक प्रॉडक्‍ट खरीदते हैं और ऐन पेमेंट के समय देखते हैं कि बिल की राशि बढ़ी हुई है। कई बार आपका ध्‍यान इस पर नहीं जाता और आप वही रकम चुका देते हैं, जो आपको चुकाने के लिए कहा गया है। बढ़ी हुई कीमत के पीछे वजह शिपिंग और हैंडलिंग के नाम पर लिया जाने वाला शुल्‍क, बिना बताए किए गए इंश्‍योरेंस का प्रीमियम, या किसी चैरिटी कॉज के नाम पर वसूली जा रही राशि जैसी वजह हो सकती हैं।

इसी प्रकार एक और रणनीति फोर्स्‍ड कंटीन्‍यूटी है। इसमें आपको एक निर्धारित अ‍वधि के लिए किसी सेवा के फ्री ट्रायल की पेशकश की जाती है। बदले में आपको उन्‍हें अपना व्‍यक्तिगत विवरण, जिसमें भुगतान विकल्‍प की जानकारी भी शामिल है, उन्‍हें उपलब्‍ध कराना होता है। ट्रायल अवधि खत्‍म होने के बाद आपको पता चलता है कि कि आपको बिना बताए आपका सब्‍सक्रिप्‍शन रिन्‍यू कर दिया गया है और उसकी राशि आपके भुगतान विकल्‍प से वसूल ली गई है। आप उसे रद्द कराना चाहते हैं और आपको काफी खोजने के बाद भी वह लिंक नहीं मिलता, जिसके माध्‍यम से आप अपना सब्‍सक्रिप्‍शन कैंसल करा सकें।

डार्क पैटर्न के अंतर्गत जारी दूसरी सर्वाधिक आम गतिविधियों में जबरन साइनअप के लिए बाध्‍य करना, ग्राहक को ऑर्डर किए गए सामान के बदले बहाना बनाकर कोई और उत्‍पाद भेज देना, प्रॉडक्‍ट के फीचर की जानकारी न देना या बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी देना, आपको आपका पसंद किया गया उत्‍पाद ऑर्डर करने में बाधा डालना और दूसरा प्रॉडक्‍ट लेने के लिए मजबूर करना आदि शामिल हैं।

दिक्‍कत की बात यह है कि ऑफलाइन खरीदारी में कहीं फंसने या ठगे जाने का अंदेशा हो तो आपके पास उस दुकान से आगे बढ़ जाने का विकल्‍प होता है। लेकिन, डार्क पैटर्न के जाल की बुनावट इतनी महीन है कि यहॉं आपकी सारी समझदारी और सतर्कता धरी रह जाती है। क्‍योंकि यहॉं आप एक पल जो देख रहे होते हैं, अगले ही पल वह गायब हो जाता है या कुछ और हो जाता है। जब तक आप इसे समझ पाते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है।

यह एक वैश्विक समस्‍या है। इस प्रकार की व्‍यापारिक गतिविधियों का मार्केट साइज क्‍या है, इसका आंकलन कर पाना आसान नहीं है। फिर भी अनुमान है कि यह गोरखधंधा अरबों डॉलर का हो सकता है। फेडरल ट्रेड कमीशन ने वर्ष 2021 में अपनी एक स्‍टडी में पाया था कि 70% वेबसाइटें कम से कम एक डार्क पैटर्न का उपयोग करती हैं। इनके जरिए वे उपभोक्ताओं को अनपेक्षित खरीदारी करने या दूसरे प्‍लेटफार्मों की तुलना में ज्‍यादा व्यक्तिगत जानकारियॉं साझा करने के लिए मजबूर करती हैं। यूरोपीय संघ पिछले साल ही कुछ विशेष डार्क पैटर्न के इस्‍तेमाल को प्रतिबंधित करने वाला कानून पारित कर चुका है। कमीशन ने डार्क पैटर्न इस्‍तेमाल के लिए कई कंपनियों पर कार्रवाई भी की है।

उपभोक्‍ता व्‍यवहार को समझकर उसे अपने पक्ष में करना, विज्ञापन व विपणन की दुनिया में एक प्रकार की कला और विज्ञान, दोनों माने जाते हैं। लेकिन, डार्क पैटर्न के अंतर्गत अमल में लाई जा रही रणनीति न कला है, न विज्ञान। यह एक तरह की बाजीगरी है, जिसमें न किसी किस्‍म की नैतिकता होती है, न उपभोक्‍ताओं के प्रति कोई संवेदनशीलता। इसलिए डार्क पैटर्न पर लगाम कसना बहुत जरूरी है ताकि उपभोक्‍ताओं को भावनात्‍मक और आर्थिक शोषण से बचाया जा सके।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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