Bottled Water Risks: खतरनाक है प्लास्टिक की बोतलों में बंद पानी

सरकारें केवल दिशा निर्देश जारी करती हैं लेकिन वास्तविक खतरों से निपटने का व्यावहारिक उपाय नहीं करतीं। प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी ऐसा ही एक स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट है जिसको लेकर प्रशासन कत्तई गंभीर नजर नहीं आता।

Dangers of Plastic Bottled Water risk for health and environment

Bottled Water Risks: हर साल जैसे ही गर्मी बढ़ती है, देश में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है। स्वच्छ और शीतल जल की तलाश में देश की बड़ी आबादी आज बीस लीटर, पांच लीटर, दो लीटर, एक लीटर की प्लास्टिक बोतलों में भरा पानी खरीद कर पी रही है। एक शोध के अनुसार, अधिक गर्मी पड़ने पर अथवा तेज धूप के संपर्क में आने के बाद बोतल बंद पानी पीने योग्य नहीं रहता। प्लास्टिक बोतलों में मौजूद महीन माइक्रोप्लास्टिक आसानी से पानी में घुल जाते हैं। अधिक समय तक ऐसा पानी पीने से हार्मोनल इम्बैलेंस, अर्ली प्युबर्टी जैसी समस्‍याएं हो सकती हैं। यह हमारे लीवर के लिए भी खतरनाक है। इससे नपुंसकता और बांझपन की समस्‍या भी पैदा हो सकती है।

'हॉर्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पानी की बोतल को लचीला बनाने के लिए इसमें 'फाथालेट्स' और 'बीसाफेनॉल-ए' (बीपीए) नाम का औद्योगिक रसायन मिलाया जाता हैं। यह दिल की बीमारी या मधुमेह की वजह बन सकता है। बीपीए से उत्पन्न प्लास्टिक प्रदूषण वर्तमान समय की सबसे बड़ी एक वैश्विक पर्यावरणीय चिंता है। अगर लंबे समय तक प्लास्टिक बोतल का इस्तेमाल किया जाए तो इससे- पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम हो सकती है, और लड़कियों में जल्दी यौवन हो सकता है। यहां तक कि बोतलबंद पानी का सेवन करने वाले लोगों में लीवर और ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना भी अधिक होती है।

20-25 साल पहले यात्रा पर निकलते समय पीने का पानी मिट्टी के बर्तन में लेकर निकलना आम बात होती थी। या फिर वह स्टील का कोई बर्तन होता था। इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं था लेकिन इसका स्वास्थ्य पर कोई दुष्प्रभाव नहीं था। आज यात्रा के समय अधिकांश लोग प्लास्टिक बोतल अथवा प्लास्टिक पाउच वाला पानी खरीद रहे हैं। इस पानी को खरीदते समय अथवा सेवन करते समय एक बार भी नहीं सोचते कि इसका हमारे शरीर पर क्या असर होगा?

एक अनुमान के अनुसार भारत में 35 लाख टन प्लास्टिक कचरा प्रति वर्ष इकट्ठा हो रहा है। प्रति व्यक्ति प्लास्टिक कचरा का हिसाब लगाएं तो यह पिछले पांच साल में लगभग दोगुना हो गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तेजी के साथ हमारे आस-पास प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ रहा है और यह देश के लिए आने वाले समय में कितनी बड़ी चुनौती बन सकता है!

धीरे-धीरे जमीन के अंदर का पानी भी प्रदूषण की चपेट में आकर अब पीने लायक नहीं बचा। पीने के साफ पानी के लिए घर-घर में आरओ लगाया जा रहा है। आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) का पानी इस्तेमाल करते हुए उसके टीडीएस (टोटल डिसोल्वड सॉलिड्स) लेवल का पूरा ध्यान रखना आवश्यक है। 100 मिलीग्राम से कम टीडीएस मतलब आवश्यकता से कम मिनरल्स। कम टीडीएस होने पर पानी का स्वाद मीठा हो जाता है। उसमें चीजें तेजी से घुलती हैं।

प्लास्टिक की बोतल वाले पानी में टीडीएस कई बार कम कर दिया जाता है। इसकी वजह से उसमें प्लास्टिक के कण तेजी से घुलते हैं। 100 मिलीग्राम से कम टीडीएस वाला पानी पीने योग्य नहीं होता। वाटर क्वालिटी इंडियन एसोसिएशन के अनुसार भारत के 13 राज्यों में 98 जिलों का पानी पीने योग्य नहीं है। उसे आरओ की मदद से ही पीने योग्य बनाया जा सकता है। शुद्ध पानी को स्वादरहित, रंगरहित और गंधरहित होना चाहिए। विश्व स्वास्थ संगठन मानता है कि एक लीटर पानी में 300 मिलीग्राम टीडीएस होना चाहिए। 300 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम के बीच टीडीएस मतलब आवश्यकता से अधिक मिनरल्स। आवश्यकता से कम और आवश्यकता से अधिक दोनों ही प्रकार का मिनरल्स हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं है।

आरओ के पानी का टीडीएस लेवल तो हम जांच सकते हैं लेकिन जो पानी हम बाहर से खरीद कर पी रहे हैं। उसकी जांच आम तौर पर नहीं की जा रही है। घर घर पानी की 20 लीटर वाली बोतल पहुंचाने वाले व्यापारी, बोतल में भरकर जो भी पानी लेकर आते हैं, उसे पीने लायक मानकर लोग पी रहे हैं। इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि पीने के पानी के संकट से हम सब किस स्तर पर जूझ रहे हैं। आज देश की बड़ी आबादी नहीं जानती कि पैसे खर्च करके वह जो पानी पी रही है, वह पीने लायक है भी या नहीं।

भारतीय रेलवे ने वेंडिंग मशीन से लोगों को पानी उपलब्ध कराने की एक शानदार पहल की लेकिन प्लास्टिक की बोतल में पानी बेचने वाले माफियाओं की स्टेशन परिसर में सक्रियता की वजह से वेंडिंग मशीन का प्रयोग सफल नहीं हो पा रहा। रेलवे के पास अपना रेल नीर होने के बावजूद रेलवे परिसर में दूसरे ब्रांड की पानी की बोतले धड़ल्ले से बिकती हैं। ट्रेनों में 15 रुपए की जगह वेंडर 20 रुपए में भी बेच रहे हैं। पिछले साल गर्मी के दिनों में रेलवे के जीएम प्रमोद कुमार खुद कानपुर रेलवे स्टेशन पर गमछा बांधकर खरीददारी करने पहुंच गए थे। उन्हें भी दुकानदार ने नहीं बख्शा। पन्द्रह रुपए एमआरपी की पानी की बोतल बीस में बेच दी। उसके बाद रेलवे को जो कार्रवाई करनी थी, वह हुई।

रेलवे कार्रवाई करती है लेकिन रेलवे परिसर में पानी माफिया की सक्रियता इससे कम नहीं हो रही। कभी रेल नीर का सारा स्टाॅक ट्रेन और स्टेशनों से गायब हो जाता है। कभी बोतल बंद पानी के नाम पर ग्राहक को नल का भरा हुआ बोतल बेच दिया जाता है। कभी पानी की वेंडिंग मशीन खराब कर दी जाती है। कभी स्टेशन के नलों का पानी गायब हो जाता है। गर्मी दस्तक फिर देने वाली है। रेल प्रशासन को ध्यान देना चाहिए कि इस वर्ष यात्रियों को ऐसी शिकायतों का सामना ना करना पड़े।

अच्छा हो कि रेलवे स्टेशनों पर अधिक से अधिक पानी की वेंडिंग मशीने लगवाई जाएं। वहां 05 रुपए लीटर की जगह 02 रुपए लीटर पानी उपलब्ध कराया जाए। रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन के रूकने की अवधि कम होती है। आम तौर पर वेंडिंग मशीन भी प्लेटफार्म के किसी एक कोने में होती है। ऐसे में स्टेशन पर सस्ता पानी लेने के लिए भगदड़ ना मचे, इस बात का ध्यान रखते हुए वेंडिंग मशीन के संचालकों को छोटे बर्तनों में ट्रेन के अंदर पानी बेचने की अनुमति देने पर भी विचार किया जाए। प्लास्टिक बोतलों में बंद करके बिक रहा पानी स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी बहुत बड़ा संकट है। गर्मी आ चुकी है, सवाल सामने है कि क्या हमारी तैयारी पूरी है?

'अमेरिकन कैंसर सोसायटी' के अनुसार तांबा के बर्तन में रखा हुआ पानी हमारे शरीर में कैंसर की शुरुआत को रोक सकता है। तांबे के बर्तन के फायदे हमारे घरों में बड़े बुजुर्ग भी गिनाते रहे हैं। जब हमारे पास तांबा, मिट्टी, स्टील और कांच की बोतलों का विकल्प है, फिर पानी के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल क्यों किया जाए?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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