प्राकृतिक आपदा (Fani) को भी चुनावी राजनीति से जोड़ना कितना जायज?
नई दिल्ली। चुनाव है, उसे जीतना है और फिर सरकार बनानी है, तो राजनीतिज्ञ किस हद तक जा सकते हैं इसका अंदाजा फॉनी तूफान को लेकर की जा रही राजनीति से लगाया जा सकता है। यह तूफान एक प्राकृतिक आपदा है जिससे देश के कई इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और जान-माल का काफी नुकसान हुआ है। हालांकि राज्य सरकारों औऱ केंद्र ने इस तूफान से संभावित नुकसान से बचने के लिए हर संभव कोशिश की और काफी हद तक सफलता भी हासिल की। लेकिन इसको लेकर राजनीति भी कम नहीं हुई। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निभाई जिन्होंने तूफान से बचाव और पीड़ितों की मदद में निश्चित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इसका चुनावी लाभ लेने से भी बाज नहीं आए। संदेश यह गया कि इस तूफान का कौन कितना चुनावी लाभ हासिल करता है, इसमें होड़ लगी रही।

इसके विपरीत ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनाटक के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनकी ओर से ऐसा संभवतः कुछ नहीं किया गया जिससे यह संकेत मिले कि वह तूफान को चुनावी राजनीति से जोड़ कर देखते हैं। यह अलग बात है कि उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया औऱ पीड़ितों की हरसंभव मदद की जो किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय किसी को भी करना चाहिए। राजनीतिक हलकों में यह कहा जा रहा है कि तूफान को लेकर चुनावी राजनीति के इर्दगिर्द दो नेता सामने आए जिन्होंने एक दूसरे को नीचा दिखाने और चुनावी लाभ लेने में किसी तरह की कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
कहा जा रहा है कि दोनों ने ही इसका भी खयाल नहीं रखा कि आपदा के समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम पीड़ितों को हर हाल में मदद पहुंचाना और उनके घावों पर मरहम लगाना होता है। लेकिन यह काम शायद पीछे छूट गया अथवा छोड़ दिया गया और ध्यान सिर्फ इसका रह गया कि कैसे खुद को चुनावी राजनीति के लिहाज से आगे कर लिया जाए। कहा जा रहा है कि इसके पीछे इन राजनेताओं की मंशा वोट अपने पक्ष में करना और चुनाव बाद की रणनीति पर जोर देना ज्यादा अहम रहा है। इसी के मद्देनजर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा दौर चला कि राजनीतिक गरिमा तक को भुला दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से जहां एक तरफ ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनाटक की खूब प्रशंसा की गई वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर रोड ब्रेकर दीदी और घमंडी जैसे विशेषणों के साथ कहा गया कि उन्होंने तो उनका फोन तक नहीं उठाया और न ही पलटकर फोन किया। कहा जा सकता है कि अगर प्रधानमंत्री की ओर से किसी मुख्यमंत्री को फोन किया जा रहा है, तो वह फोन उठाया जाना चाहिए और बात की जानी चाहिए भले ही किसी तरह का विरोध क्यों न हो। देश की संघीय व्यवस्था का भी यही तकाजा होता है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, तो माना जा रहा है कि शायद ममता बनर्जी नहीं चाहती थीं कि तूफान को लेकर कोई भी श्रेय प्रधानमंत्री ले जाएं।
इसके साथ ही ममता बनर्जी का भी अपना पक्ष है जो उनके मुताबिक भले ही जायज और दूसरों के लिहाज से गलत, लेकिन उसमें से भी चुनावी राजनीति की बू साफ आती लगती है। ममता का कहना है कि प्रधानमंत्री चुनावी सभा के लिए आए थे। अगर वह तूफान के सिलसिले में आए होते, तो मैं जरूर मिलतीं और बात करतीं। वह इससे आगे भी जाती हैं और कहती हैं कि उन्हें जो बात करनी होगी वह नए प्रधानमंत्री से करेंगी। यह सच है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा काफी मजबूती से और आक्रामक तरीके से चुनाव प्रचार में लगी हुई है जो ममता बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती हो सकता है।
इसके अलावा बीते लंबे समय से ममता का मोदी विरोध भी किसी से छिपा नहीं है। वह भाजपा को चुनावों में शिकस्त देने और विपक्षी एकता के लिए भी प्रयासरत रही हैं। ऐसे में इसे स्वाभाविक माना जा सकता है कि वह प्रधानमंत्री का हर स्तर पर विरोध करें। लेकिन बात तो की ही जा सकती है। इस पर ममता की ओर से यह भी कहा गया कि कोई प्रधानमंत्री राज्य के चीफ सेक्रेटरी से सीधे कैसे बात कर सकता है। यह संघीय ढांचे को अस्वीकार करने जैसा है। मतलब दोनों ही पक्ष अपने-अपने स्तर पर न केवल अड़े लगते हैं बल्कि दोनों की कोशिश अपने मतदाताओं को संदेश देना भी लगता है।
अब थोड़ा सा इसके पीछे की राजनीति को भी समझ लेने की जरूरत है। सबसे पहले पश्चिम बंगाल को लेकर कि यहां किसका क्या दांव पर लगा है। इस लोकसभा चुनाव में भाजपा का काफी समय से जोर पश्चिम बंगाल में ज्यादा से ज्यादा सीटें पर रहा है। बताया जाता है कि भाजपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश में होने वाले संभावित नुकसान की कुछ भरपाई इस राज्य से की जा सकती है। इसके विपरीत ममता की हरसंभव कोशिश राज्य की सभी सीटों पर जीत हासिल करने की है ताकि एक तो राज्य में भाजपा को रोका जा सके और दूसरे चुनाव बाद प्रधानमंत्री पद की दावेदारी मजबूत की जा सके। संभवतः ममता यह संदेश भी देना चाहती हैं कि चुनाव बाद की विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस किसी भी हालत में एनडीए के साथ नहीं जाने वाली है।
दरअसल इसको लेकर भी राजनीतिक हलकों में सुगबुगाहट चल रही थी कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक कोशिश यह भी चल रही है कि अगर सरकार बनाने के लिए कुछ समर्थन की जरूरत पड़े तो टीएमसी को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार के साथ साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी के यह कहने को कि ममता दीदी अभी भी उन्हें कुर्ता उपहार में देती हैं, को इस रूप में लिया जा रहा था।
जाहिर है ममता के अपने तर्क और अपनी गणित हो सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री से बात कर लेने में भी कोई बुराई नहीं थी। दोनों बड़े नेताओं का यह झगड़ा कुछ-कुछ उसी तरह का लग रहा है जैसे कभी मोदी और नीतीश के बीच हुआ था। सन 2008 में आई कोसी में बाढ़ के मद्देनजर तत्कालीन मुख्यमंत्री गुजरात नरेंद्र मोदी की ओर से की गई आर्थिक मदद वापस कर दी थी। अन्य मुद्दों के अलावा नीतीश की आपत्ति इसको लेकर भी थी कि मोदी के बिहार दौरे के मद्देनजर पोस्टरों आदि के माध्यम से इस मदद का प्रचार किया गया था। नवीन पटनायक के बारे में यह आम बात है कि वह कम बोलने वाले मुख्यमंत्री हैं। शायद इसलिए तूफान को लेकर उन्होंने ऐसा कोई वक्तव्य नहीं दिया। लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से की गई प्रशंसा को राजनीतिक गलियारों में इस रूप में देखा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने चुनाव बाद की स्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसा किया है।
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दरअसल, नवीन पटनायक की बीजेडी कभी एनडीए के साथ रही है। हालांकि बीते काफी समय से वह एकला चलो की नीति पर चलती रही है। लेकिन माना जा रहा है कि अगर चुनाव परिणामों में भाजपा और एनडीए को बहुमत नहीं मिला और नए सहयोगियों की जरूरत पड़ी तो बीजेडी उनके साथ आ सकती है। इसलिए नवीन पटनाटक की प्रशंसा की गई। यह अलग बात है कि भाजपा ओडिशा में भी बीजेडी के खिलाफ बहुत मजबूती से लड़ रही है और इस चुनाव में उसकी कोशिश वहां से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की है। बहरहाल, चुनाव में जीत के लिए चुनावी राजनीति से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए, लेकिन क्या यह अच्छा नहीं होता कि इससे प्राकृतिक आपदा को किनारे रखा जाता और पूरी कोशिश पीड़ितों को हर संभव मदद पहुंचाने की होती।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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