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नक्सल मुक्त भारत अभियान में सीआरपीएफ की महत्वपूर्ण है भूमिका

भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में वामपंथी उग्रवाद-जिसे सामान्यतः नक्सलवाद कहा जाता है-एक समय देश के अनेक राज्यों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका था। दूरस्थ वन क्षेत्रों, सीमित प्रशासनिक पहुँच और विकास के अभाव ने इसे दशकों तक जड़ें जमाने का अवसर दिया।

किंतु पिछले वर्षों में इस पर निर्णायक नियंत्रण संभव हुआ है तो उसके केंद्र में सुरक्षा बलों की निरंतर कार्रवाई, बेहतर रणनीति और विकासोन्मुख दृष्टिकोण की संयुक्त भूमिका रही है। इस संघर्ष में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की भूमिका सबसे अधिक निर्णायक और व्यापक रही है।

CRPF

मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट दूरदृष्टि के बल पर देश के दुर्गम इलाकों तक विकास की किरण पहुंचाने का अभियान निरंतर जारी है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित की पहल से छत्तीसगढ़ के वे क्षेत्र भी मुख्यधारा से जुड़े, जो कभी प्रशासन की पहुंच से बाहर माने जाते थे। पोटाकपल्ली की ऐतिहासिक यात्रा आज भी सुरक्षा बलों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। इस अभियान ने न केवल विकास कार्यों को गति दी, बल्कि जवानों के मनोबल को भी नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ा और सुरक्षा के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं का विस्तार संभव हुआ।

9 फरवरी, 2026 को सुरक्षा बलों के लिए गौरव का क्षण उस समय आया जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने राज्य को नक्सल-मुक्त बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाने के लिए सीआरपीएफ और उसकी विशेष इकाई कोबरा के प्रयासों की सराहना की। मुख्यमंत्री ने बल के जवानों के निरंतर और समर्पित अभियानों को राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के लिए निर्णायक बताया और उनके योगदान को सम्मानित करते हुए स्मृति-चिह्न भेंट किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों की प्रतिबद्धता और साहस ने मध्य प्रदेश में शांति और विकास का मार्ग प्रशस्त किया है।

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि बालाघाट के नाम में ही बल है। इस जिले ने अपने आत्मबल से ही हिमालय जैसी कठिन चुनौती 'नक्सलवाद' का अंत करके दिखाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री श्री अमित शाह के नेतृत्व में देशभर में नक्सल उन्मूलन का माहौल बना। मध्यप्रदेश पुलिस ने प्रभावशाली अभियान चलाकर नक्सलियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और प्रदेश से लाल सलाम को आखरी सलाम किया। नक्सल उन्मूलन में हॉक फोर्स के वीर जवानों की भूमिका अभिनंदनीय है। बालाघाट में नक्सलियों द्वारा कभी खून की होली खेली गई, परंतु जवानों को वीरता, पुलिस की दृढ़ इच्छाशक्ति और जनता के विश्वास ने क्षेत्र को नक्सल आतंक की जंजीरों से मुक्त किया। राज्य सरकार वीर शहीद जवानों को 'अमर जवान ज्योति' के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित कर रही है। हम गर्व से कह सकते हैं कि मध्यप्रदेश की धरती अब नक्सलियों से मुक्त है।

नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में केवल हथियारों से जीत संभव नहीं होती; वहाँ जनता का विश्वास जीतना भी उतना ही आवश्यक होता है। सीआरपीएफ ने अपनी रणनीति को केवल ऑपरेशन-केंद्रित नहीं रखा, बल्कि "सुरक्षा के साथ संवेदनशीलता" के सिद्धांत पर कार्य किया। दुर्गम जंगलों में नए कैंप स्थापित करना, सड़क निर्माण को सुरक्षा देना, स्वास्थ्य शिविर लगाना और स्थानीय युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ना-इन पहलों ने प्रशासन और नागरिकों के बीच दूरी कम की।

सीआरपीएफ की विशेष कमांडो इकाई कोबरा ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सर्जिकल-स्तर के अभियानों के माध्यम से उग्रवादियों की क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर किया। सटीक खुफिया सूचना, आधुनिक तकनीक और जंगल युद्ध कौशल के कारण कई बड़े नेटवर्क ध्वस्त हुए, जिससे नक्सली गतिविधियाँ सीमित क्षेत्रों तक सिमटती चली गईं।

नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में एक बड़ा बदलाव तब दिखा जब सुरक्षा अभियानों के समानांतर विकास योजनाएँ तेज हुईं-सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग, शिक्षा और राशन वितरण जैसी सुविधाएँ पहुँचीं। इन कार्यों के लिए सुरक्षा वातावरण तैयार करने में सीआरपीएफ की भूमिका आधारशिला साबित हुई। जहाँ पहले प्रशासनिक दल जाने से हिचकते थे, वहाँ आज पंचायत, स्कूल और बाजार सामान्य रूप से चल रहे हैं।

जनजातीय और ग्रामीण समाज के साथ संवाद बढ़ाने के लिए खेल प्रतियोगिताएँ, भर्ती अभियान और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। इससे युवाओं के सामने बंदूक के बजाय रोजगार और सम्मानजनक जीवन का विकल्प मजबूत हुआ। नतीजतन उग्रवादियों की भर्ती घटने लगी और सामाजिक समर्थन कमजोर पड़ गया।

नक्सलवाद अब पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुआ, परंतु इसका दायरा ऐतिहासिक रूप से सबसे सीमित हो चुका है। यह उपलब्धि केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि शासन-व्यवस्था की पुनर्स्थापना का संकेत है। आने वाले समय में तकनीक-आधारित निगरानी, स्थानीय पुलिस के सशक्तीकरण और सतत विकास कार्यक्रमों के साथ इस अभियान को अंतिम मुकाम तक पहुँचाया जा सकता है। स्पष्ट है कि नक्सल-मुक्त भारत का लक्ष्य केवल एक सुरक्षा अभियान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पहुँच को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का प्रयास है-और इस परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में सीआरपीएफ के जवानों का साहस, अनुशासन और समर्पण सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरा है।

(लेखक यूथ फॉर ह्यूमन राइट्स के अध्यक्ष हैं)

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