Atique Ahmed Case: अपराधियों के सामने विवश क्यों समूची व्यवस्था?
एक पेशेवर अपराधी, जिसके खिलाफ 44 साल में 100 से अधिक संगीन मुकदमे दर्ज हुए हों, वह अगर 5 बार विधायक और 1 बार सांसद बन गया तो यह हमारी पूरी व्यवस्था के साथ ही समाज के लिए भी घनघोर शर्म की बात है।

Atique Ahmed Case: अतीक अहमद को प्रयागराज की एक निचली अदालत से पहली बार सज़ा भी हुई तो कब और किस मामले में? उमेश पाल के अपहरण के 17 साल पुराने मामले में। वह भी तब जब इसी साल 28 फरवरी को दिन-दहाड़े बीच सड़क पर उसे गोलियों से भून डाला गया। और यह उमेश पाल, जो इस व्यवस्था और न्यायपालिका से न्याय की गुहार लगाते-लगाते मार डाला गया, वह था कौन? वह भी एक विधायक राजू पाल की हत्या का मुख्य गवाह था।
विधायक राजू पाल की हत्या भी 18 साल पहले 2005 में ही कराई जा चुकी थी। लेकिन अब तक अपराधी अतीक अहमद और उसके कुनबे का बाल भी बांका नहीं हुआ। वह अपराध पर अपराध करता रहा और इस लोकतंत्र में चुनाव लड़ता रहा। और तो और, 2012 में जब वह जेल से यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ने चला, तो उसकी जमानत याचिका खारिज करने की हिम्मत इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों में भी नहीं हो सकी। 10 जज उसकी याचिका की सुनवाई से भाग खड़े हुए। आखिरकार 11वें जज ने उसे जमानत दे दी।
तो यह है हमारे लोकतंत्र और न्याय प्रणाली की वह कड़वी सच्चाई, जिसमें राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण के कारण पूरी व्यवस्था एक तरह से अपराधियों का पोषण और संरक्षण करती हुई एवं आम जनता का दलन और दमन करती नज़र आती है। अतीक अहमद के प्रसंग ने एक बार फिर से इस आपराधिक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है। आज भी यदि देश में नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती, तो शायद अगले 17 साल भी इस कुख्यात अपराधी का बाल बांका नहीं होता।
आप मानें न मानें, यूपी और बिहार समेत समूचे देश में ऐसे कुख्यात अपराधियों की लंबी फेहरिस्त है, जिनका या तो बहुत पहले ही एनकाउंटर हो जाना चाहिए था, या फिर जिन्हें न्यायिक प्रक्रिया द्वारा फांसी की सज़ा हो जानी चाहिए थी, लेकिन हुआ यह कि "कानून अपना काम करेगा... कानून अपना काम करेगा" के निरंतर जाप के बीच इन्हें संसद और विधानसभाओं में पहुंचाकर माननीय बनाया जाता रहा।
चुनाव विश्लेषण संस्था एडीआर ने स्वयं उम्मीदवारों के ही चुनावी हलफनामों का विश्लेषण करके बताया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जीते 43 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें भी 29 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ तो हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। केरल के 90 प्रतिशत, बिहार के 82 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 58 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश के 56 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल के 55 प्रतिशत सांसद दागी हैं। जब हम इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक स्थिति देखते हैं तो इस लोकतंत्र के अंदर कई राजनीतिक दल भी हमें अपराधियों के गिरोह और उन दलों के बड़े नेता भी अपराधियों के सरगना की तरह नज़र आते हैं।
सवाल है कि जब देश की संसद और राज्यों की विधानसभाएं, जिसमें हमारे लोकतंत्र की सारी शक्तियां निहित हैं, अपराधियों का अड्डा बन जाएं, तो समाज में अपराधियों का बोलबाला और आम जनता में अपराधियों की दहशत नहीं होगी तो क्या होगी? इस बड़े पैमाने पर राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण हो जाने के कारण हमारा लोकतंत्र आज कमोबेश अपराधियों का बंधुआ बनकर रह गया है। उनके खिलाफ कार्रवाइयां नगण्य हैं और वे पूरी शानो-शौकत के साथ निरंतर अपराध करते-कराते हुए, आम लोगों को अपना शिकार बनाते हुए ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीते रहते हैं।
कानून का खौफ आज इन अपराधियों में नहीं, बल्कि आम लोगों में है, जो कानून के डर से इन अपराधियों को खुलकर अपराधी भी नहीं कह सकते। इन्हें अपराधी कहने के बजाय ज्यादातर लोग इन्हें माननीय और कुछ लोग दबी ज़ुबान में बाहुबली कहते हैं, क्योंकि अगर अदालत इन्हें कभी भी दोषी नहीं ठहराए, तो कानूनन इन्हें कभी भी अपराधी नहीं कहा जा सकता।
किसी भी लोकतंत्र के पांच स्तंभ होते हैं- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और समाज। इनमें समाज का तो आजकल कोई जिक्र भी नहीं करता। सभी लोकतंत्र के चार स्तंभों का ही जिक्र करते हैं, क्योंकि कानून और संविधान ने समाज की सारी शक्तियां छीन ली हैं। मतलब समाज को पूरी तरह से भूमिका-विहीन और नपुंसक बना देने की साज़िश है। इसका असर भी स्पष्ट है।
आज अपराधियों के प्रति समाज में प्रतिरोध नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण दिखाई देता है। लोकतंत्र के उजले बैनर तले कानून और संविधान के राज वाले इस देश में आज किसी की यह हैसियत नहीं कि वह किसी अपराधी को छू भी सके। कोई अपराधी यदि बीच चौराहे पर चार लोगों का कत्ल कर दे या चार स्त्रियों का बलात्कार कर डाले, तो भी समाज को यह अधिकार नहीं कि वह उसे चार जूते लगा सके। बल्कि समाज का कर्तव्य यह निर्धारित किया गया है कि वह उस अपराधी को पकड़कर बाइज्जत कानून के हवाले कर दे, ताकि सैकड़ों मुकदमे हो जाने के बाद भी अगले 44 साल तक उसे सज़ा न हो सके और वह उसी समाज की छाती पर माननीय बनकर बैठ जाए और समाज को मजबूरी में उसकी जय-जयकार करनी पड़े।
समाज को इस प्रकार से हताश कर देने के लिए आज केवल विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया को ही नहीं, न्यायपालिका को भी कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। अब समय आ गया है, जब न्यायपालिका की भी आंख में आंख डालकर उसे बताया जाना चाहिए कि आपके भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और लेट-लतीफी के कारण देश में जंगलराज जैसी स्थिति बन चुकी है।
देश के कानून मंत्री किरण रिजिजू द्वारा राज्यसभा में दिये लिखित वक्तव्य के मुताबिक, 31 दिसंबर 2022 तक देश की अदालतों में लगभग 5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। इनमें 4.32 करोड़ मामले निचली अदालतों में, 59.87 लाख मामले उच्च न्यायालयों यानी हाई कोर्ट में और 69.51 हज़ार मामले उच्चतम न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
ज़रा सोचिए, 130 करोड़ की आबादी वाले देश में 5 करोड़ मुकदमों का लंबित होना हमारी कानून और न्याय व्यवस्था के फेल होने का प्रमाण नहीं तो और क्या है? 5 करोड़ लंबित मुकदमों का मतलब समझते हैं आप? हर मुकदमे में कम से कम दो पक्ष होते हैं और यदि उस मुकदमे के कारण हर पक्ष से औसतन 5-6 लोगों का परिवार भी पीड़ित और प्रभावित हो, तो हर मुकदमे से औसतन 10-12 लोग पीड़ित और प्रभावित हो रहे हैं।
यानी देश में लंबित 5 करोड़ मुकदमों से इस समय लगभग 50 से 60 करोड़ लोग पीड़ित और प्रभावित हैं, जो कि देश की लगभग आधी आबादी है। तो जिस देश की लगभग आधी आबादी कानून और न्याय व्यवस्था के निकम्मेपन की मारी हो, उस देश को कानून और न्याय से संचालित कैसे माना जा सकता है?
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याद रखिए, जब कभी भी हमारी न्याय-व्यवस्था पंगु हो जाएगी, तो अन्याय से बचने के लिए लोगों में गैर-न्यायिक तरीके अपनाने का समर्थन भी बढ़ता जाएगा। इसलिए अब भी यदि अदालतों की आंख में आंख डालकर उन्हें आईना नहीं दिखाया गया, तो समाज में उनका सम्मान कम होता जाएगा और लोगों में उनकी अवमानना करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाएगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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