Atique Ahmed Convicted: योगीराज में खत्म हुआ अतीक का आतंक
योगीराज में अंतत: अतीक अहमद का आतंक खत्म हो गया है। अब वह एक सजायाफ्ता मुजरिम है। जिस प्रदेश में उस पर कोई जुर्म साबित नहीं हो पाता था, उसी राज्य में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी है।

Atique Ahmed Convicted: प्रयागराज में जिस माफिया डॉन अतीक अहमद के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी की नहीं होती थी, पुलिस और प्रशासन जिसके इशारे पर नाचता था, चार दशक से जिसका आतंक पूरे प्रदेश में था, जिसके खौफ से जज उसके मामलों में सुनवाई से इनकार कर देते थे, उसी प्रयागराज में मंगलवार को अतीक ने अपनी आंखों से अपने खौफ के साम्राज्य को ढहते हुए देखा।
कोर्ट परिसर में पुलिस सुरक्षा में मौजूद अतीक अहमद को उसके सामने ही वकीलों ने अपशब्द कहे और मां बहन की गालियां भी दीं। एक वकील अतीक को जूतों की माला पहनाने के लिये बेखौफ अंदाज में नजर आया। लेकिन अतीक अहमद बेबसी में अपनी आंखों के सामने अपने 44 साल के आतंक के किले को ढहते हुए देखता रहा। उसके चेहरे के बदलते भाव बता रहे थे कि कभी ताकत के मद में बेखौफ रहने वाला अतीक योगीराज में आज खुद को कितना असहाय पा रहा है।
दरअसल, कुख्यात माफिया डॉन अतीक अहमद पर पहला मुकदमा वर्ष 1979 में दर्ज हुआ था। फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, उस पर एक-एक करके वर्ष 2023 तक 101 मामले दर्ज हो गये, जिसमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, रंगदारी, साजिश, जमीनों पर कब्जा, लूट, छिनैती जैसे संगीन मामले शामिल हैं, लेकिन उसकी हनक इतनी थी कि चार दशक तक कोई भी सरकार, पुलिस और अभियोजन उसे एक भी मामले में सजा नहीं दिला पाये।
चार दशक में पहली बार है कि अतीक अहमद को किसी मामले में सजा सुनाई गई है। यह इसलिये संभव हो सका क्योंकि योगी सरकार ने अपराध को लेकर जीरो टालरेंस की नीति अपनाई तथा अपराधियों को कोई खुला संरक्षण नहीं दिया जिससे कि पुलिस प्रशासन में कोई गलत संदेश जाये। इसका परिणाम यह रहा कि पुलिस और अभियोजन ने बेखौफ होकर काम किया और अतीक समेत तीन को आजीवन करावास की सजा दिलाने में सफल रहे।
अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे अपराधी पिछली सरकारों में किस कदर बेखौफ थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दोनों ने विधायकों तक की हत्या कराने से परहेज नहीं किया। उत्तर प्रदेश में कई दूसरे माफिया भी हैं, लेकिन किसी में इतना साहस नहीं था कि किसी जनप्रतिनिधि की हत्या करायें, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते इन्हें जो सत्ता का संरक्षण प्राप्त था, उसने इन दोनों को बेखौफ कर दिया था।
इसी बेखौफ के बल पर मुलायम सिंह यादव की सरकार में अतीक अहमद ने 25 जनवरी 2005 को बसपा विधायक राजू पाल की सरेआम हत्या कराई तो उसी साल 29 नवंबर को मुख्तार अंसारी ने भाजपा विधायक कृष्णानंद राय को गोलियों से छलनी करा दिया। इस हमले में कृष्णानंद राय समेत कुल 7 लोगों की मौत हुई। यह इसलिये संभव हो पाया कि तब मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, और मुस्लिमपरस्ती के नाम पर इन दोनों अपराधियों को खुलेआम मुलायम का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।
मुलायम सिंह की सरकार में वर्ष 2003 और 2004 में अतीक अहमद पर से कई संगीन मुकदमे वापस ले लिये गये। कई मामलों में मुकदमे ही दर्ज नहीं हुए। इतना ही नहीं, मुस्लिम विरोधी छवि वाली भाजपा की राजनाथ सिंह सरकार ने भी 2001 में अतीक अहमद से मुकदमे वापस लिये थे। कई मामलों में पुलिस ने राजनीतिक दबाव के चलते एफआर लगाकर मामले से इन दोनों अपराधियों को बाहर कर दिया, जिसके चलते यह और बेखौफ होते चले गये।
समाजवादी सरकार में अल्पसंख्यक समुदाय वाले अपराधियों को मुलायम सिंह यादव का इतना संरक्षण प्राप्त था कि सेना के भगोड़े से एलएमजी हथियार खरीदने की कोशिश करने वाले मुख्तार अंसारी को बचाने के लिये एक डिप्टी एसपी तक की बलि ले ली गई थी। मुलायम ने एलएमजी बरामद करने वाले तथा मामले की जांच कर रहे डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह को धमकाते हुए मुख्तार अंसारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया।
ऐसा करने से इनकार करने पर मुलायम सरकार ने शैलेंद्र सिंह को इतना प्रताड़ित किया कि उन्होंने डिप्टी एसपी की नौकरी से ही इस्तीफा दे दिया। इस तरह के प्रकरणों ने मुख्तार और अतीक जैसे सत्ता पोषित अपराधियों का आतंक बढ़ाया तथा पुलिस का मनोबल तोड़ा। टूटे मनोबल के चलते पुलिस और अभियोजन इन अपराधियों के खिलाफ सबूत जुटाने और कार्रवाई करने से बचती रही, जिसके चलते दशकों तक इन अपराधियों के खिलाफ कोई भी मामला ट्रायल तक नहीं पहुंच सका।
अतीक और मुख्तार समाजवादी सरकार में इतना बेखौफ थे कि बड़े से बड़ा अपराध करने में उन्हें डर नहीं लगता था। अतीक का आतंक इस कदर था कि वर्ष 2012 में दस जजों ने उसके मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। अखिलेश के मुख्यमंत्रित्व काल 2012 में अतीक ने सोनिया गांधी के रिश्तेदार की जमीन पर ही कब्जा कर लिया। बाद में पीएमओ से नाराजगी जताये जाने के बाद उसने कब्जा छोड़ा।
ऐसे प्रदेश में जहां परोक्ष रूप से अपराधी सत्ता तंत्र पर हावी थे वहां पहली बार संगठित अपराध एवं अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की शुरुआत योगी आदित्यनाथ ने की। मुख्यमंत्री बनते ही योगी ने सत्ता पोषित माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ उनके आर्थिक साम्राज्य पर भी बुलडोजर चलवाना शुरु कर दिया। पुलिस को फ्री हैंड दिया गया। योगी सरकार में ही दशकों से अपराध करने के बावजूद सजा पाने से बचते आ रहे अपराधियों के खिलाफ मुकदमों को ट्रायल पर ले जाने और कोर्ट में जोरदार पैरवी की शुरुआत हुई।
नतीजा सामने है कि मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, सुधीर सिंह, विजय मिश्रा, ध्रुव सिंह कुंटू, खान मुबारक, बदन सिंह बद्दो, सुंदर भाटी, योगेश भदौड़ा, संजीव जीवा, उधम सिंह, अनिल दुजाना, सुशील मूंछ, अंकित गुर्जर, अनिल भाटी जैसे तमाम कुख्यात अपराधियों तथा इनके गैंग के खिलाफ कार्रवाई हुई। पैरवी करके इनमें से कई अपराधियों को कोर्ट से सजा दिलवाई गई। इनके अवैध साम्राज्य पर बुलडोजर चला। इनमें से कई आज जेल की सलाखों के भीतर बंद हैं।
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हालांकि योगी सरकार पर बृजेश सिंह और धनंजय सिंह जैसे माफियाओं पर नरमी बरते जाने के आरोप भी लगते रहे हैं। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में अपराधियों को सजा दिलाये जाने के मामले में तेजी आई है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के साथ अपराध करने वालों के खिलाफ सजा दिलाने में यूपी सबसे आगे हैं। 2022 में यूपी में महिला अपराध में 59.1 फीसदी मामलों में सजा दिलाई गई है, जो राष्ट्रीय औसत 26.6 से दोगुना है। महिला एवं बाल अपराध के मामलों में 36 अपराधियों को फांसी तथा 1296 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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