Crimes: क्यों हो रही हैं मामूली बातों पर हत्याएं?

2 अक्टूबर को सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी का जन्मदिन था लेकिन उसी दिन उत्तर प्रदेश के देवरिया में सत्य प्रकाश दूबे सहित 6 लोगों की हत्या की खबर आयी थी। पहले सत्य प्रकाश दूबे ने प्रेमचंद्र यादव नामक एक व्यक्ति की हत्या कर दी, बदले में प्रेमचंद यादव के परिवार और उसके गनर ने दूबे परिवार को नेस्तनाबूत कर दिया। पलक झपकते सात जिंदगियां समाप्त हो गयीं। इन हत्याओं के पीछे लॉ एण्ड आर्डर एक पहलू है जिसकी खूब चर्चा हुई, लेकिन दूसरे सामाजिक पहलू पर बात नहीं हुई।

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प्रेमचंद यादव समाजवादी पार्टी का स्थानीय नेता था। उसने अपना इतना दबदबा कायम कर लिया था कि लोगों की जमीन कब्जाने लगा था। इसी में सत्य प्रकाश दूबे का विधुर भाई था जिसके हिस्से की पांच बीघा जमीन प्रेमचंद ने धोखे से अपने नाम करवा ली थी। विवाद बढ़ता गया। दूबे परिवार धोखाधड़ी का आरोप लगाकर कोर्ट कचहरी तक गये, लेकिन कोई फैसला आता इसके पहले ही दोनों ने जैसे इस संसार से जाने का फैसला कर लिया था। जमीन जहां थी, वहीं रह गयी लेकिन उस पर रहनेवाले न प्रेमचंद यादव बचे और न सत्य प्रकाश दूबे।

इस हत्याकांड की बजाय अगर दोनों पक्ष आपसी समझदारी से काम लेते और मिल बैठकर कोई रास्ता निकालते तो ऐसी समस्याओं का हल निकलना ज्यादा कठिन भी नहीं था। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र हों या शहरी, छोटी छोटी बातों पर होनेवाले झगड़े और झड़पें बढ़ती जा रही हैं। हर गांव, गली मोहल्ले में छोटी-छोटी बातों को लेकर बड़े बड़े टकराव हो रहे हैं। जमीन जायदाद का झगड़ा तो एक तरफ, कुत्ते बिल्ली को लेकर कत्ल तक हो जाते हैं।

इसी साल अगस्त के महीने में इंदौर के खजराना क्षेत्र के एक मोहल्ले में एक गार्ड राजपाल रात में अपना कुत्ता घुमाने निकला था। इतने में उसके पड़ोसी का कुत्ता वहां आ गया। दोनों के कुत्ते आपस में लड़ने लगे। इस बात पर दोनों पक्षों में कहा सुनी हो गयी। बात इतनी बढ़ी कि गार्ड जिसके पास लाइसेन्सी बन्दूक थी, उसने बंदूक से अंधाधुंध फायर कर दिया। इसमें दो लोग मारे गये और अन्य 6 लोग घायल हो गये।

इसी साल अप्रैल महीने में बेंगलुरू से खबर आयी थी कि वहां बुजुर्ग को तीन लोगों ने मिलकर मार डाला था। बजुर्ग जहां रहते थे उस घर के सामने एक पालतु कुत्ता रोज आकर टट्टी कर जाता था। इस बात को लेकर कुत्ता मालिकों और उनके बीच सालभर से विवाद चल रहा था। एक दिन बात बढ़ी तो कुत्ते के मालिक रवि, उनकी पत्नी और डॉग ट्रेनर तीनों ने मिलकर उस बुजुर्ग मुनिराजू को इतना मारा कि उनके प्राण पखेरू उड़ गये। कुछ ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में आया था जहां इसी साल फरवरी में एक कुत्ते के पिल्ले को लेकर कुछ स्थानीय दबंगों ने एक बुजुर्ग किशनलाल की हत्या कर दी थी और उनकी बहू बचाने आयी तो उसको भी मारकर लहुलुहान कर दिया।

राजस्थान में भरतपुर के अड्डा गांव में अभी कल ही बुधवार 25 अक्टूबर को ही जमीन के विवाद में एक व्यक्ति निरपत गुर्जर (35) की जिस निर्ममता से हत्या की गयी है वह दिल दहला देनेवाली है। भरतपुर के बयाना में दो पक्षों में जमीन को लेकर विवाद था जिसके बाद बुधवार की सुबह दोनों पक्ष लाठी डंडे के साथ एक दूसरे के सामने खेत में ही डट गये। इसी बीच निरपत गुर्जर धक्का मुक्की में जमीन पर गिर गये। निरपत के भाई ने ही उसके ऊपर से ही ट्रैक्टर दौड़ा दिया, वह भी एक बार नहीं बल्कि 8 बार। परिवार के लोग उसके आगे हाथ जोड़कर रोकते रहे लेकिन क्रोध के वशीभूत उसने निरपत की निर्ममता से हत्या करके ही ट्रैक्टर रोका। इस घटना का एक दुखद और विषादपूर्ण पहलू यह भी है आसपास खड़े लोग उसे रोकने की बजाय वीडियो बनाने में लगे रहे।

कल 25 अक्टूबर बुधवार को ही यूपी के हापुड़ में एक नौजवान की पीट पीटकर हत्या कर दी गयी। दो नौजवानों में सिर्फ बाइक हटाने को लेकर कहा सुनी हुई। कहासुनी इतनी बढ़ गयी कि मारपीट शुरु हो गयी जिसमें एक नौजवान के सिर में इतनी गंभीर चोट आयी कि उसकी जान चली गयी। कल ही दिल्ली के तिमारपुर में एक 17 साल के किशोर की हत्या उसके कुछ जाननेवालों ने ही कर दी। पुलिस के मुताबिक किसी लड़की से बातचीत का मामूली विवाद था लेकिन बात इतनी बढ़ी कि 17 साल के आर्यन की जान उसके अपने परिचितों ने ही ले ली।

यहां सिर्फ कुछ उदाहरण दिये गये हैं, वरना अखबार और पोर्टल ऐसी हत्याओं की खबरों से भरे पड़े हैं। छोटी छोटी बात पर जहां हत्याएं होती हैं उनमें सामान्यतया यही दिखता है कि जो लोग ऐसी हत्या करके अपराधी बन जाते हैं उनमें से कोई भी पेशेवर हत्यारा नहीं होता। वो सब क्रोध और अहंकार के एक क्षणिक आवेग का शिकार होते हैं और कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिससे एक जीवन तो समाप्त होता ही है, उनका अपना और परिवार का जीवन भी नष्ट हो जाता है। फिर बाकी का जीवन कोर्ट कचहरी और थाना पुलिस का चक्कर लगाते बीतता है।

एनसीआरबी का 2021 का जो डाटा है उसके मुताबिक औसत हर दिन भारत में 82 हत्याएं होती हैं। इसमें उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। उसके बाद बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल आते हैं। दिल्ली जैसे छोटे राज्य में इस अकेले एक साल में 478 हत्याएं की गयीं। इनमें से अधिकांश हत्या का कारण आमतौर पर ऐसी बातें ही होती हैं जिनको व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक स्तर पर हल किया जा सकता है। या फिर थोड़ा धैर्य और संयम से काम लें तो किसी की जान पर नहीं बन आयेगी।

लेकिन ऐसा लगता है कि गांव हो या शहर, लोगों के मन से धैर्य और समझ का पारा लगातार गिर रहा है जबकि क्रोध और हिंसा का पारा लगातार बढ़ रहा है जिसका दुखद परिणाम कभी कभी हत्या के रूप में भी सामने आता है। इसे सिर्फ लॉ एण्ड आर्डर की समस्या मानने की बजाय इसे समाज की समस्या भी समझना चाहिए। प्रशासन ही नहीं सामाजिक स्तर पर भी इसके बारे में चर्चा और संवाद होना चाहिए। भारतीय समाज में आज भी अपराध रोकने के लिए सामाजिकता किसी भी प्रकार की पुलिस व्यवस्था से ज्यादा कारगर और प्रभावी है। सरकारी व्यवस्था को भी इस सच को नकारने के बजाय इसे स्वीकारना चाहिए ताकि नागरिक समाज में सुख शांति बनी रहे और हत्या जैसे जघन्य अपराध की संख्या में भी कमी आये।

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