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Geeta Press: गीता प्रेस को बदनाम करने की साजिश

Geeta Press: अभी कुछ दिनों पहले भारत सरकार ने साल 2021 का गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस गोरखपुर को देने की घोषणा की। जिसके बाद कांग्रेस प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने ट्वीट कर कांग्रेस पार्टी की तरफ से इस पर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने अपने अधिकारिक ट्विटर हैंडल से अक्षय मुकुल की पुस्तक 'गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया' का हवाला देते हुए कहा कि गांधी और गीता प्रेस के बीच संबंधों में खटास रहती थी। यह खटास राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर थी। अपने इस ट्वीट में जयराम रमेश यहां तक कह गये कि गीता प्रेस को यह पुरस्कार मिलना एक तरह से सावरकर और गोडसे को पुरस्कार देना है।

अब सवाल पैदा होता है कि क्या वास्तव में जयराम रमेश ने यह किताब पढ़ी है या नहीं? या सिर्फ विरोधाभास पैदा करने के लिए उन्होंने ये बातें कही? हालांकि, इस ट्वीट के कुछ ही घंटों बाद अक्षय मुकुल ने अपनी किताब का एक अंश 'द वायर' में शेयर कर दिया। जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी और गीता प्रेस से जुड़े हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा जयदयाल गोयन्दका से जुड़ी कुछ बातें लिखी हैं।

controversy over Gandhi Peace Prize to Geeta Press

इसके बाद, कई वेबसाइट, अखबारों और सोशल मीडिया पर एक संगठित ग्रुप ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया कि गीता प्रेस को गांधी के नाम से जुड़ा पुरस्कार कैसे दिया जा सकता है? मगर इस बीच इन्होंने या किसी ने भी यह जानने की कोशिश नहीं कि आखिर अक्षय मुकुल ने ऐसा कौन सा तथ्य लिखा है जो गीता प्रेस और महात्मा गांधी के बीच तनाव भरे रिश्तों की बात करता हो।

इसलिए जयराम रमेश के दावों को अक्षय मुकुल की किताब के माध्यम से ही समझने की कोशिश करते हैं। पॉइंट-टू-पॉइंट इन दावों को अन्य किताबों के माध्यम से कसौटी पर कसने का प्रयास करेंगे। साथ ही जानेंगे कि आखिर इन दावों में कितनी सच्चाई है? या फिर यह सब सनसनी फैलाकर गीता प्रेस को बदनाम करने की साजिश के अलावा और कुछ नहीं है।

अक्षय मुकुल ने अपनी किताब के पेज संख्या 50 पर गांधी और पोद्दार के संबंधों का जिक्र किया है। वह शुरुआत में लिखते हैं कि पोद्दार और जमनालाल बजाज एक-दूसरे के करीबी थे। जिसके चलते पोद्दार को लोकमान्य तिलक और गांधी से कलकत्ता में मिलने का मौका मिला। तिलक के निधन के बाद पोद्दार ने गांधी के साथ दीर्घकालिक संबंध बनाये रखे। इस दौरान पोद्दार न सिर्फ कांग्रेस के अधिवेशनों में शामिल हुए बल्कि क्रांतिकारियों के संपर्क में भी आये। इसी बीच गीता, हिन्दुइज्म, कांग्रेस की नीतियों, अल्पसंख्यक और जाति के मुद्दे पर दोनों के विचारों में भिन्नता सामने आती रही। फिर भी शालीनता बरकरार रही। मगर 1940 की शुरुआत में पोद्दार का गांधी और कांग्रेस दोनों से मोहभंग हो गया, जोकि कल्याण के अंकों में साफ दिखाई देता है।

बतौर अक्षय मुकुल इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पोद्दार और गांधी लम्बे समय तक एक-दूसरे को जानते थे। दोनों के आपसी रिश्ते मधुर थे। थोड़े-बहुत वैचारिक मतभेद थे लेकिन वे भी सभ्यता के दायरे में सीमित थे। इस नाते देखें तो जयराम रमेश द्वारा गांधी और पोद्दार के बीच विरोधाभास पैदा करने वाले ट्वीट पर संशय पैदा होता है। फिर भी इस विषय को और अधिक समझने की कोशिश करते हैं क्योंकि अक्षय मुकुल ने आगे भी कुछ और बातें कही हैं जिनका स्पष्टीकरण जरुरी है।

अक्षय मुकुल आगे गांधी और पोद्दार के संबंधों का जिक्र करते हुए बताते है कि कैसे पोद्दार ने गांधी के बेटे की गोरखपुर जेल में सहायता की। जिसके बाद गांधी ने पोद्दार को धन्यवाद भी कहा। फिर पूना पैक्ट और अस्पृश्यता जैसे मुद्दों पर आपसी वैचारिक भिन्नता पर भी किताब में लिखा गया है। वह पोद्दार के एक सपने की बात करते हैं जिसके संदर्भ में गांधी के साथ उनका पत्राचार हुआ। अक्षय मुकुल के अनुसार इन सबके बावजूद भी दोनों के रिश्तों में गर्मजोशी बनी रही।

इसके बाद अक्षय मुकुल 1940 की एक घटना पर आकर रुक जाते हैं। दरअसल, इस साल जमनालाल बजाज ने गौसेवा संघ की स्थापना की। बजाज ने इस विषय पर पोद्दार को एक पत्र लिखा और कहा कि गांधी चाहते हैं कि आप इस संघ से जुडें। जिसका जवाब पोद्दार ने गोरखपुर से भेजा कि मैं गांधी के कई कामों और विचारों को समझ नहीं पा रहा हूँ। कई मामलों में मेरा दिल उन सबके खिलाफ रहता है।

फिर अक्षय मुकुल ने इस एक सन्दर्भ को सीधे 1948 में महात्मा गांधी की हत्या से जोड़ दिया। इसके समर्थन में उन्होंने लिखा है कि वह 1921 में पोद्दार कांग्रेस से अलग हो गये। उसके बाद वह हिन्दू महासभा से जुड़ गये और 1946 में महासभा के गोरखपुर के मुख्य कर्ताधर्ता थे। इस दौरान कल्याण ने भी महात्मा गांधी पर जोरदार हमला बोला हुआ था।

अक्षय मुकुल ने सीधे तौर तो कुछ नहीं कहा। मगर यह स्थापित करने की कोशिश की है कि महात्मा गांधी की हत्या के जिम्मेदार यह सब कारक भी थे। वास्तव में यह गांधी और पोद्दार के बीच एक काल्पनिक विरोध पैदा करने की कोशिश है। अपनी इन बातों को और अधिक जोर देने के लिए अक्षय मुकुल ने उद्योगपति जी.डी. बिड़ला का हवाला देकर कहा है कि गीता प्रेस के हनुमान प्रसाद पोद्दार और जयदयाल गोयन्दका सनातम धर्म नहीं बल्कि 'शैतान धर्म' का प्रसार कर रहे थे। किताब के अनुसार यह बात बिड़ला ने गांधी हत्या के बाद ही 1948 में कही थी।

अक्षय मुकुल ने अपनी किताब में यह जिक्र 58वें पेज पर किया है। उन्होंने इसका सन्दर्भ मेधा एम. कुदैस्य की किताब 'द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जी.डी. बिड़ला के हवाले से दिया है। मेधा ने सनातन को 'शैतान' कहने वाला यह सन्दर्भ पेज 270 पर लिखा है। गौरतलब है कि मेधा ने यह बात कहां से ली, उसका कोई प्राथमिक दस्तावेज अथवा सन्दर्भ नहीं दिया है।

जी.डी. बिड़ला यानी घनश्याम दास बिडला पर सबसे पुरानी पुस्तक राम निवास जाजू ने 'मरुभूमि का वह मेघ - श्री घनश्याम दास बिड़ला का जीवन चरित और जीवन दर्शन' लिखी है। यह राजपाल एंड संस द्वारा साल 1985 में (द्वितीय संस्करण) प्रकाशित हुई। जाजू का कहना है कि वह कई दशकों तक बिड़ला परिवार के नजदीकियों में एक थे। इस किताब में गांधी के निधन का तो जिक्र है लेकिन बिड़ला ने शैतान और सनातन जैसी कोई बात कही हो, उसका कोई उल्लेख नहीं है।

हां, इस किताब के पेज संख्या 317 पर एक दिलचस्प वाक्या जरुर मिलता है। साल 1982 में जी.डी. बिड़ला ने महात्मा गांधी पर एक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि गांधीजी मतभेदों का बड़ा आदर करते थे। बिड़ला ने आगे बताया कि आप मेरा और गांधीजी का पत्र-व्यवहार देख लीजिये। उससे आपको पता चलेगा कि मेरे और उनके बीच भी मतभेद थे।

जी.डी. बिड़ला ने महात्मा गांधी को समर्पित एक किताब 'इन द शेडो ऑफ द महात्मा' लिखी थी। यह किताब साल 1953 में यानी गांधी हत्या के बाद प्रकाशित हुई। गौरतलब है कि इस 337 पेजों की किताब में कहीं भी हनुमान प्रसाद पोद्दार और जयदयाल गोयन्दका का कोई जिक्र नहीं है। न ही कोई सनातन और शैतान जैसे शब्द मिलते हैं।

अगर बिड़ला कुछ ऐसा सोचते तो कुछ इस बारे में अपने नजदीकियों को बताते अथवा खुद की लिखी किताब में जिक्र करते? मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। दरअसल, आपसी वैचारिक मतभेद होना कोई आरोप नहीं है। यह साधारण सी बात अक्षय मुकुल ने समझने में गलती की है। उन्होंने गांधी और पोद्दार के कुछ सन्दर्भों का हवाला देते हुए काल्पनिक मतभेदों को जबरन पैदा करने का प्रयास किया है। जिसे बिना किसी तथ्य या तर्क के उन्होंने सीधे गांधी हत्या से जोड़ दिया। अगर उनका यही तर्क है तो वह जी.डी. बिड़ला पर भी लागू होना चाहिए। जबकि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि उनके और गांधी के बीच मतभेद रहा करते थे।

इसके आगे अक्षय मुकुल लिखते हैं कि गांधी हत्या के बाद कल्याण के फरवरी और मार्च के अंकों में गांधी का कोई उल्लेख क्यों नहीं था? अपने इस तथ्य को मजबूती देने के लिए उन्होंने लिखा है कि 1949 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रतिबंध हटा तो पोद्दार का संघ और गुरु गोलवरकर दोनों से अच्छा सम्बन्ध बन गया था।

वैसे संघ का भी गांधी हत्या से कोई लेनादेना नहीं था। यह तथ्य सरदार पटेल के पत्राचारों से लेकर न्याययिक प्रक्रियाओं में दर्ज है। मगर इस दौरान अक्षय मुकुल इन मतभेदों को गांधी हत्या से जोड़ने के चक्कर में कई तथ्यों का जिक्र करना या तो भूल गये अथवा उन्होंने जानबूझकर नहीं किया।

दारासल, जिस साल गांधी की हत्या हुई उसी साल यानी 1948 में कल्याण का विशेषांक 'नारी अंक' प्रकाशित हुआ। जिसमें महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी के बारे में एक अध्याय शामिल किया गया था। तब पत्रिका के संपादक पोद्दार ही थे। पत्रिका के अनुसार, "कस्तूरबा में अपार शौर्य और साहस था और वह गुण विद्यमान थे, जो गांधीजी जैसे नर-रत्न की धर्मपत्नी के लिए आवश्यक थे। वह राष्ट्र की सच्ची सेविका थी।"

कल्याण के इस अंक में कस्तूरबा गांधी की जमकर प्रशंसा की गयी है। उनके साथ महात्मा गांधी का भी नाम जोड़ा गया है। बताया गया है कि गांधी को महान बनाने में कस्तूरबा गांधी का एक अहम योगदान था। फिर 1950 में कल्याण का 'हिन्दू संस्कृति' विशेषांक आया। जिसमें महात्मा गांधी पर पूरा एक अध्याय प्रकाशित किया गया। इसमें लिखा है, "विश्व में अनेक सुख्यात राजनैतिक पुरुष हुए हैं और होते रहेंगे। किन्तु महात्माजी के समान विश्व की संस्कृतियों में एक झंकार उत्पन्न पैदा कर देने वाले महापुरुष सदा विश्व में नहीं आया करते। ऐसे महापुरुष तो कभी-कभी मानव समुदाय को जाग्रत करने, उसे दैवी प्रकाश प्राप्त करने का दिव्य सन्देश देने ही आते हैं।" पत्रिका ने आगे लिखा है, "बापू ने भारत को केवल स्वाधीनता ही नहीं दी। यद्यपि कांग्रेस के वे सदा प्राण रहे। हमारे आन्दोलन, और हमारी स्वाधीनता उन्हीं के तप, त्याग, मार्गदर्शन और लोकोत्तर व्यक्तिव्य के पुरुष्कार है।" इसके बाद कल्याण का 'संत वाणी' अंक आया, उसमें भी महात्मा गांधी के विचारों को स्थान दिया गया था।

निष्कर्ष

अक्षय मुकुल ने काल्पनिक बातें जोड़कर प्रयास किया था कि गांधी हत्या को किसी न किसी तरह पोद्दार और गीता प्रेस से जोड़ दिया जाये। हालांकि वह इसमें सफल नहीं हुए है। क्योंकि इस सन्दर्भ में कोई ठोस दस्तावेज उन्होंने उपलब्ध नहीं कराये है। सिर्फ कुछ विषयों पर वैचारिक मतभेद होने को गांधीजी की हत्या से जोड़ने का आधार बना दिया है। जबकि मतभेद तो महात्मा गांधी के बिड़ला सहित सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू के साथ भी रहा करते थे। साथ ही गांधी हत्या के बाद 'कल्याण' के अधिकतर अंकों में महात्मा गांधी का जिक्र मिलता है। यानी कल्याण के संपादक ने गांधी के निधन के बाद उनसे मुंह नहीं मोड़ा। अंत में, गीता प्रेस के एक कार्यक्रम में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने शिरकत की थी। वह पोद्दार और गोयन्दका के आमंत्रण पर ही गोरखपुर आये थे। मगर इस बात का जिक्र अक्षय मुकुल ने जानबूझकर नहीं किया है। इन सब तथ्यों से यह स्पष्ट है कि अक्षय मुकुल ने किसी षड्यंत्र के तहत गीता प्रेस को बदनाम करने के लिए ही 'गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया' पुस्तक लिखी और हिंदू धर्म से घृणा करने वालों ने उस पुस्तक का प्रचार प्रसार उसी साजिश के तहत किया।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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