72 Hoorain: कलात्मक व्यंग का बेहतरीन उदाहरण है विवादित फिल्म ‘72 हूरें’

72 Hoorain:'72 हूरें' टाइटिल ही ऐसा था कि थिएटर वाले रिलीज करने को तैयार नहीं थे, इसलिए ये मूवी पिछले चार साल से डब्बे में बंद पड़ी थी। कहा जाता है कि ओटीटी वाले भी मुस्लिमों की भावनाओं को आहत करने वाले टाइटिल की इस मूवी को रिलीज करने को राजी नहीं थे। यहां तक कि इस फिल्म के निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान को 2019 में बनी फिल्मों के लिए जब नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला तो लोग हैरान थे कि इस तरह की फिल्म के लिए इतना प्रतिष्ठित पुरस्कार कैसे दिया जा सकता है। उन लोगों में सभी वही थे, जिन्होंने ये मूवी देखी नहीं थी। बावजूद नेशनल फिल्म अवॉर्ड के यह मूवी रिलीज नहीं हो पाई थी। निर्माता कैप्टन गुलाब सिंह तंवर और सह निर्माता अशोक पंडित तो शायद रिलीज की उम्मीद ही छोड़ चुके थे, लेकिन माहौल देश का ऐसा बना कि उन्होंने रिस्क ले ही लिया। अब जाकर पता चला है कि इस मूवी के बारे में जैसा लोगों ने सोचा था, मूवी वैसी नहीं है। विषय भले ही विवादित हो लेकिन ये एक ऐसा 'कलात्मक व्यंग्य' है, मानो जिसे खासतौर पर अवॉर्ड्स के लिए ही बनाया गया हो।

कहानी है आंतकवादियों के दो भूतों की, जो मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया में बम ब्लास्ट के बाद व्यंग्यात्मक तरीके से आतंकियों को भड़काने वाले मौलानाओं की तरकीबों पर सवाल उठाते हैं। चूंकि फिल्म का टाइटिल ही '72 हूरें' हैं, जिनका सपना बहुत से आतंकियों को दिखाया गया था, इसलिए सबसे ज्यादा निशाने पर वही होता है। निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान का तो दावा है कि अगर आतंकी बनने की राह पर चल रहे नौजवानों को ये मूवी दिखाई जाए तो कम से कम 72 हूरों के जाल में वो नहीं फंसेंगे।

Controversial film 72 Hoorain is the best example of artistic satire

मूवी को केवल टाइटिल सुनकर या टीजर देखकर एकदम से खारिज करना तो ठीक नहीं होगा। फिल्म को देखने से पहले उसके निर्देशक संजय पूरन सिंह के बारे में जान लेंगे तो शायद आपको मूवी देखने की उत्सुकता बढ़ेगी। 1983 क्रिकेट विश्व कप की जीत पर बनी कबीर खान-रणवीर सिंह की मूवी '83' को उन्होंने ही लिखा था, जिसके लिए उन्हें बेस्ट स्टोरी का आइफा अवॉर्ड और बेस्ट स्क्रीन प्ले का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिल चुका है। लेकिन लोगों को ये नहीं पता है कि एक दौर में वही इस मूवी को निर्देशित करने वाले थे।

संजय पूरन सिंह की ये दूसरी मूवी है, इसे 2019 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल ऑफ इंडिया (इफ्फी, गोवा) में आईसीएफटी- यूनेस्को गांधी मेडल मिला था। 2009 में आई उनकी पहली फिल्म 'लाहौर' को भी नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में पहली फिल्म के लिए सर्वेश्रेष्ठ निर्देशक का अवॉर्ड मिला था। किक बॉक्सिंग पर बनी इस मूवी का डिस्ट्रीब्यूशन वार्नर ब्रदर्स ने किया था। एसियान फिल्म फेस्टिवल ऑफ फर्स्ट फिल्म, सिंगापुर में भी चौहान को सर्वेश्रेष्ठ निर्देशक के तौर पर सम्मानित किया गया था।

संजय के करीबी लोग कहते हैं उनका कैनवास बड़ा होता है, नाम से चलताऊ लगने वाली '72 हूरें' का भी क्लाइमेक्स 72 न्यूड गर्ल्स के साथ विदेश में शूट करने का सोचा गया था, लेकिन ये मुमकिन नहीं हो पाया। ऐसे में मूवी केवल 80 मिनट में समेटने का निर्णय भी साहसिक था। हालांकि क्लाइमेक्स और बेहतर हो सकता था। दो भूतों हाकिम अली और बिलाल अहमद के किरदार में पवन मल्होत्रा और आमिर बशीर जैसे मंझे हुए कलाकार लिए गए हैं। ये अलग बात है कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग अभिनेताओं का कोई बड़ा नाम ना होने के चलते इस मूवी को देखने शायद ना आए।

लेकिन जिस तरह से संजय ने मूवी को शूट किया है, सैट डिजाइन किए हैं और एडीटिंग में मेहनत की है, उससे लगता नहीं है कि उनकी कोशिश एक चलताऊ मूवी बनाने की थी। कहीं से नहीं लगता कि डायरेक्टर संजय या प्रोडयूसर गुलाब सिंह पैसे कम खर्च करने के मूड में थे। बल्कि ये फिल्म जिस कलात्मक तरीके से शूट की गई है, एडीटिंग पर, कलरिंग पर की गई मेहनत साफ दिखती है। एक बड़ा हिस्सा मूवी का ब्लैक एंड ह्वाइट है, सो देखने में एक अलग ही तरह का अनुभव आता है। बम ब्लास्ट के सीन को भी बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है.

हालांकि फिल्म को धार्मिक संवेदनशीलता के साथ ना देखा जाए, तो फिल्म में जो व्यंग्य है, वह लोगों को काफी हंसाता है। जिस तरह से लोग पीके की मूवी में फर्जी साधु के रोंग नंबर पर हंस रहे थे, उसी तरह 72 हूरों की मौलानाओं की व्याख्या पर आपको तब हंसी आएगी, जब आतंकियों के भूत उनका बेसब्री से इंतजार करते हुए उनके बारे में आपस में चर्चा करेंगे।

ऐसे में जब दो अहम रोल इस मूवी में दो मुस्लिम किरदारों ने किए हैं, जिनमें से एक पाकिस्तान का है, तो समझा जा सकता है कि इस्लाम का नाम आतंक से जोड़ना और 72 हूरों का सपना बेचकर युवाओं को जेहाद के रास्ते धकेलना सभी मुस्लिमों को भी पसंद नहीं आता है। इन दो मुस्लिम कलाकारों में शामिल हैं, एक भूत बिलाल अहमद यानी आमिर बशीर और 72 हूरों का सपना बेचने वाले मौलाना के रोल में पाकिस्तान के राशिद नाज, जो अक्षय कुमार की मूवी 'हे बेबी' जैसी कई मूवीज में प्रमुख रोल्स में काम कर चुके हैं। उन्होंने भी अपने डायलॉग्स में पाकिस्तानी मौलवी से पूछकर केवल एक संख्या का ही बदलाव करवाया, यानी कि वहां के मौलानाओं को भी इस मूवी से कोई दिक्कत नहीं। अगर वाकई में होती तो 2022 जनवरी में इस दुनियां को छोड़ जाने वाले राशिद नाज इस मूवी में काम भी नहीं कर पाते।

संजय पूरन सिंह चौहान ने एक सीन में दो मुस्लिम महिलाओं के जरिए यह भी कहलवाया है कि खुदकुशी अल्लाह को पसंद नहीं, ये तो बहुत बड़ा गुनाह है। ऐसे में एक झटके से फिदायीन बनने-बनाने वालों को भी उन्होंने निशाने पर लिया है। जबकि इस मूवी की रिलीज तारीख आने के बाद से ही टीवी डिबेट्स न्यूज चैनल्स में शुरू हो गईं, और किसी भी विद्वान मौलाना ने नहीं माना कि आतंकियों को 72 हूरों से मिलवाने की बात कुरान में सही मानी गई है। हालांकि कुरान और हदीस में हूरों का जिक्र है, मौलानाओं का कहना है कि हिंदू भी तो अप्सराओं की बात करते हैं।

इस मूवी को लोग बिना देखे अपने अपने तरीके से खारिज करेंगे और बहुत से टाइटिल पढ़कर वही कर भी रहे हैं। लेकिन अगर रचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो फिल्म भले ही कॉमर्शियल फिल्मों की तरह भीड़ ना खींचे लेकिन इसकी प्रोडक्शन क्वालिटी को खारिज करना आसान नहीं है। संजय पूरन सिंह को बजट मिल गया होता तो शायद ये फिल्म मूल योजना के मुताबिक बन पाती और इंटरनेशनल फिल्म समारोहों में भी सराही जाती।

दूसरा बड़ा प्रभाव इस मूवी का ये हो सकता है कि जिस तरह लोग स्टिंग ऑपरेशन 'फतवा' से पहले फतवा से डरते थे, इस विषय पर भी यूं सार्वजनिक चर्चा से हर कोई बचता था। '72 हूरें' मूवी ने इस चर्चा को घर घर पहुंचाकर एक और हिचक को खत्म कर दिया है। शायद कुछ मुस्लिम युवा अब आतंकियों के झांसे में आने से भी बचें।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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