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Contradictory Politics: सॉफ्ट हिंदुत्व और हिंदू विरोध को एक साथ साधने की विरोधाभासी राजनीति

Contradictory Politics: भारत इतनी विविधता वाला देश है कि अगर हम इसे एक सांचे में ढालने का प्रयास करेंगे तो इतने विरोधाभाष निर्मित हो जाएंगे जिसे हम संभाल नहीं पायेंगे। इन विविधताओं के विरोधाभास से बचने का सिर्फ एक उपाय है कि आप किसी भी सामाजिक व्यवस्था की निन्दा करने से अपने आप को बचा लें।

Contradictory politics over soft Hindutva by political parties

व्यक्तियों से अधिक ये नियम उन राजनीतिक दलों और उनके नेताओं पर लागू होता है जो देश के अलग अलग हिस्सों में शासन कर रहे हैं या उसकी इच्छा रखते हैं। जो क्षेत्रीय दल हैं उन्हें थोड़ी छूट रहती है क्योंकि वो एक राज्य तक सिमटे होते हैं लेकिन जैसे ही राज्य की सीमा से निकलकर राजनीतिक विस्तार करते हैं उनकी सामाजिक सीमाएं बननी शुरु हो जाती हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अपनी पार्टी को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए राज्य की सीमाएं तो लांघ रहे हैं लेकिन इस बात को अब तक समझ नहीं पाये हैं। उनकी हल्ला बोल नीति ने दिल्ली में उनको कामयाबी दिलायी लेकिन दिल्ली में कोई ऐसी सामाजिक व्यवस्था नहीं है जिसके लिए बहुत सावधान रहने की जरूरत हो।

दिल्ली मुख्य रूप से शहरी क्षेत्र है और यहां जाति धर्म का वैसा सामाजिक ढांचा नहीं है जैसा बाकी राज्यों में है। इसलिए यहां बिजली पानी के लोकलुभावन वादों से चुनाव जीत सकते हैं लेकिन दिल्ली के बाहर मुफ्त बिजली पानी से महत्वपूर्ण और भी बातें हैं।

इसलिए दिल्ली में बार बार गांधी की समाधि राजघाट जानेवाले केजरीवाल जब पंजाब पहुंचते हैं तो गांधी को भूलकर भगत सिंह और अंबेडकर के विचारों को धारण कर लेते हैं। उनकी पार्टी के पंजाब वाले मुख्यमंत्री के सार्वजनिक संबोधनों से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर गायब हो जाती है, और वहां अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीर उभर आती है।

क्या दिल्ली से पंजाब इतनी दूर है कि अरविन्द केजरीवाल इस विरोधाभास को लोगों तक पहुंचने से रोक लेंगे? टीवी और डिजिटल मीडिया के इस युग में जब सूचनाएं कुछ मिनटों में देशव्यापी हो जाती हैं तब भी केजरीवाल इस विरोधाभास को क्यों निर्मित करते हैं? राजनीतिक उत्थान पतन एक ओर लेकिन क्या इससे देश का सामाजिक सौहार्द बचा रह पायेगा?

इस विरोधाभासी राजनीति के कारण ही दिल्ली में उनके मंत्री राजेन्द्र गौतम को इस्तीफा देना पड़ा है। राजेन्द्र गौतम ने कोई पहली बार हिन्दू देवी देवताओं को न मानने वाली बात तो कही नहीं है। वो नवबौद्ध हैं जिसकी शुरुआत 1956 में डॉ भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाकर की थी।

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बौद्ध धर्म से अलग नवबौद्ध धर्म सिर्फ अपने उन्नयन तक सीमित नहीं है। उसका वैचारिक आधार समाज के दूसरे वर्गों के पतन में निहित है। नवबौद्ध ये मानते हैं कि जब तक समाज के दूसरे वर्गों का पतन नहीं होगा, उनके उन्नयन का कोई महत्व नहीं होगा। इसी सोच से नवबौद्धों के लिए 'अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञा' की परिपाटी शुरु की गयी जिसमें किसी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को खत्म करने का संकल्प करवाया जाता है। उन देवी देवताओं पर नवबौद्धों को विश्वास न करने की कसम दिलाई जाती हैं जो भारतीय समाज व्यवस्था के लोकमानस में विद्यमान हैं।

अंबेडकर की इन 22 प्रतिज्ञाओं में न केवल देवी देवताओं पर अविश्वास करने के लिए कहा जाता है बल्कि हिन्दू धर्म को भी मानवता के लिए हानिकारक बताया जाता है।

राजेन्द्र पाल गौतम स्वयं अंबेडकरवादी नव बौद्ध हैं। वो जयभीम नाम से नवबौद्धों के लिए एनजीओ चलाते हैं। हर साल दलितों को नवबौद्ध बनाते हैं जिसमें अंबेडकर की वही 22 प्रतिज्ञाएं नवबौद्धों से करवाई जाती हैं जिनको लेकर हुए विवाद में राजेन्द्र पाल गौतम को दिल्ली सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

लेकिन ये कोई पहला मौका तो नहीं है जब गौतम ने सार्वजनिक रूप से ऐसा किया हो। इससे पहले नवंबर 2019 में भी उन्होंने राम कृष्ण के अस्तिव पर सवाल उठाते हुए कहा था कि ये काल्पनिक पात्र हैं। उस समय अपने ट्वीट में गौतम ने कहा था कि ''अगर यह बात प्रमाणित है कि राम और कृष्ण तुम्हारे पूर्वज हैं तो इतिहास में इनको पढ़ाया क्यों नहीं जाता? पूर्वजों का कोई इतिहास होता है जबकि इनका कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है। यह पौराणिक कथाएं हैं, ऐतिहासिक नहीं। जबकि पेरियार जी का दृष्टिकोण प्रमाणिकता और तार्किकता के आधार पर था।''

गौतम के इस ट्वीट पर भी विवाद हुआ था और विवाद के बाद उन्होंने ट्वीट डिलिट करके सभी की आस्था का सम्मान करनेवाला राजनीतिक बयान भी दिया था। लेकिन उस समय केजरीवाल ने राजेन्द्र पाल गौतम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अब जबकि केजरीवाल गुजरात में स्वंय "कृष्ण की तरह कंस का विनाश करने" का दावा करते घूम रहे हैं तो राजेन्द्र पाल गौतम के बयान पर विवाद उठते ही इस्तीफा ले लिया।

लेकिन अपने इस्तीफे में राजेन्द्र पाल गौतम ने फिर से अंबेडकर की उन 22 प्रतिज्ञाओं पर अपनी आस्था जताई है जिसको पढ़ने के कारण उनका इस्तीफा लिया गया है। गौतम तो बीजेपी को भी चुनौती देते हुए कहते हैं कि जो प्रतिज्ञाएं स्वयं भाजपा की मोदी सरकार ने अंबेडकर समग्र के खंड-17 में छपवाई हैं फिर उस पर भाजपा वाले आपत्ति कैसे कर सकते हैं?

अपने ऊपर लगनेवाले आरोपों के बीच गौतम का सवाल भी बिल्कुल सही है। अगर केजरीवाल विरोधाभाषों वाली राजनीति कर रहे हैं तो यही काम तो भाजपा नेता भी करते आये हैं। स्वंय भाजपा भी विरोधाभाषों की उसी राजनीति को साधने का प्रयास कर रही है जिनकी जड़ें समाज में गहरी हैं। क्या अंबेडकर और हिन्दुत्व सिर्फ इसलिए साथ चल सकेंगे क्योंकि अंबेडकर ने इस्लाम पर बहुत तीखा लिखा है? नहीं। यह कठिन है। विरोधाभाषों से भरा हुआ। यह प्रयास वैसा ही है जैसे तमिल राजनीति में कोई पेरियार और राम को एक साथ मानने की बात करे।

लेकिन भाजपा के साथ अच्छा इतना है कि उसका विस्तार इतना व्यापक हो चुका है कि विरोधाभासों के उभरने पर भी उसकी सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। केजरीवाल के साथ ऐसा नहीं है। राजेन्द्र पाल गौतम का इस्तीफा कभी न होता अगर गुजरात में केजरीवाल कृष्ण बनने का प्रयास न कर रहे होते।

ऐसे में गलती गौतम की नहीं बल्कि उनके नेता की है जो राज्य के हिसाब से राजनीतिक रूप धारण कर रहे हैं। उन्हें तत्काल सफलता चाहिए। देशभर में अपना विस्तार और राजनीतिक आधार बनाना है। इसी जीवन में प्रधानमंंत्री बनने की भी इच्छा होगी इसलिए उनके पास समय नहीं है। वो मैराथन के ऐसे धावक हैं जो आराम नहीं कर सकता।

दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के तुंरत बाद राजनीतिक दल और फिर दिल्ली में सरकार बनाकर उन्होंने साबित भी किया कि राजनीति के मैराथन में जो आराम करता है उसे कुछ हासिल नहीं होता।

इसलिए वो बार बार विरोधाभाषों को जन्म भी दे रहे हैं और उन्हें साधने का प्रयास भी कर रहे हैं। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि अभी न तो उनके पास कांग्रेस जैसा पुराना अनुभव है और न ही उनकी पार्टी का भाजपा जैसा विस्तार हुआ है। इसलिए राजनीति में विरोधाभासों को एक साथ नहीं साधा जा सकता। गांधी हों, अंबेडकर हों या भगत सिंह इनको लेकर समाज के अलग अलग वर्गों में अपनी स्वीकार्यता और आपत्तियां दोनों है। अच्छा हो कि केजरीवाल ऐसे विरोधाभाषों की राजनीति को साधने का प्रयास बंद कर दें। हो सकता है इससे उनका विस्तार उतना तेज न हो जितना वो चाहते हैं लेकिन ऐसा करेंगे तो राजेन्द्र पाल गौतम जैसे एक्सीडेन्ट से भी बचेंगे। फिलहाल तो विरोधाभासी राजनीति के कारण तो उनकी विश्वसनीयता ही खतरे में आ गयी है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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