UAE में रहने वाले लोगों में भारत में पैसे भेजने की क्यों लगी है होड़?
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी और वैश्विक मंदी की आहट अब तेजी से आने लगी है। अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ी तो अमेरिकी फेडरल बैंक ने ब्याज दर बढ़ाना शुरू कर दिया।
UAE sending money to india: यूएई में रहने वाले लोगों में भारत में पैसे भेजने की एक होड़ सी लग गई है।करेंसी एक्सचेंज सेंटर और इंटरनेशनल मनी ट्रांसफर सर्विस, रिकॉर्ड संख्या में यूएई के लोगों को भारत के साथ साथ पाकिस्तान और फिलिपींस में करेंसी भेजने की संख्या को नोट कर रहा है। इन दो संस्थाओं की रिपोर्ट्स से पता चला है, कि यूएई के लोगों में एक रेस सी लगी हुई है और इन तीन देशों में काफी ज्यादा पैसा भेजा जा रहा है। यूएई की अल फरदान एक्सचेंज ने कहा है कि, ज्यादातर करेंसी एक्सचेंज में पिछले महीने की तुलना में दो अंकों की वृद्धि देखी गई है।

पैसे भेजने की क्यों लगी है होड़?
खलीज टाइम्स के मुताबिक, भारत के साथ साथ पाकिस्तान और फिलिपींस में डॉलर के मुकाबले स्थानीय करेंसी की दरों में भारी गिरावट देखी जा रही है, लिहाजा यूएई के लोग ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इन देशों में ज्यादा पैसे भेज रहे हैं। खासकर फिलिपींस और पाकिस्तान के मुकाबले भारत में निवेश करना काफी सुरक्षित है, लिहाजा, भारत में ज्यादा पैसे भेजे जा रहे हैं। खलीज टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरो लेनदेन में पिछले महीने के मुकाबले 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि जीबीपी मात्रा में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अल फरदान एक्सचेंज एलएलसी के सीईओ हसन फरदान अल फरदान ने कहा कि, अन्य मुद्राओं के मामले में भी ऐसा ही है। अल फरदान ने कहा कि, "अधिकांश प्रवासी, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले एशियाई और यूरोपीय, अपने घरेलू देशों में कमजोर मुद्रा का फायदा उठा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप यूएई में रहने वाले विदेशी लोग अपने अपने देशों में भारी पैसा भेज रहे हैं।"

गिरती मुद्राओं का फायदा उठाने की कोशिश
अल फरदान ने कहा कि, "आने वाले महीनों में अभी अलग अलग देशों की स्थानीय करेंसी के अस्थिर रहने की संभावना है, लिहाजा संयुक्त अरब अमीरात के ज्यादातर प्रवासी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने देश की मुद्रा में आने वाली हर गिरावट का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकते हैं।" आपको बता दें कि, इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने कहा कि, यूएस डॉलर इंडेक्स, जो अमेरिकी डॉलर की वैल्यू को मापता है, वो इस साल अभी तक अन्य देशों की करेंसी के मुकाबले डॉलर करीब 15 प्रतिशत तक मजबूत हुआ है। वहीं, अल फरदान ने कहा कि, "अमेरिकी डॉलर सभी प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है, और चूंकि यूएई की करेंसी दिरहम अमेरिकी डॉलर से आंकी गई है, लिहाजा दिरहम के वैल्यू में भी अन्य देशों की करेंसी के मुकाबले भारी इजाफा हुआ है, ऐसे में अगर कोई यूएई से दिरहम अपने देश में भेजता है, तो फिर उसे करेंसी के आदान-प्रदान में ज्यादा मुनाफा होगा।" वहीं, लुलु इंटरनेशनल एक्सचेंज के एक प्रवक्ता ने कहा कि, "अमेरिका में ब्याज दरों में निरंतर वृद्धि के बाद हमने यूएई से दूसरे देशों में मनी एक्सचेंज की मात्रा में भारी उछाल देखा है।"

यूएई को हो रहा है भारी फायदा
लुलु इंटरनेशनल एक्सचेंज के प्रवक्ता ने कहा कि, अमेरिका में अगर किसी भी दर में वृद्धि होती है, तो संयुक्त अरब अमीरात में विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षित करती है। इसके अलावा, कंपनी अमेरिकी डॉलर प्रेषण में दो अंकों की वृद्धि देख रही है। उन्होंने कहा कि, "हमने एशिया (पाकिस्तान, फिलीपींस, भारत ...) में भेजे जाने वाली मुद्राओं की संख्या में भारी वृद्दि दर्ज की है। इसके साथ ही हमने, प्रवासी और निवेशकों से यूरो के काफी ज्यादा निम्न स्तर पर जाने का भी फायदा उठाते हुए देखा है"। प्रवक्ता ने कहा कि, "यूरोपीय मुद्रा यूरो के एक्सचेंज में भारी मांग है, क्योंकि पर्यटक दिरहम से अगर यूरो मुद्रा को एक्सचेंज करते हैं, तो फिर उन्हें ज्यादा नगद मिलते हैं, लिहाजा यूएई के लोगों के लिए यूरोपीय देश प्रमुख पर्यटन स्थल बन गये हैं और उन्हें यूरोप घूमने में काफी कम खर्च करने पड़ रहे हैं।"

भारतीय करेंसी ने जोरदार गिरावट
आपको बता दें कि, इस साल की शुरूआत से ही डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का तेजी से नीचे गिरना जारी है और इस हफ्ते डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का वैल्यू गिरकर रिकॉर्ड 82 को पार कर गया है। जिसका असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी हो रहा है। पहले कोविड और फिर यूक्रेन युद्ध ने दुनियाभर की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया और इसके असर से चीन की मुद्रा और जापान की मुद्रा भी नहीं बस पाए हैं।

यूक्रेन युद्ध का गंभीर असर
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी और वैश्विक मंदी की आहट अब तेजी से आने लगी है। अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ी तो अमेरिकी फेडरल बैंक ने ब्याज दर बढ़ाना शुरू कर दिया। जिसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ा और विदेशी निवेशकों ने रुपये की कीमत में लगातार गिरावट की वजह से भारत से पैसा निकालना शुरू कर दिया और उन्होंने ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अमेरिका में निवेश करना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से भी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में काफी कमी दर्ज की जा रही है।
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