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वक्फ बोर्ड की मनमानी रोकने हेतु इसके अधिकारों की संवैधानिक समीक्षा जरूरी

सोमवार 19 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के जज जोसेफ ने एक ऐसी मौखिक टिप्पणी की है जिस पर विचार जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसफ और जस्टिस हृषिकेश राय की पीठ ने सोमवार को वक्फ बोर्ड पर दायर अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आप किसी ट्रिब्यूनल में शामिल सदस्यों को सिर्फ धर्म के आधार पर कैसे देख सकते हैं?

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    Constitutional review of Waqf Board powers is essential

    जस्टिस जोसेफ ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार को कहा कि आप देशभर में जो हिन्दू बंदोबस्ती कानून हैं उसका विवरण प्रस्तुत करें। ओड़िसा के बंदोबस्ती कानून में साफ लिखा है कि उससे जुड़े ट्रिब्यूनल के सदस्य सिर्फ हिन्दू होंगे। तब आप वक्फ बोर्ड पर यह सवाल कैसे उठा सकते हैं कि उसके सदस्य सिर्फ मुस्लिम क्यों होते हैं?

    असल में अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर रखी है जिसमें उन्होंने वक्फ अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को दिल्ली उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की है। इसी मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जोसेफ का कहना है कि "वक्फ अधिनियम एक नियामक कानून है जो वक्फ भूमि की रक्षा करना चाहता है। यदि कानून को रद्द कर दिया जाता है तो इससे केवल अतिक्रमणकारियों को ही लाभ होगा।"

    जस्टिस जोसफ ने कहा कि "हमारे पास एक ट्रिब्यूनल है और यदि कोई न्यायिक सदस्य नियुक्त किया जाता है तो वह व्यक्ति धर्म के आधार पर फैसला करेगा? क्या हम धर्म के हिसाब से चलेंगे?" संभवत: याचिकाकर्ता की दलीलों को जस्टिस जोसेफ ने व्यक्तिगत ले लिया और ऐसी मौखिक टिप्पणियां कर दी जिसकी इस मामले में कोई जरूरत नहीं थी। संभवत: जस्टिस जोसेफ को यह समस्या हुई कि याचिकाकर्ता ने वक्फ बोर्ड में सम्मिलित मुस्लिम सदस्यों पर प्रश्न उठाये थे। अब जबकि वक्फ बोर्ड का गठन ही मजहबी आधार पर हुआ है

    तो भारत का समाज उसमें मजहब को क्यों न देखे?

    हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के तमाम न्यायाधीशों ने यह वेदना भी प्रकट की थी कि कई बार बहुसंख्यक जनता उन्हें खलनायक बना देती है। यदि उनकी यह वेदना है तो उन्हें भी बहुसंख्यक समाज का मान रखना चाहिये। आखिर, बीते 75 वर्षों के छद्म सेक्युलरिज्म और मुस्लिम तुष्टिकरण ने बहुसंख्यक समाज के भीतर इतनी कटुता क्यों भर दी है कि वह अब संवैधानिक संस्थाओं पर गुस्से के रूप में निकलने लगी है?

    क्या वक्फ कानून देश का सबसे खतरनाक कानून है?

    वक्फ बोर्ड के अस्तित्व पर सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र में वक्फ कानून की प्रासंगिकता क्या है? वक्फ की संपत्तियों का ऑडिट क्यों नहीं होता? क्या वक्फ बोर्ड आरटीआई के दायरे में आता है? ये कुछ ज्वलंत प्रश्न हैं जिनका उत्तर पूरा देश पिछले एक सप्ताह से खोज रहा है जब तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली जिले के तिरुचेंथुरई गाँव पर ही वक्फ बोर्ड ने अपना मालिकाना हक जता दिया।

    आश्चर्य तो इस बात का भी है कि इसी गाँव में 1500 वर्ष पुराना चंद्रशेखर स्वामी का मंदिर है। वक्फ के इस एक कदम ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लेकर अब तक के वक्फ के इतिहास को सार्वजनिक कर दिया है और अब यह मुद्दा कानूनविदों के साथ-साथ आम जनता के बीच 'राष्ट्रीय बहस का मुद्दा' बन चुका है।

    जाहिर है, ऐसे में सरकार से लेकर वक्फ बोर्ड भी चिंतित हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय इसी मुद्दे को लेकर अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं कि "1991 में स्पेशल पूजा स्थल अधिनियम बना। इसके तहत हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन को कोर्ट जाने से रोक दिया गया। 1992 में माइनॉरिटी कमीशन एक्ट बना। इसके तहत हिन्दुओं को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बांट दिया गया। हिंदू बहुसंख्यक और जैन, बौद्ध, सिखों को अल्पसंख्यक बना दिया गया। 1995 में वक्फ एक्ट बनाया गया। अब किसी समुदाय के लिए विभिन्न वक्फ बोर्डों से अपनी संपत्तियों को बचाने के लिए कोई सुरक्षा नहीं है इसलिए उनके साथ भेदभाव किया जाता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14-15 का उल्लंघन करता है।" अश्विनी उपाध्याय ने वक्फ अधिनियम, 1995 को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है जिसके अंतर्गत अधिनियम की धारा 4, 5, 6, 7, 8, 9, 14 के अधिकारों को चुनौती दी गई है।

    अश्विनी उपाध्याय ने इन प्रावधानों को खतरनाक बताते हुए कहते हैं कि वक्फ संपत्तियों को ट्रस्ट, मठों, अखाड़ों, समितियों के समान नहीं बल्कि विशेष दर्जा प्रदान करते हैं। साथ ही किसी भी संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में रजिस्टर्ड करने के लिए वक्फ बोर्डों को बेलगाम शक्तियां भी प्रदान करते हैं। वक्फ बोर्डों की मनमानी पर अधिवक्ता विष्णु जैन ने उदाहरण देते हुए बताते हैं कि "2005 में वक्फ ने ताजमहल को अपनी संपत्ति घोषित कर दिया था। जब उच्चतम न्यायालय ने वक्फ से इस विषय पर शाहजहाँ की डीड प्रस्तुत करने को कहा तो वक्फ ने चुप्पी साध ली।" ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ वक्फ ने मनमानी करते हुये कई ऐसी संपत्तियों को अपना बता दिया है जिनका राष्ट्रीय महत्त्व है।

    संविधान के साथ सबसे बड़ा धोखा है वक्फ कानून

    रामजन्मभूमि, कृष्णजन्मभूमि, काशी विश्वनाथ जैसे हिन्दू आस्था स्थल भी वक्फ की करामात के कारण विवादित हुये हैं। विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल कहते हैं "वक्फ एक्ट संविधान के साथ सबसे बड़ा धोखा है। यहाँ अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से अधिक अधिकार दिए जाते हैं और वह भी पूर्ण शक्तियों के साथ।"

    उन्होंने यह भी बताया कि "05 मार्च, 2014 को लोकसभा चुनाव घोषित होते ही कांग्रेस की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने दिल्ली की 123 महत्त्वपूर्ण व मंहगी संपत्तियों को चुपके से वक्फ बोर्ड को खैरात में दे दिया था। उस समय विहिप के दबाव पर चुनाव आयोग ने उस निर्णय पर रोक लगाई थी।"

    अल्लाह का नाम वक्फ बोर्ड का काम

    वहीं मुस्लिम स्कॉलर अतीक उर रहमान कहते हैं कि "वक्फ का कोई हक नहीं बनता किसी को परेशान करने का। वक्फ बोर्ड कानून के हिसाब से चले। यदि वक्फ बोर्ड गलत कर रहे हैं तो वे अल्लाह की नाराजगी मोल ले रहे हैं। यह दीन ए इस्लाम के अन्दर वाजिब नहीं है।"

    हालांकि उनका यह भी कहना था कि वक्फ को खत्म करना भी ठीक नहीं है क्योंकि यदि वक्फ बोर्ड नहीं रहेगा तो मुस्लिम अपनी संपत्ति को वक्फ (दान) कैसे कर पायेगा? खैर, यह मुद्दा अब जितना जनता के सामने आ रहा था, इसकी परतें उतनी ही खुलती जा रही हैं।
    ऐसा भी नहीं है कि वक्फ के मनमाने कानूनी प्रावधानों से हिन्दू ही परेशान हों। एक बड़ा मुस्लिम तबका भी वक्फ की कारस्तानियों से दुखी है और अपने हक की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें वक्फ ने मुस्लिमों की संपत्तियों पर भी अधिकार जमाते हुये जबरन उसे 'अल्लाह के नाम' करार दे दिया है। खासकर ऐसे मुस्लिम जिनके यहाँ संपत्ति का वारिस नहीं है अथवा संपत्ति परिवार के चलते विवादों में है।

    गौरतलब है कि इस्लाम में वक्फ उस संपत्ति को कहते हैं जो अल्लाह के नाम पर दान कर दी जाती है। दान हमेशा स्वेच्छा से होता है किन्तु यह देखने में आया है कि वक्फ कई बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए "दान" भी जबरन करवा लेता है।

    अभी दिल्ली के ओखला से आम आदमी पार्टी के विधायक और दिल्ली वक्फ बोर्ड चेयरमेन अमानतुल्लाह खान को एंटी करप्शन ब्रांच ने गिरफ्तार कर लिया है। उन पर नवंबर, 2016 में दिल्ली वक्फ बोर्ड में विभिन्न मौजूद और गैर-मौजूद पदों पर अवैध नियुक्तियों और वक्फ बोर्ड की संपत्ति का निजी हित के लिए उपयोग का आरोप लगा था।

    इसके साथ ही वक्फ बोर्ड के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) महबूब आलम के खिलाफ भी नियमों, विनियमों और कानून का जानबूझकर और आपराधिक उल्लंघन करने, पद का दुरुपयोग करने तथा सरकारी खजाने को वित्तीय नुकसान पहुंचाने सहित विभिन्न अपराधों के लिए मुकदमा चलाने की मंजूरी उपराज्यपाल द्वारा दी गई थी।

    आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान पर जो जांच बैठी है वह एक मुस्लिम हाफिज इरशाद कुरैशी की सक्रियता और शिकायत के कारण संभव हुआ है। इरशाद कुरैशी कहते हैं कि अमानतुल्लाह खान दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन नहीं बल्कि मालिक की तरह फैसले ले रहे थे। स्वाभाविक है ऐसा वो इसलिए कर रहे थे क्योंकि उनके पास ऐसे असीमित कानूनी अधिकार हैं जिससे वो मनमानी कर सकें।

    ऐसे ही असिमित कानूनी अधिकारों के कारण वक्फ कानून पर अब तक कई अधिवक्ताओं ने विभिन्न उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिकाएं दायर कर रखी हैं। माननीय जजों को याचिकाकर्ताओं पर मौखिक सवाल उठाने की बजाय ऐसी शिकायतों की रोशनी में वक्फ बोर्ड के कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए। यही समय और न्याय की मांग है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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