Dantewada Naxal Attack: लोन वर्राटू से उपजी बौखलाहट तो नहीं दंतेवाड़ा में नक्सली हमला?

बस्तर के दंतेवाड़ा में एक बार फिर नक्सली आतंकियों ने जवानों को अपना निशाना बनाया है। बुधवार को हुए हमले में जिला रिजर्व गार्ड के 10 जवान व एक ड्राइवर वीरगति को प्राप्त हो गये।

connection of Dantewada Naxalite attack with Lon Varratu campaign in Chhattisgarh

Dantewada Naxal Attack: अप्रैल से जुलाई के बीच का चार महीना नक्सलियों के लिए बहुत महत्व का होता है। इसमें भी अप्रैल का महीना उनके लिए खास होता है। वह इसलिए क्योंकि इसी महीने की 22 तारीख को उनके आदर्श ब्लादिमीर लेनिन का जन्मदिन आता है। तो क्या नक्सलियों ने इस महीने को अपने कैलेण्डर में मार्क करने के लिए पुलिस के विशेष बल डीआरजी पर बुधवार को हमला किया?

अगर पूरे घटनाक्रम को समझेंगे तो आपको समझ में आयेगा कि छत्तीसगढ में लंबे समय से नक्सलियों से निपटने के उपायों ने उन्हें सीमित भी किया है और हताश भी। बुधवार को भी उन्होंने पुलिस के जिस विशेष बल डीआरजी पर हमला किया वह सिर्फ सुरक्षा बलों पर हमला नहीं है बल्कि उसमें 'अपने लोगों' के खिलाफ प्रतिशोध की भावना भी है।

डीआरजी कौन हैं जिन्हें बनाया नक्सलियों ने निशाना?

डीआरजी का मतलब होता है डिस्ट्रीक्ट रिजर्व गार्ड। यह छत्तीसगढ़ पुलिस का ही हिस्सा है, जिसे नक्सलियों से निपटने के लिए वर्ष 2008 में बनाया गया था। उस समय इनकी बस्तर के सभी सात जिलों में नियुक्ति की गयी थी। बाद में दूसरे जिलों में भी सेवा विस्तार हुआ। डीआरजी में स्थानीय युवाओं और पूर्व नक्सलियों की भर्ती की जाती है। स्थानीय युवाओं और पूर्व नक्सलियों की भर्ती इसलिए होती है क्योंकि ये स्थानीय बोली से परिचित होते हैं और इन्हें दुर्गम क्षेत्रों की जानकारी होती है। पूर्व नक्सलियों को जंगल के अंदर सक्रिय नक्सलियों के काम-काज का तरीका पता होता है, इसलिए वे नक्सलियों की पहचान से लेकर उनकी योजनाओं को विफल करने तक बड़ी भूमिका निभाते हैं।

डीआरजी में वही पूर्व नक्सली शामिल किए जाते हैं, जिन्होंने आत्मसमर्पण किया है। आत्मसमर्पण के बाद भी उनकी सीधी भर्ती नहीं की जाती। पहले उनकी गतिविधियों पर लंबे समय तक नजर रखी जाती है। यदि उनका रवैया विश्वसनीय रहा तो डीआरजी का हिस्सा बनने का प्रस्ताव दिया जाता है। प्रारंभ में उन्हें नक्सलियों से जुड़ी सूचना लाने के काम में लगाया जाता है। नक्सलियों को पहचानने में इनकी मदद ली जाती है। इस तरह बस्तर में डीआरजी नक्सल विरोधी अभियान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

आपने सुना है लोन वर्राटू का नाम?

पूर्व नक्सली कमलेश ने डीआरजी का हिस्सा बनने के लिए जरूर सरेंडर किया था लेकिन सरेंडर करने के लिए उसे और उसके साथियों को बारसूर थाने तक लाने वाले अभियान का नाम लोन वर्राटू था। लोन वर्राटू गोंडी का शब्द है, जिसका अर्थ घर वापसी है। इस अभियान के अन्तर्गत नक्सलियों ने सरेंडर होने के बाद अपने रोजगार से जुड़ी जो भी मांग रखी, उसे पूरा करने के लिए प्रशासन की तरफ से प्रयास किया गया।

नक्सली इस योजना के अन्तर्गत सरेंडर करें, इसके लिए भी गंभीर प्रयास किए गए। जैसे इनामी नक्सलियों के गांवों में उनके पोस्टर लगाकर सरेंडर करने की अपील की गई। गांव-गांव तक लोन वर्राटू योजना की जानकारी पहुंचाई गई। इस योजना का विरोध नक्सलियों द्वारा खूब किया गया लेकिन इसकी वजह से कई नक्सली कमांडरों ने आत्मसमर्पण भी किया। लोन वर्राटू ने दंतेवाड़ा के ग्रामीण परिवारों को इतना हौसला दिया कि वे पहली बार नक्सलियों के खिलाफ खड़े हुए।

अप्रैल से जुलाई, नक्सली सक्रियता के चार महीने

अप्रैल से लेकर जुलाई तक का समय नक्सलियों की सबसे सक्रियता के चार महीने होते हैं, इसलिए सुरक्षा बल इन चार महीनों में अतिरिक्त सतर्क रहते हैं। यह समय नक्सलियों के टेक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन (टीसीओसी) का समय है, जिससे निपटने के लिए अपनी रणनीति में सुरक्षा बल समय-समय पर बदलाव करती रहते हैं क्योंकि नक्सली इन्हीं चार महीनों में सबसे अधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। नए लड़कों की भर्ती करते हैं। सबसे अधिक वसूली करते हैं। यही समय तेंदुपत्ते के बाजार में आने का है। आमदनी का एक बड़ा हिस्सा उन्हें तेंदुपत्ते की कमाई की वसूली से मिलता है।

नक्सली मानते हैं कि अप्रैल का महीना उनके लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी महीने की 22 तारीख को ब्लादिमीर लेनिन का जन्म हुआ था। लेनिन का जन्मदिन नक्सली धूमधाम से मनाते हैं। इन्हीं महीनों में वे अपनी ताकत को परखते हैं। अपनी कमजोरी पर बात करते हैं। महत्वपूर्ण स्थानों और पदों पर तैनाती और तबादला इसी दौरान होता है। एक पूरा सप्ताह नक्सलियों के बीच उन्हें याद करने के लिए होता है, जिन्हें सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर के दौरान मार गिराया होता है।

यहां उल्लेखनीय है कि नक्सलियों के हमलों के इतिहास से यह भी स्पष्ट होता है कि वे फरवरी से ही घटनाओं को अंजाम देने में लग जाते हैं। इस साल भी फरवरी में जगरगुंडा में सड़क निर्माण कार्यों की सुरक्षा में लगे जवानों पर फायरिंग कर दी थी, जिसमें छत्तीसगढ़ पुलिस के 3 जवान बलिदान हो गये थे।

बदल गया नक्सलियों से निपटने का प्लान

टीसीओसी के दौरान किरंदुल क्षेत्र (दंतेवाड़ा) के एक बेहद पिछड़े गांव हिरोली के पास जंगल में नक्सली शहीदी सप्ताह मनाने पहुंचे थे। वे चाहते थे कि मुठभेड़ में मारे गए एक नक्सली का गांव में स्मारक बनाया जाए। इसके लिए उन्होंने ग्रामीणों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। नक्सलियों के दबाव में आए बिना ग्रामीणों ने उनके गांव में होने की जानकारी पुलिस को दे दी। कुछ ही समय में डीआरजी जवान मौके पर पहुंच गए। उन्होंने नक्सली का स्मारक ध्वस्त कर दिया। यह दंतेवाड़ा में नक्सलियों के खिलाफ खड़े हुए ग्रामीणों का एक उदाहरण भर है।

बस्तर में नक्सलियों की उपस्थिति को लेकर अब कहा जाने लगा है कि वो छत्तीसगढ़ में अपने वजूद की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले आठ सालों में जिस तरह नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई का केन्द्र सरकार ने एक्शन प्लान बदला है। नक्सली समझ नहीं पा रहे कि फाइट बैक कैसे करना है? धीरे-धीरे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है, इसलिए नक्सली बौखलाए हुए हैं।

एक सड़क ने समाप्त कर दिया नक्सलियों की जनताना सरकार

जब से बस्तर के अंदर उनके सबसे बड़े गढ़ जगरगुंडा को उनसे छीन लिया गया है, उसके बाद से नक्सलियों का मनोबल कमजोर पड़ा है। किसी जमाने में यहां नक्सलियों की जनताना सरकार हुआ करती थी। माओवादी अपने द्वारा बनाए गए समानान्तर कथित सरकार को जनताना सरकार कहते हैं। सरल शब्दों में जिस क्षेत्र पर उनका पूरा नियंत्रण हो, वहां वे अपनी जनताना सरकार चलाते हैं।

लेकिन जबसे अरनपुर-जगरगुंडा सड़क बनकर तैयार हुई है तब से जगरगुंडा, बीजापुर, दंतेवाड़ा से उनकी जनताना सरकारें उखड़ गई हैं। 18 किमी की यह सड़क भी बस्तर के क्षेत्र में नक्सलियों के लिए साफ संदेश लेकर आई है कि अब सरकार बदल गई है, इसलिए लड़ाई के नियम भी बदल गए हैं। अब भारत के जवान नक्सलियों को उनके गढ़ में जाकर जवाब देने को तैयार हैं। नक्सलियों द्वारा 26 अप्रैल को किया गया हमला इसी सड़क पर हुआ है।

2010 में इस सड़क पर काम रूक रूक कर प्रारंभ हुआ था लेकिन वर्ष 2016 के बाद काम में तेजी आ गई। इसको तैयार करने में ढाई हजार जवानों ने दिन-रात पहरेदारी की। यह पूरा क्षेत्र नक्सलियों का गढ़ था, इसलिए बारूदी सुरंगें सबसे बड़ी चुनौती बनी। 18 किमी के सड़क निर्माण में 110 बारूदी सुरंगें मिली। इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद कई नक्सली हमले हुए। सड़क निर्माण के लिए जिन गाड़ियों में निर्माण सामग्री भरकर लाई जा रही थी, ऐसी 50 से अधिक गाड़ियों को नक्सलियों ने जला दिया। इस सबके बावजूद हमारे जवान पीछे नहीं हटे। वे मौके पर डटे रहे और सड़क पूरी करके ही माने।

नक्सल समस्या का स्थाई समाधान क्या है?

सुरक्षा बलों की रणनीति से अलग बस्तर में नक्सली समस्या का स्थायी समाधान पाने का प्रयास भी चल रहा है। अगर एक सड़क जनताना सरकार को उखाड़कर फेंक सकती है तो कुछ अन्य उपाय भी नक्सलियों को इस पूरे क्षेत्र में अप्रासंगिक कर सकते हैं।

कुछ साल पहले की बात है, रायपुर के तिल्दा में नक्सल समस्या पर तीन दिनों का विकल्प संगम हुआ। इस संगम में शामिल विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि बस्तर की समस्या का समाधान आदिवासी स्वशासन की स्थापना में है। जिस प्रकार बोडोलैंड में शांति के लिए आदिवासी स्वशासन प्रणाली लागू की गई है। इसमें जल, जंगल, जमीन पर अधिकार के सवाल पर बोडो ऑटोनॉमस काउंसिल का गठन किया गया है। उसी प्रकार की व्यवस्था बस्तर में लागू की जाए तो इस क्षेत्र में नक्सल समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।

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    उम्मीद करनी चाहिए सलवा जुड़ुम और लोन वर्राटू जैसे उपायों के बाद स्थानीय स्वशासन के व्यावहारिक तरीकों पर भी सरकार विचार विमर्श करेगी। फिलहाल तो नक्सली हताश हैं और बस्तर से उनका बोरिया बिस्तर बंधने लगा है।

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