Congress Manifesto: कांग्रेस का इरादा, मुस्लिम समुदाय को शरीयत देने का वादा?
Congress Manifesto: जब तलाक की शिकार शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था तब राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने यह कहते हुए आदेश को पलट दिया था कि वो समाज सुधार का काम करने के लिए राजनीति में नहीं हैं। वो राजनीति करते हैं और शासन की जवाबदेही उनके ऊपर है। वह उसी पर ध्यान देते हैं।
लेकिन आज लगभग चार दशक बाद अगर हम कांग्रेस का घोषणापत्र देखें तो समझ में आता है कि कांग्रेस ने राजनीति छोड़कर अपने आपको पूरी तरह समाज सुधार के काम में ही झोंक दिया है। उसके घोषणा पत्र में जो कुछ है, वह सबकुछ एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक इसी के आसपास सिमटा हुआ है। हां, महिला और नौजवान की बात भी की गयी है लेकिन वह महिला और नौजवान किस जाति और धर्म के होंगें, कांग्रेस का रुझान उधर भी दिखता है।

असल में कांग्रेस की यह जातिवादी और मुस्लिम तुष्टीकरण वाली सोच उसकी अपनी नहीं है। बीते दो तीन दशक में जब से कांग्रेस पर कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का प्रभाव बढ़ा है तब से कांग्रेस पर कम्युनिस्ट विचारधारा की छाप और गहरी हो गयी है। कांग्रेस भले ही समाज सुधार और विचारधारा वाली राजनीति से दूर रही हो लेकिन अब कांग्रेस के राजनीतिक एजंडे में समाज सुधार और विचारधारा वाली राजनीति ही बची है।
कांग्रेस के इकलौते वैचारिक मार्गदर्शक राहुल गांधी जिस 'विचारधारा वाली राजनीति' की बात करते हैं वह कुछ और नहीं बल्कि वही मरी हुई कम्युनिस्ट विचारधारा है जिसने भारत में अपनी जमीन खो दी है। कांग्रेस के कंधे पर बेताल की तरह सवार कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी अपनी उसी 'मरी हुई विचारधारा' को फिर से कांग्रेस के नाम पर जिन्दा करना चाहते हैं।
सिर्फ राहुल गांधी के भाषणों में ही नहीं बल्कि अब कांग्रेस के घोषणापत्र में भी उसकी झलक साफ साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को जिस तरह से 'जातिवादी' और 'सांप्रदायिक' स्वरूप दिया है वह कुछ और नहीं बल्कि कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का वही पुराना एजंडा है जिसे कम्युनिस्ट पार्टियां पूरा करते करते इतनी अलोकप्रिय हुईं कि भारत की राजनीति में गर्त में चली गयीं।
मसलन कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में दो हिस्से किये हैं। पहला हिस्सा वह एससी/एसटी, ओबीसी नामक राजनीतिक वर्गीकरण है जो बहुसंख्यक हिन्दू है। दूसरा हिस्सा वह अल्पसंख्यक वर्ग है जिसमें मुख्य रूप से मुस्लिम और ईसाई हैं। कांग्रेस अपने पूरे घोषणापत्र में प्रमुख रूप से इन्हीं दोनों के बारे में बात करती है।
ऊपरी तौर पर इसे सामाजिक न्याय जैसा कुछ कहकर इसका प्रचार किया जाता है लेकिन इस वर्ग विभाजन का लक्ष्य कुछ और है। इसका बुनियादी लक्ष्य बहुसंख्यक हिन्दुओं को वर्गों में विभाजित करके उनके बीच आंतरिक टकराव पैदा करना है और अल्पसंख्यक के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण को जारी रखना है।
कांग्रेस आज जिस किस्म के सेकुलरिज्म के रास्ते पर चल रही है इसे कम्युनिस्टों ने गढा है। लेकिन जब आप इसका परीक्षण करते हैं तो पाते हैं कि असल में यह तो सेकुलरिज्म है ही नहीं। अगर यह कुछ है तो वह भारत में इस्लामिक शासन प्रणाली को लागू करने का वादा है जिसमें मुस्लिम अव्वल दर्जे के नागरिक होंगे और जातियों में बंटा हिन्दू अपने वर्ग संघर्ष में उलझा होगा।
असल में यह भारत की शासन व्यवस्था का इस्लामीकरण करने का प्रयास है जिसका प्रयोग बंगाल से लेकर केरल तक कम्युनिस्ट पार्टियों ने किया और फेल हुए हैं। अगर मुस्लिम समुदाय को सेकुलर वैल्यू समझाया गया होता तो केरल कभी आईएसआईएस और पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया जैसे आतंकी संगठनों का गढ नहीं बनता। अगर कम्युनिस्ट लोग शासन में सेकुलर वैल्यू को इतना ही महत्व देते तो केरल में इस्लामिक युनिवर्सिटी से लेकर इस्लामिक बैंकिंग तक का चलन नहीं बढ़ता।
हाल के वर्षों में इस्लामीकरण से जुड़ी जितनी भयावह खबरें बंगाल और केरल से आयी हैं, और कहीं से नहीं आयीं। यह कैसे हो सकता है कि आप शासन और सोसायटी में सेकुलर वैल्यू को महत्व देते हों और आपके राज में संसार की सबसे कट्टरपंथी विचारधारा के लोग पलते बढ़ते हों? केरल में भले ही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी कम्युनिस्ट पार्टी से लड़ रहे हों लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वो उन्हीं के राजनीतिक एजंडा को पूरा करने का वादा कर रहे हैं।
कांग्रेस ने जो घोषणापत्र जारी किया है उसमें बहुत सी ऐसी आपत्तिजनक बातें हैं जो बीते दस सालों में कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी और पत्रकार सार्वजनिक मंचों से दोहराते रहे हैं। जैसे, अल्पसंख्यक संरक्षण के नाम पर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि "कांग्रेस यह सुनिश्चित करेगी कि प्रत्येक नागरिक की तरह अल्पसंख्यकों को भी पोशाक, भोजन, भाषा और व्यक्तिगत कानूनों के पसंद की स्वतंत्रता हो।"
यह इतना घोर आपत्तिजनक वादा है जो न केवल भारत के संविधान पर सवाल उठाता है बल्कि देश के भीतर दो कानून लागू करने की हिमायत भी करता है। क्या भारत में अल्पसंख्यकों को अपनी मर्जी से रहने, जीने, भोजन करने, भाषा बोलने पर कोई रोक है? अगर कांग्रेस का इशारा सिर्फ मुस्लिम समुदाय के प्रति है तो क्या वो यह कहना चाहती है कि कांग्रेस की सरकार बनी तो वह मुस्लिमों के लिए शरीयत सुनिश्चित करेंगे ताकि वह सरकारी अदालतों के समानांतर शरई अदालत चला सकें?
जहां तक पसंद के भोजन और पहनावे की बात है और इशारा अगर मुस्लिम समुदाय की ओर है तो उसका अपनी पसंद का कुछ होता ही नहीं। उसके लिए सबकुछ उसका इस्लाम तय करता है कि उसे क्या खाना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, बीवी से शोहबत कैसे करनी चाहिए। और तो और इस्लाम अपने फॉलोअर को यहां तक ताकीद करता है कि उन्हें पाखाना कैसे जाना चाहिए और पेशाब करने के बाद क्या करना चाहिए।
एक सच्चे मुसलमान की जिन्दगी में उसका अपनी पसंद का कुछ होता ही नहीं। खाना से लेकर पाखाना तक सबकुछ इस्लामिक रिवायतें तय करती हैं जिनको मोटे तौर पर शरई सिस्टम कहा जाता है। अल्पसंख्यकों के नाम पर कांग्रेस अगर उनकी पसंद की बात कर ही रहा है तो सबसे पहले उसे यह स्पष्ट कहना होगा कि क्या उनकी अपनी कोई पसंद है भी या नहीं? फिर खाना पाखाना से अलग व्यक्तिगत कानून की स्वतंत्रता की बात करना ही एक देश एक कानून को चुनौती देने जैसा है जो घोर आपत्तिजनक है। क्या कांग्रेस की सरकार आने पर वह काजियों की नियुक्ति करेगी जो जजों से अलग मुसलमानों के लिए अपना अलग आदेश जारी करेंगे?
इसी तरह घोषणापत्र में वादा किया गया है कि उनकी सरकार आयेगी तो वह सुनिश्चित करेंगे कि (मुस्लिम) अल्पसंख्यकों को बिना किसी भेदभाव के बैंकों से लोन मिल सके। सरकार, अदालत पर सवाल उठाते उठाते कांग्रेस ने बैंकों पर भी सवाल उठा दिया है कि वो मुस्लिमों को लोन देने में भेदभाव करते हैं। वित्तीय संगठन जाति धर्म नहीं देखते। वो अपना निवेश और रिटर्न देखते हैं। अगर किसी जाति या समुदाय के लोग लोन लेने के बाद उसे अदा करने में फिसड्डी पाये जाते हैं तो बैंक अपना रिटर्न सुनिश्चित करने के लिए इस जाति या समुदाय से जुड़े लोगों को लोन देने में अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं। यह एक सामान्य सी प्रैक्टिस है। ऐसे में उस जाति या समुदाय पर सवाल उठाने की बजाय बैंकिंग सिस्टम पर ही सवाल उठाने का क्या तुक है?
कांग्रेस का घोषणापत्र ऐसे ही आपत्तिजनक और विभाजनकारी वादों से भरा पड़ा है। इसी अन्याय को उनके कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों ने 'न्याय' का नाम दिया है। इसमें अल्पसंख्यकों के बहाने यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि मुस्लिम समुदाय के साथ भारत में भेदभाव हो रहा है जिसे उनकी सरकार आने पर खत्म कर दिया जाएगा।
लेकिन इस घोषणापत्र को ध्यान से समझें तो यह कांग्रेस का घोषणापत्र है ही नहीं। यह वर्ग विभाजन के जरिए वर्ग संघर्ष की तमन्ना रखनेवाले कम्युनिस्टों का घोषणापत्र है जिसे कांग्रेस के नाम पर जारी कर दिया गया है। यही कांग्रेस की वह नयी विचारधारा है जिसको बचाने और बढ़ाने के लिए राहुल गांधी मैदान में उतरे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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