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केवल शेषन ही क्यों, गिल और चावला पर भी चर्चा हो

Chunav Aayog: विपक्ष ने 2014 के बाद नियुक्त हर मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर सवाल उठाया है| मोदी सरकार बनने के बाद अचानक ईवीएम पर भी सवाल उठाए जाने लगे| कुछ एनजीओ ईवीएम और चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीमकोर्ट चले गए|

ईवीएम का विकास इंदिरा गांधी के जमाने में शुरू हुआ था और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया वही चल रही थी जो जवाहर लाल नेहरू ने शुरू की की थी|

Chunav Aayog

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने भी उसी प्रक्रिया को अपनाया था और बाद में नरेंद्र मोदी भी वही प्रक्रिया अपना रहे थे| विधि मंत्रालय सचिव स्तर के मौजूदा या रिटायर्ड अधिकारियों की सूची बनाता था, फिर उसमें से तीन का चयन होता है, जिसे प्रधानमंत्री को सौंप दिया जाता था| प्रधानमंत्री सलाह मशविरा करके राष्ट्रपति को नियुक्ति की सिफारिश भेज देते थे|

हालांकि संविधान सभा ने उम्मीद की थी कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का एक ढांचा विकसित किया जाएगा, लेकिन नेहरू से लेकर मोदी तक किसी ने कोई ढांचा विकसित नहीं किया था| जो मनमानी प्रक्रिया नेहरू ने अपनाई थी, उसे सभी अपनाते रहे| लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक लॉबी को तरह तरह की आशंकाएं सताने लगी और वे 2015 में ही सुप्रीमकोर्ट पहुंच गए| ढेरों याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन्हें सुप्रीमकोर्ट ने 2018 में पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ को सौंप दिया|

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जस्टिस के. एम. जोसफ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने 2 मार्च 2023 को फैसला सुनाया कि जब तक संसद से क़ानून नहीं बनता, तब तक चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस का पैनल करेगा| हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की अलग से प्रक्रिया ही नहीं है, वह वरीयता के आधार पर बनता है|

स्वाभाविक है चीफ जस्टिस का पैनल में शामिल किया जाना सरकार को नागवार गुजरा| सरकार ने अगस्त में ही नियुक्ति प्रक्रिया का नया बिल बना कर संसद में पेश कर दिया, जिसे दिसंबर 2023 में संसद ने पास भी कर दिया| इस बिल में चीफ जस्टिस की जगह केंद्र सरकार का एक मंत्री कर दिया गया था|

विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया था, लेकिन जब संसद ने पास कर दिया तो कांग्रेस ने क़ानून को सुप्रीमकोर्ट में फिर चुनौती दी और कहा कि यह संवैधानिक पीठ के आदेश का उल्लंघन है| कांग्रेस की नेता जया ठाकुर ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल की थी| इस बीच एक चुनाव आयुक्त अनूप चन्द्र पांडे रिटायर हो गए और लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ दिन पहले 9 मार्च को एक अन्य आयुक्त अरुण गोयल ने इस्तीफा दे दिया|

कांग्रेस चाहती थी कि जब तक सुप्रीमकोर्ट उनकी याचिका पर फैसला न करे, तब तक कोई चुनाव आयुक्त नियुक्त न किया जाए, लेकिन मोदी सरकार ने पैनल के कांग्रेसी सदस्य अधीर रंजन चौधरी के विरोध के बावजूद बहुमत के आधार पर दो नए चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिए| ये नियुक्तियां चुनावों की घोषणा से 48 घंटे पहले हुई थी| सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में दो टूक शब्दों में कहा कि क्या किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता तभी सिद्ध होगी, जब सिलेक्शन पैनल में ज्यूडिशियल मेंबर हो| सुप्रीमकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के कारण नई नियुक्तियों पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था|

जिस दिन से चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई है, उस दिन से कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं| पिछले दिनों जब राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचारकों के खिलाफ आई शिकायतों पर चुनाव आयोग ने उस पार्टी के अध्यक्ष को नोटिस देने की प्रक्रिया शुरू की, तो इस पर कांग्रेस ने कड़ा एतराज जताया क्योंकि चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आई शिकायत पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को और राहुल गांधी के खिलाफ आई शिकायत पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे को नोटिस दिया था| कांग्रेस ने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि उसने प्रधानमंत्री का बचाव करने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई है|

चुनाव आयोग और आयोग के सदस्यों की आलोचना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी टिप्पणी नहीं की थी, लेकिन 23 मई को एक इंटरव्यू में उन्होंने गढ़े मुर्दे उखाड़ दिए, जब उन्होंने बिना नाम लिए टी.एन. शेषन की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिया, जो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे और 1999 में गुजरात की गांधीनगर सीट पर भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवानी के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतरे थे।

21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या के समय लोकसभा के चुनाव चल रहे थे, तब टी.एन. शेषन एक मात्र चुनाव आयुक्त थे| परंपरा यह है कि चुनावों के दौरान किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार की मौत हो जाती है, और तब तक उसकी सीट पर वोटिंग नहीं हुई हो, तो सिर्फ उस सीट का चुनाव स्थगित कर दिया जाता है और बाद में नई नामांकन प्रक्रिया के साथ चुनाव करवाया जाता है| लेकिन राजीव गांधी के करीबी रहे शेषन ने 21 दिन तक बाकी सभी सीटों पर चुनावों को स्थगित कर दिया था| हालांकि देश के सात मुख्यमंत्रियों ने 21 दिन तक चुनाव स्थगित करने का विरोध किया था, लेकिन शेषन ने किसी की नहीं सुनी थी|

कांग्रेस ने इन 21 दिनों में राजीव गांधी की अस्थियों को देश भर में घुमा कर कांग्रेस के पक्ष में वातावरण बनाया| कांग्रेस के विज्ञापनों में राजीव गांधी की अंतिम यात्रा के साथ सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के फोटो का इस्तेमाल किया जिस कारण कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति पैदा हुई और चुनाव के बाद बहुमत नहीं मिलने के बावजूद कांग्रेस सरकार बन गई| टी.एन. शेषन की नियुक्ति चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में राजीव गाधी की सलाह से ही की गई थी| क्योंकि उस समय चंद्र शेखर की सरकार कांग्रेस के समर्थन पर ही टिकी हुई थी।

नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता पर कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवाल के जवाब में इसी घटना की याद दिला कर बताया कि कांग्रेस किस तरह के चुनाव आयुक्त नियुक्त करती थी, यह उनका ट्रेक रिकार्ड है| हालांकि मोदी ने चुनाव आयुक्त का नाम नहीं लिया, लेकिन जिस समय की घटना का उन्होंने जिक्र किया, उस समय टी. एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे|

टी.एन. शेषन के बारे में छवि है कि उनसे निष्पक्ष और दबंग मुख्य चुनाव आयुक्त कोई हुआ ही नहीं| हालांकि यह भी तथ्य है कि उन्हीं के समय बिहार में जमकर बूथ केप्चरिंग हुआ करती थी और वह लालू यादव एंड कंपनी का कुछ नहीं बिगाड़ सके थे| शेषन के तानाशाहीपूर्ण व्यवहार से प्रधानमंत्री नरसिंह राव बहुत क्षुब्ध थे, इसलिए उन पर नकेल डालने के लिए उन्होंने चुनाव आयोग को एक सदस्यीय से तीन सदस्यीय बना दिया था|

टी.एन. शेषन के रिटायरमेंट के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बने एम.एस. गिल भी कांग्रेस के करीब थे| एम.एस. गिल को तो उनके कार्यकाल के तुरंत बाद सोनिया गांधी ने पंजाब से कांग्रेस का राज्यसभा सदस्य बना दिया था| उन्हें दो टर्म तक राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और मनमोहन सरकार में मंत्री भी बनाया गया|

बाद में यूपीए सरकार के समय 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने नवीन चावला तो सोनिया गांधी के व्यक्तिगत वफादार थे| उनके कांग्रेस के साथ पुराने संबंधों के चलते जब 2006 में उनकी चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति हुई थी, तो बहुत हंगामा हुआ था| उनकी नियुक्ति को उस समय के राज्यसभा के विपक्ष के नेता जसवंत सिंह ने सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी| उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए 200 सांसदों ने उनके खिलाफ राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को याचिका देकर उन्हें बर्खास्त करने की मांग की थी|

बाद में भी उनका व्यवहार एक कांग्रेसी कार्यकर्ता जैसा ही था, जब चुनाव आयोग ने एक मामले में सोनिया गांधी को नोटिस देने का फैसला किया था, तो चावला ने उसका विरोध किया| उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने तो उन्हें हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भी की थी, लेकिन मनमोहन सरकार ने राष्ट्रपति को भेजी गई उन्हें हटाने वाली याचिका को खारिज कर दिया था| बाद में 2009 के लोकसभा चुनाव नवीन चावला ने ही मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में करवाए|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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