Christmas: क्रिसमस के दिन आत्मचिंतन करें ईसाई
ईसाई समाज के बड़े वर्ग का मानना है कि 25 दिसबंर के दिन ही ईसा मसीह का जन्म हुआ था, इसका कोई प्रमाणिक रूप से ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार नहीं है और इस पर रहस्य अब भी बना हुआ है।

आज क्रिसमस है। सभी पाठकों को इस पर्व की हार्दिक बधाई। विश्वभर के ईसाई 25 दिसंबर को यीशु मसीह की जयंती के रूप में मनाते हैं। गैर-ईसाई भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इस दिन के आसपास दुनिया भर में घरों-बाजारों को रोशनियों से सराबोर करने के साथ करोड़ों-अरबों डॉलर के उपहारों का आदान-प्रदान, खरीददारी और टर्की पक्षी के मांस सहित तरह-तरह के व्यंजनों से भरपूर भोज का आयोजन किया जाता है। यीशु और उनके जीवन को सादगी और अध्यात्म का प्रतीक माना जाता है, लेकिन उनके जन्मदिवस को कुछ सदी पूर्व से चरम विलासिता और ऐश्वर्य चिह्न के तौर पर बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
परंतु विडंबना देखिए कि कोई नहीं जानता कि ईसा मसीह का जन्म कब हुआ था? पवित्र ग्रंथ बाइबल में वर्णित ल्यूक-मैथ्यू की गोस्पेल कथाओं के अनुसार, बैथलहम में 'दिव्य-हस्तक्षेप' के बाद कुंवारी मैरी ने यीशु को जन्म दिया था, वह भी बिना किसी पुरुष संपर्क के। क्या विज्ञान, जैविक पिता के बिना एक महिला द्वारा गर्भधारण की घटना को स्वीकार्यता देगा? यदि इस विश्वास को भी आधार बनाएं, तो भी इसमें यीशु की जन्मतिथि का कोई उल्लेख नहीं है। आखिर 25 दिसंबर को ही क्रिसमस मनाना कैसे और कब निर्धारित हुआ?
ईसाई समाज का एक वर्ग मानता है कि यीशु जयंती 25 दिसंबर को मनाने की घोषणा ईसा के जन्म के लगभग तीन शताब्दी पश्चात 350 ईस्वी में तत्कालीन पोप जूलियस-1 (337-52) ने की थी, जो उनका व्यक्तिगत निर्णय था। उन दिनों 'पेगन' (बुतपरस्त) रोमनवासी प्रतिवर्ष 'सैटर्नालिया' पर्व मनाते थे, जिसमें उत्सव के साथ प्रीतिभोज का आयोजन और उपहारों का आदान-प्रदान भी होता था।
यह परंपरा आज हम क्रिसमस के समय भी देखते है। तब पोप जूलियस-1 ने बड़ी ही चतुराई से एक 'पेगन' पर्व पर ईसाइयत की छाप लगा दी। संयोग देखिए कि 'सैटर्नालिया' उन्हीं सैटर्न देवता (शनिदेव) को समर्पित था, जिन्हें प्रसन्न रखने हेतु आस्थावान हिंदू अनादिकाल से पूजते आ रहे हैं।
ईसाई समाज में एक अन्य वर्ग ऐसा भी है, जो उपरोक्त सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता। यदि ऐसा है, तो क्यों सदियों तक ईसाइयों के एक प्रभावी वर्ग ने क्रिसमस मनाने का मुखर विरोध किया? इंग्लैंड में वर्ष 1624-60 के बीच क्रिसमस का त्योहार प्रतिबंधित था। इसी कालखंड में लगभग 22 वर्षों तक अमेरिकी राज्य मैसाचुसेट्स में भी इस पर्व पर पाबंदी थी। यह पाबंदी करने वाले स्वयं को यीशु का सच्चा अनुयायी मानते थे। स्पष्ट है कि 25 दिसबंर के दिन ही ईसा मसीह का जन्म हुआ था, इसका कोई प्रमाणिक रूप से ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार नहीं है और इस पर रहस्य अब भी बना हुआ है।
क्रिसमस का एक ऐसा भी इतिहास रहा है, जिसमें इस पर्व का उपयोग मजहबी विरोधियों को प्रताड़ित करने हेतु भी किया जाता था। वर्ष 1466 में तत्कालीन पोप पॉल-2 के निर्देश पर क्रिसमस के दिन रोम में यहूदियों को सरेआम निर्वस्त्र करके घुमाया गया था। कालांतर में यहूदी पुजारियों (रब्बी) को विदूषक परिधान पहनाकर उनके जुलूस निकाले जाने लगे।
25 दिसंबर 1881 को पोलैंड के वारसॉ में 12 यहूदियों को उन्मादी ईसाइयों ने निर्ममता के साथ मौत के घाट उतार दिया, कई महिलाओं का बलात्कार तक किया था। चूंकि जन्म से ईसाई हिटलर को तत्कालीन चर्च समर्थित जर्मन पार्टियों का समर्थन प्राप्त था, तो क्या इस नरपिशाच को यहूदियों के नरसंहार की प्रेरणा सदियों तक चले यहूदी विरोधी ईसाई अभियानों से मिली थी?
विश्व में 120 से अधिक ईसाई बहुसंख्यक देश है और ईसाइयों की कुल आबादी 240 करोड़ से अधिक है। प्रश्न है कि इनकी संख्या इतनी कैसे हुई? इसका उत्तर चर्च और ईसाई मिशनरियों द्वारा ईसा मसीह के नाम पर सदियों से चल रहे मजहबी दमनचक्र (मतांतरण सहित) में छिपा है।
1492 में नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस के अमेरिका पहुंचने के बाद वहां के मूल निवासियों, जिन्हें 'रेड इंडियंस' भी कहा जाता है- उन्हें और उनकी संस्कृति-परंपराओं का अस्तित्व चरणबद्ध तरीके से मिटा दिया गया। इसी तरह, 17वीं-18वीं शताब्दी में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की मूल स्थानीय जनजातियों का मतांतरण किया गया।
कनाडा में 1876-1996 तक ईसाइयत के विस्तार हेतु चर्च ने 'इंडिजेनस रेजिडेंशियल स्कूल' के माध्यम से स्थानीय लोगों को उनकी मूल सांस्कृतिक-पांरपरिक जड़ों से काटकर ईसाई बनाया। इस हिंसक और घृणास्पद व्यवस्था का एकमात्र उद्देश्य स्थानीय "बच्चे में इंडियन को मारना" अर्थात उन्हें उनकी मूल संस्कृति से पृथक करना था। इसी वर्ष जुलाई में अपने कनाडा दौरे के समय पोप फ्रांसिस ने चर्च के कुकर्मों पर खेद प्रकट करते हुए कहा था, "...मूल निवासियों के खिलाफ अनगिनत ईसाइयों ने जो पाप किए, उसके लिए मैं विनम्रतापूर्वक माफी मांगता हूं।"
अमेरिका आदि ईसाई बाहुल्य देशों में अश्वेतों का दमन किसी से छिपा नहीं है। वास्तव में, इस बर्बरता के पीछे ऐतिहासिक और मजहबी कारण है। वर्ष 1555 से लेकर 1865 तक अधिकांश अफ्रीकियों को गुलाम बनाकर जबरन अमेरिका में लाया गया था। उनसे पशु तुल्य व्यवहार किया जाता था। दासता के पैरोकार अपने अमानवीय कृत्यों के समर्थन में प्राय: बाइबल को उद्धृत करते थे।
ईसाइयों के पवित्रग्रंथ बाइबल में ऐसे कई संदर्भ है, जो दासता का समर्थन और दास व उनके मालिकों के बीच के संबंधों को परिभाषित करते है- जिसमें निर्गमन (Exodus) 21:2-6, 21:20-21, पतरस-1 (1 Peter) 2:18-21, कुलुस्सियों (Colossians) 3:22, 4:1, लैव्यवस्था (Laviticus) 25:44-46 शामिल है। यूरोप एवं अमेरिका में प्राचीन दास प्रथा के अत्याचार से लेकर आज तक आए दिन श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा निरपराध अश्वेत व्यक्तियों को गोलियों से भूनना, उसी क्रूर चिंतन का परिचायक है।
जब 13वीं शताब्दी में 'हेरेटिक' ईसाइयों, जो रोमन कैथोलिक चर्च के सिद्धांतों की अनुपालना नहीं कर रहे थे और तथाकथित 'शैतान की पूजा' कर रहे थे- को दंडित किया जा रहा था। तब उनके साथ 'हेरेटिक' महिलाओं को भी ढूंढ-ढूंढकर उन्हें 'चुड़ैल' घोषित करना और फिर अमानवीय यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिया गया।
ईसाई समाज में महिलाओं की दुर्दशा की जड़ें बाइबल के पुराने और नए विधान में मिलती है। इस ग्रंथ में 1-तीमुथियुस (1 Timothy) 2:12, इफिसियो (Ephesians) 5:22-24, 1-कुरिन्थियो (1 Corinthians) 11:3, 14:34-35, उत्पत्ति (Genesis) 3:16, आदि ऐसी वर्सेज हैं, जो महिलाओं को उनके पति के अधीन रहने का आदेश देती हैं। ईसाई दर्शन और संबंधित वांग्मय के अनुसार, महिलाओं को ही मानव-जाति के पतन के लिए दोषी ठहराया गया है और वह दर्द के साथ बच्चे पैदा करने लिए अभिशप्त है।
विश्व के अन्य हिस्सों की भांति भारत भी चर्च प्रेरित मजहबी दंश को 16वीं शताब्दी में फ्रांसिस ज़ेवियर के गोवा आगमन से झेल रहा है, जिसे ब्रितानियों के औपनिवेशिक राज में गति मिली। सबसे पहले चर्चों और ईसाई मिशनरियों ने अंग्रेजों के सहयोग से हिंदू समाज में ब्राह्मणों के साथ अन्य सवर्ण और शिक्षित वर्ग के मतांतरण का प्रयास किया। किंतु वे फ्रांसिस जेवियर की भांति बुरी तरह असफल हुए। इस पर फ्रांसिस द्वारा 31 दिसंबर 1543 को रोम के तत्कालीन शासक को लिखा पत्र स्मरण होता है, जिसमें उसने लिखा था, "यदि ब्राह्मण विरोध नहीं करते, तो हम वहां सभी (हिंदुओं) को ईसा मसीह की शरण में ले आते।"
इस प्रकार की असफलताओं से बौखलाए चर्च और ईसाई मिशनरियों ने अपनी रणनीति को बदलते हुए दलितों-वंचितों के मतांतरण और हिंदू समाज को विभाजित करने हेतु ब्राह्मणों का दानवीकरण करना प्रारंभ कर दिया। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी यीशु के नाम पर चर्च और मिशनरियों द्वारा मतांतरण और ब्राह्मण-विरोधी अभियान देश के कई भागों में वामपंथियों, स्वघोषित सेकुलरिस्टों और स्वयंभू उदारवादियों के प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग से आज भी जारी है। क्या पोप फ्रांसिस या वेटिकन, कनाडा की भांति भारत से भी चर्च के किए पापों पर माफी मांगेंगे?
यीशु के नाम पर हुई उपरोक्त घटनाओं ने केवल मानवता को शर्मसार किया है। जिस पर आज कोई बात करने को तैयार नहीं। ऐसे लोगों में वह समूह, संगठन, व्यक्ति आदि भी शामिल हैं, जो सामाजिक न्याय, गरीबी, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, मजहबी सहिष्णुता, पर्यावरण, मानवाधिकार और पशु-अधिकारों की रक्षा के नाम पर केवल भारत की मूल सनातन संस्कृति, उसकी बहुलतावादी परंपराओं और पर्वों पर दशकों से आघात पहुंचा रहे हैं।
मन में बिना किसी दूसरे विचार के क्रिसमस का पर्व दुनियाभर में धूमधाम से ऐसे ही मनाया जाता रहे, तो चर्च, वेटिकन, और आस्थावान ईसाइयों को चाहिए कि वे क्रिसमस के दिन अपनी प्रार्थनाओं में अपने पूर्वजों (इंजीलवादियों सहित) की अक्षम्य गलतियों पर निष्पक्ष होकर आत्मावलोकन करें।
सोचिए, एक पोप ने सदियों पहले ईसा मसीह की जन्मतिथि निर्धारित की थी, तो संसार बिना किसी प्रश्न के 25 दिसंबर को क्रिसमस मना रहा है। किंतु हिंदू समाज से श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवजी और अन्य देवी-देवताओं के जन्म, उनके जन्मस्थान और अस्तित्व आदि पर न केवल निरंतर सवाल पूछा जाता है, अपितु उन्हें कलंकित-अपमानित भी किया जाता है।
वर्ष 2007 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा और अपनी पूजा-पद्धति से ईसाई श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा परोक्ष रूप संचालित यूपीए सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करके दावा किया था- "श्रीराम एक काल्पनिक चरित्र है, जिनका अस्तित्व सिद्ध करने का कोई ऐतिहासिक-वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।" भले ही विरोध के पश्चात वह हलफनामा वापस ले लिया गया, किंतु क्या ऐसा दुस्साहस भारत में कोई स्वघोषित सेकुलरवादी, वामपंथी और जिहादी समूह मुखर होकर क्रिसमस या ईसा मसीह के लिए कर सकता है?
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500 वर्ष पुराने पारंपरिक भोजन के नाम पर दुनियाभर में करोड़ों- अकेले इंग्लैंड में प्रतिवर्ष 1 करोड़, तो अमेरिका में 2.2 करोड़ टर्की पक्षी मार दी जाती है। क्रिसमस के कारण टर्की-पालन एक वैश्विक उद्योग बन चुका है, जिसमें भूमि, जल और अन्य संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग होता है। क्या यह सब ईसा मसीह के मृदु व्यक्तित्व, उनके विनयशील जीवन और उनकी शिक्षाओं के अनुरूप है?
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