Chinese Economy: चीन से बाहर क्यों जा रही हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां?
चीन से भाग रही बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लेकर चीन चिंतित है। वह निवेशकों को समझाने में जुट गया है। चीन यह संदेश दे रहा है कि यह समय चीन से जाने का नहीं, बल्कि चीन की आर्थिक प्रगति में शामिल होकर लाभ प्राप्त करने का है।

Chinese Economy: पिछले सप्ताह चाइनीज पीपुल्स पोलिटिकल कंसलटेटिव कांफ्रेस का आयोजन हुआ। इस कांफ्रेंस में शी जिनपिंग समेत तमाम कम्युनिस्ट नेताओं ने भाग लिया। चीन ने इस कांफ्रेस के जरिए दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसकी अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और अमेरिका के बहकावे में आकर यदि कंपनियां चीन छोड़ रही हैं तो उन्हें आगे बहुत पछताना पड़ेगा, क्योंकि चीन कोविड से उबरकर फिर से सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यव्स्था बनने जा रहा है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का चीन से भागना शी जिनपिंग की सरकार को कितना अखर रहा है, इसका उदाहरण चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स के संपादकीय से लिया जा सकता है। ग्लोबल टाइम्स लिखता है- "अब इसमें तनिक भी शक की गुंजाइश नहीं कि चीन अब आर्थिक प्रगति की राह पर लौट आया है और वह फिर से वैश्विक पटल पर एक चमकते सितारे के रूप में स्थापित हो रहा है, ऐसे में यह देखना विचि़त्र लगता है कि कुछ विदेशी कंपनियां अपने आर्थिक फैसले, धारा के विपरीत ले रही हैं।"
चीन यूं ही परेशान नहीं हो रहा है। इसके पीछे कुछ गंभीर कारण हैं। अमेरिका और यूरोप की कंपनियां ना केवल वहां से पलायन कर रही हैं, बल्कि आर्थिक संगठनों और उनके प्रमुखों की ओर से चीन के आर्थिक माहौल को लेकर गंभीर आरोप और आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं। 4 मार्च को अमेरिकन "चैंबर्स आफ काॅमर्स इन चीन" ने एक सर्वे जारी किया, जिसमें कहा गया है कि चीन में काम करने वाले अमेरिकी बिजनेस हाउस अपने भविष्य को लेकर काफी सशंकित हैं। अधिकतर अमेरिकी बिजनेस हाउस का कहना है अब निवेश के हिसाब से चीन दुनिया के तीन सबसे प्रमुख देशों में शामिल नहीं रहा। इसलिए अधिकतर कंपनियां अपने निवेश की योजना चीन से बाहर बनाने लगी हैं।
अमेरिकन ही नहीं यूरोपियन निवेशक भी चीन से बड़ी तेजी से दूरी बढ़ा रहे हैं। हाल ही में सिटी ग्रुप इंक के यूरोपीय ऑपरेशंस के चीफ एक्जक्यूटिव डेविड लिविंगस्टोन ने ब्लूमबर्ग टीवी के एक इंटरव्यू में कहा कि उनके ग्राहक चीन से अपनी सप्लाईलाइन को कहीं और ले जा रहे हैं और यह सिलसिला आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगा। यही नहीं लिविंगस्टोन ने यहां तक कहा कि हम एक दशक से यह ट्रेंड देख रहे हैं कि चीन से निकलकर कंपनियां मैक्सिको और वियतनाम आदि देशों में जा रही हैं। उन्होंने कहा कि वे इलेक्ट्रानिक चिप के बिजनेस को भी चीन से बाहर जाते देख रहे हैं। क्योंकि पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह से चीन ने कोविड के दौरान फोन से लेकर कार तक की इलेक्ट्रानिक चिप की आपूर्ति पर रोक लगा दी थी।
यह ठीक भी है कि चीन से अब इलेक्ट्रानिक्स चिप की कंपनियां अपना बोरिया बिस्तर समेट रही हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित कंपनी एप्पल ने इस काम को पहले कर दिया। इसके अलावा गूगल, अमेजन, सैमसंग व वोल्वो ने भी चीन से निकलना शुरू कर दिया है। सीएनबीसी के अनुसार चीन इस समय न केवल इलेक्ट्रोनिक्स, बल्कि परिधान, फुटवियर, फर्नीचर और ट्रेवेल गुड्स का बिजनेस भी खो रहा है। अमेरिकन एंटरप्राइजेज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो डेरेक स्कीजर्स का कहना है कि कमजोर होती चीनी अर्थव्यवस्था, कोविड के कड़े नियम, बदले की कारवाई के तहत व्यापार संबंधी प्रतिबंध और चीन की कई फ्रंट पर युद्ध जैसी स्थिति के बाद चीन में अब बिजनेस करना काफी कठिन हो गया है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का चीन से मोह भंग एक दिन में नहीं हुआ है। चीन में मानवाधिकार का हनन, बौद्धिक संपदा की चोरी, व्यापार पर कई प्रकार के प्रतिबंध, बाजार में मनमाफिक घालमेल और कंपनियों के बोर्ड में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों का अनिवार्य प्रवेश ये सब बाहर की कंपनियां लगातार झेल रही हैं और अब ये उनको नागवार गुजर रहा है। फिर चीन का लेबर मार्केट सिकुड़ रहा है। चीन का कामगार बुजुर्ग हो रहा है। गरीबी पर काबू पाने के बाद से चीन में मजदूरों का मिलना भी मुश्किल हो रहा है। कठोर लाॅक डाउन ने चीनी मजदूरों के पलायन को काफी बढ़ा दिया है।
यूरोपीयन चैम्बर्स के वाइस प्रेसिडेंट बेटिना स्कियोन कहते हैं- चीन के बारे में एक ही अनुमान लगा सकते हैं कि उसे लेकर कोई अनुमान नहीं लगा सकते और यह बिजनेस के लिए जहर के समान है। यही कारण है कि यूरोप की कई कंपनियां चीन में अपने निवेश के फैसले पर अभी कोई फैसला नहीं कर रहीं। वे देखना चाहती हैं कि चीन की यह अनिश्चितता कब तक बनी रहती है और उनमें से बहुत सी अपने भविष्य के बिजनेस को किसी और देश में देख रही हैं।
अमेरिका और यूरोप के साथ बिगड़ते चीन के रिश्ते भी बाहर की कंपनियों के लिए एक बुरा सबक बन रहे हैं। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और कोरिया की कंपनियों को चीन में बुरा समय देखना पड़ा है। जापान और चीन के बीच तनातनी हुई तो चीन में काम कर रही जापानी कंपनियों को बाॅयकाट का सामना करना पड़ा। उनके कंटेनर को जबरन पोर्ट पर रोका गया। चीनी उपभोक्ताओं ने उनके उत्पादों का बाॅयकाट किया। जिस अनुपात में अमेरिका चीन की कंपनियों पर प्रतिबंध या रोक लगाता है उसी अनुपात में चीन में भी अमेरिकी कंपनियों पर प्रतिबंध लग जाता है।
चीन को अब यह लगने लगा है कि यदि व्यापार में वह राजनीति को घुसेड़ता रहेगा तो उसका परिणाम उसे ही भुगतना पड़ेगा। इसीलिए वह चिंतित भी है। ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि यदि लंबी अवधि के वैश्विक परिदृश्य को देखे तो चीन से ज्यादा संभावना वाला कोई देश नहीं है। असीमित निर्माण क्षमता और सप्लाई चेन की बड़ी आधारभूत संरचना के साथ चीन आगे बना रहेगा। यदि कुछ विदेशी कंपनियों को उसके बाद भी बाजार में कोई गड़बड़ी दिखती है और उपलब्ध संभावनाओं का लाभ नहीं उठातीं और अमेरिका के साथ गठजोड़ में चीन से अलग होती हैं तो यह उनकी समस्या और नुकसान है।
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पर लगता नहीं कि चीन का अमेरिका या यूरोप से टकराव कम होने वाला है। चीन ने अपनी आर्थिक ताकत के कारण ही दुनिया में अपना दबदबा कायम कर रखा है। यदि आर्थिक रूप से चीन कमजोर हुआ तो उसका खामियाज़ा शी जिनपिंग को सबसे अधिक भुगतना पड़ेगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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