China in Afghanistan: तालिबान क्यों कर रहा है चीन का स्वागत?

China in Afghanistan: खनिज और पेट्रोलियम दोहन के समझौते के साथ अफगानिस्तान में घुसने वाला चीन अब तालिबान लैंड में पैर जमाने के लिए रेल और रोड नेटवर्क अफगानिस्तान तक ले जा रहा है, बस उसे खौफ है इस्लामिक आतंकवादी संगठनों से जो चीनियों को लगातार निशाना बना रहे हैं। न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने 4 जुलाई को अधिकारियों के हवाले से यह खबर जारी की कि चीन 3,125 किमी लंबे रेलवे और सड़क नेटवर्क के जरिए किर्गिस्तान और उज़्बेकिस्तान से होते हुए अफगानिस्तान के सीमावर्ती शहर हेयरटन तक पहुंच बना रहा है।

चीन पहले ही किर्गिस्तान की सीमा पर झिंजियांग के काशगर तक एक रेलवे लाइन बिछा चुका है। वह सड़क मार्ग से किर्गिस्तान व उज्बेकिस्तान तक भी पहुंच चुका है। चीन की शिपमेंट कंपनियां इसी तरह अफ़गानिस्तान एक्सप्रेस मार्ग के भी तैयार होने की उम्मीद कर रही हैं। चीनी कंपनी न्यू लैंड-सी कॉरिडोर ऑपरेशन कंपनी ने तो स्टेटमेंट भी जारी किया है। लेकिन चीन का विदेश मंत्रालय अफगानिस्तान के साथ खुलकर व्यापार बढाने पर सशंकित है।

China in Afghanistan: Why is Taliban welcoming China?

एक बयान में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि आतंकवाद का दृढ़तापूर्वक और मजबूती से मुकाबला करने में अफगानिस्तान का चीन समर्थन करता है। पर आगे का संबंध सुरक्षा की शर्त पर ही निर्भर करता है। ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम),जो कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा सूचीबद्ध और चीनी सरकार द्वारा नामित एक आतंकवादी संगठन है, से चीन को सबसे ज्यादा खतरा है।

अफगानिस्तान में ईटीआईएम चीन के प्रति बेहद आक्रामक है। चीन चाहता है कि अफगानिस्तान अपनी प्रतिबद्धता को ईमानदारी से निभाए और दृढ़ संकल्प के साथ ईटीआईएम सहित सभी आतंकवादी संगठनों पर नकेल कसे। जब तक अफगानिस्तान में चीन और अन्य देशों के नागरिकों, संस्थानों और परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक चीनी निवेशक खुलकर अफगानिस्तान की ओर रुख नहीं करेंगे।

मौजूदा तालिबान सरकार चीन के साथ वह हर समझौता करने के लिए तैयार है जिससे उसे पैसा मिल सके। पूरी दुनिया से कटे अफगानिस्तान के लिए चीन एकमात्र आशा का केंद्र है, क्योंकि तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं देने के बावजूद चीन हर किस्म के समझौते पर हस्ताक्षर कर रहा है। अफगानिस्तान के मसले के राजनीतिक समाधान के लिए सभी वैश्विक मंचों पर तालिबान की वकालत भी कर रहा है।

हाल ही में भारत के नेतृत्व में हुई एससीओ बैठक में चीन ने अफगानिस्तान में मानवीय सहायता भेजने और वहां स्थाई शांति की कोशिश का समर्थन किया था। एससीओ मे अपना समर्थन देख तालिबान प्रशासन ने यह मांग भी रख दी है कि एससीओ अपनी भविष्य की बैठकों में अफगानिस्तान के प्रतिनिधियों को आमंत्रित करे। कतर स्थित तालिबान के प्रतिनिधि सुहैल शाहीन ने एक समाचार चैनल के जरिए यह मांग रखी।

एससीओ पर विदेश मंत्रियों की बैठकों में भी चीन और पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर अपने पक्ष रखे और गोवा से निकलते ही चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विदेश मंत्री इस्लामाबाद में मिले। वहां अफ़गानिस्तान को इस बात के लिए राजी किया गया कि वह चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी सी-पैक में शामिल होगा।

चीन के लिए सी-पैक एक डेड प्रोजेक्ट बनता जा रहा है, जिसमें उसे अपना 6 अरब डॉलर का निवेश डूबता दिखाई दे रहा है। भारत के विरोध और बलूचों के हिंसक बॉयकाट के कारण पाकिस्तान और चीन दोनों के हौसले पस्त हो गए हैं। फिर पाकिस्तान इस कदर कर्ज में डूब चुका है कि अब वह सी पैक में पैसा लगाने की स्थिति में नहीं है। चीन इसलिए ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को सी-पैक में शामिल करने की कोशिश कर रहा है।

इसके अलावा चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान त्रिपक्षीय विदेश मंत्रियों की वार्ता, अफगानिस्तान पर चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान के विदेश मंत्रियों की अनौपचारिक बैठक, ट्रोइका प्लस बैठक और संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए भी अफगानिस्तान में स्थिरता और सहायता के लिए आम सहमति और तालमेल बनाने के प्रयास में चीन लगा है।

दरअसल चीन अफगानिस्तान के खनिज-समृद्ध भूभाग पर अकेले खेलने का मंसूबा बना रहा है। हाल ही में अफ़गानिस्तान के लिथियम भंडारों का दोहन करने के लिए चीन ने अरबों का सौदा किया है। लिथियम ऊर्जा के स्रोत बैटरी का प्रमुख इनपुट है। लैपटॉप से लेकर इलेक्ट्रिक कारों तक में इसका उपयोग होता है। अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार ने देश के उत्तर में तेल की खोज एवं उत्पादन के लिए भी एक चीनी कंपनी के साथ ही अनुबंध किया है। 2021 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर नियंत्रण के बाद किसी विदेशी फर्म के साथ पहला बड़ा ऊर्जा समझौता है।

पर चीन के लिए अफ़ग़ानिस्तान में पांव पसारना इतना भी आसान नहीं है। इसके लिए उसे अपने नागरिकों और अधिकारियों की जान की कुर्बानी भी देनी पड़ रही है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में चीनी हितों के खिलाफ हमलों में तेजी आई है। 2018 के बाद से, पाकिस्तान के अंदर चीन के खिलाफ कम से कम पांच हमले किए गए। अगस्त 2018 में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने डालबैंडियन में आत्मघाती हमला कर तीन चीनी नागरिक घायल कर दिए। नवंबर 2018 में कराची में चीनी वाणिज्य दूतावास पर बीएलए द्वारा किए गए हमले में चार पाकिस्तानियों की मौत हो गई। जून 2021 में उत्तर-पश्चिमी खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत के कोहिस्तान में एक बस पर हमला कर नौ चीनी श्रमिकों को मौत की नींद सुला दी। उसके बाद चीनी इतने डर गए कि बांध पर काम बंद कर वहां से भाग लिए।

अप्रैल 2021 में क्वेटा के एक होटल पर टीटीपी द्वारा आत्मघाती हमला किया गया, जहां चीनी राजदूत ठहरे हुए थे। इस घटना में पांच पाकिस्तानी नागरिक मारे गए। 2022 में कराची विश्वविद्यालय में कन्फ्यूशियस संस्थान के कर्मचारियों को ले जा रही एक वैन पर बीएलए द्वारा आत्मघाती हमला किया गया, जिसमें तीन चीनी और एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत हो गई।

अफ़ग़ानिस्तान में चीनियों पर हमले आईएसआईएस से जुड़ा संगठन इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रोविंस (आईएस-केपी) भी कर रहा है। तालिबान से खोई जमीन वापस पाने के लिए आईएस-केपी की रणनीति मध्य एशिया से किसी भी विदेशी ताकत को बाहर रखने की है। इस आतंकवादी संगठन ने 12 दिसंबर, 2022 को काबुल के लोंगन होटल को निशाना बनाया, जहां चीनी निवेशक ठहरे हुए थे। हमले में कम से कम तीन लोग मारे गए और 18 से अधिक घायल हो गए, जिनमें पांच चीनी नागरिक भी थे।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर इतना जोखिम लेकर चीन अफ़ग़ानिस्तान में क्यों अपनी पैठ बढ़ा रहा है। विशेषज्ञ इसके तीन कारण बता रहे हैं। पहला यह कि चीन ने ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशिया के अन्य देशों में जो निवेश कर रखा है, उसकी सुरक्षा के लिए तालिबान का साथ जरुरी है, क्योंकि अधिकतर आतंकवादी संगठन अफ़ग़ानिस्तान से ही ऑपरेट कर रहे हैं और उन पर लगाम तालिबान ही लगा सकते हैं। इसे बीजिंग की हेजिंग पॉलिसी भी कहा जा रहा है।

दूसरा, चीन सी-पैक को लेकर चिंतित है। अफ़ग़ानिस्तान के शामिल होने से परियोजना में गति आ सकती है और तीसरा सबसे बड़ा कारण अफ़ग़ानिस्तान में मिनरल्स और पेट्रोलियम का भंडार, जो इस समय चीन को ग्लोबल प्रोडक्शन हाउस बनाये रखने में काम आ सकता है। इसीलिए जब कोई अफ़ग़ानिस्तान में पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं है तो तालिबान के लिए भी चीन किसी मेहरबान के समान है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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