'वन्दे मातरम्' से शपथ ग्रहण की शुरुआत!CM विजय का वो बड़ा सियासी दांव, BJP और विरोधियों को किया चारों खाने चित

Tamil Nadu CM Vijay: तमिलनाडु की राजनीति में 10 मई को एक ऐसा ऐतिहासिक पल आया, जिसने न केवल राज्य बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। 'थलपति' विजय ने जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो नजारा किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा था। हजारों की भीड़ और गूंजते नारों के बीच विजय ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने सीधे तौर पर दिल्ली की सत्ता और बीजेपी को एक बड़ा संदेश दे दिया। कार्यक्रम की शुरुआत आमतौर पर होने वाले 'तमिल थाई वाल्थु' (राज्य गीत) के बजाय 'वन्दे मातरम्' के पूरे गान के साथ हुई।

यह सिर्फ एक प्रोटोकॉल का पालन नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक चाल मानी जा रही है। विजय ने अपनी शपथ ग्रहण के जरिए यह दिखाने की कोशिश की है कि उनकी पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) न केवल तमिल अस्मिता का सम्मान करती है, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों पर भी उतनी ही मुखर है।

Tamil Nadu CM Vijay

क्या था विजय का 'वन्दे मातरम्' वाला मास्टरस्ट्रोक?

तमिलनाडु में अब तक यह परंपरा रही है कि सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत तमिल गौरव के प्रतीक 'तमिल थाई वाल्थु' से होती है। लेकिन विजय के शपथ ग्रहण में सबसे पहले 'वन्दे मातरम्' का पूरा गान हुआ, उसके बाद राष्ट्रगान और फिर राज्य गीत गाया गया। दरअसल केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक निर्देश जारी किया था कि औपचारिक सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत का पूर्ण संस्करण बजाना अनिवार्य होगा।

विजय ने इस निर्देश का अक्षरश: पालन करके बीजेपी के उस एजेंडे की हवा निकाल दी, जिसमें विपक्ष पर राष्ट्रगीत के अपमान या उसे अधूरा छोड़ने का आरोप लगाया जाता रहा है। मंच पर विजय के साथ लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। राहुल गांधी लगातार केंद्र के उन आरोपों को खारिज करते रहे हैं कि कांग्रेस ने नेहरू के समय में सांप्रदायिक तुष्टीकरण के लिए 'वन्दे मातरम्' के कुछ अंशों को हटा दिया था। विजय के इस कदम से राहुल गांधी को भी उस नैरेटिव को काटने में मदद मिली है।

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु: दो राज्यों की विरोधाभासी तस्वीर (Tamil Nadu vs West Bengal)

दिलचस्प बात यह है कि जहां गैर-बीजेपी नेता विजय ने राष्ट्रगीत के प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया, वहीं 09 मई को पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं देखा गया। बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी और सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे दिग्गज मौजूद थे, लेकिन वहां 'वन्दे मातरम्' के उस पूर्ण गान का वह स्वरूप नहीं दिखा जो विजय के कार्यक्रम में नजर आया।

राजनीतिक विश्लेषक इसे विजय की एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने बीजेपी के ही मैदान पर उन्हें मात देने की कोशिश की है। विजय ने साबित किया कि वे तमिल राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच एक ऐसा संतुलन बना सकते हैं, जिसे चुनौती देना बीजेपी के लिए भी मुश्किल होगा।

'वन्दे मातरम्' का अपमान अब पड़ेगा भारी: नया कानून और सख्ती

विजय का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश 'वन्दे मातरम्' की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। इसी हफ्ते मोदी कैबिनेट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए 'राष्ट्रीय गौरव के अपमान का निवारण अधिनियम' (Prevention of Insults to National Honour Act) में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

इस नए बदलाव के तहत अब राष्ट्रगीत 'वन्दे मातरम्' को भी राष्ट्रगान 'जन गण मन' के बराबर का दर्जा दे दिया गया है। इसका मतलब यह है कि:

  • अब अगर कोई 'वन्दे मातरम्' का अपमान करता है या इसके गान में बाधा डालता है, तो यह एक संज्ञेय अपराध (Cognisable Offence) होगा।
  • दोषी पाए जाने पर जेल की सजा, भारी जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
  • पहले यह सुरक्षा सिर्फ राष्ट्रध्वज, संविधान और राष्ट्रगान तक ही सीमित थी।

2026 की जंग और विजय का नया तेवर

मुख्यमंत्री विजय ने शपथ लेते ही यह साफ कर दिया है कि उनकी शासन व्यवस्था असली, धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होगी। उन्होंने खुद को किसी शाही खानदान का वारिस बताने के बजाय जनता का सेवक बताया।

कांग्रेस, वामपंथी दलों और वीसीके के समर्थन से सरकार बनाने वाले विजय ने 'वन्दे मातरम्' का कार्ड खेलकर अपनी छवि को एक 'अति-राष्ट्रवादी' नेता के तौर पर भी पेश किया है। इससे वे उन मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकते हैं जो बीजेपी की ओर झुकाव रखते थे। साथ ही, उन्होंने डीएमके और एआईएडीएमके के उस पारंपरिक द्रविड़ मॉडल को भी चुनौती दी है जो अक्सर भाषाई राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता रहा है।

निष्कर्ष: विजय ने न केवल शपथ ली है, बल्कि एक नई तरह की राजनीति का आगाज़ किया है। उन्होंने अपनी पहली ही गेंद पर 'वन्दे मातरम्' का छक्का मारकर यह बता दिया है कि 2026 के बाद की तमिलनाडु की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली है।

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