Challenges in 2023: पुरानी समस्याओं के साथ नए वर्ष की शुरुआत
देश के सामने ऐसी समस्याएं हैं जो बीते वर्ष में तो थी ही, आने वाले वर्ष पर भी अपना असर दिखाएगी। उसमें से कुछ पर गौर करना जरूरी है।

वर्ष 2022 की शुरुआत भारत के लिए अच्छी नहीं रही थी। 'कोरोना' का कहर तो था ही, उस पर जनवरी के पहले ही दिन वैष्णो देवी मंदिर के पास भगदड़ मची और कुछ यात्रियों की मौत हुई। जनवरी में ही प. बंगाल में एक रेल आघात भी हुआ और कुछ की मौत हो गई। ऐसी वारदातें दुखद होती है लेकिन उससे कुछ सीख लें तो उपयोग होता है।
भारत में बीती घटनाओं से कुछ सीखने की परंपरा नहीं है और यही एक बड़ी समस्या कही जा सकती है। देश में बिगड़ती कानून व्यवस्था एक समस्या है जो बढ़ती ही जा रही है। आये दिन खून, बलात्कार और आत्महत्या की खबरें आती रहती है जो भयावह समाज का चित्र रेखांकित करती है। 2022 वर्ष भी ऐसी घटना से भरपूर रहा। लेकिन ऐसी खबरों से हटकर देश के सामने और भी समस्याएं हैं जो बीते वर्ष में तो थी ही, आने वाले वर्ष पर भी अपना असर दिखाएगी। उसमें से कुछ पर गौर करना जरूरी है।
चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था
2019 से शुरू हुई कोरोना महामारी 2022 में खत्म होने की आशा थी और अप्रैल 2022 बाद ऐसा लग भी रहा था। सामान्य जीवन भी पटरी पर वापस आ रहा था, लेकिन दिसम्बर 2022 आते-आते इस महामारी ने डराना शुरू किया है। इस महामारी की बड़ी सीख तो यही है कि भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था उतनी भरोसे लायक नहीं है। आज का नगरीय जीवन आस-पास के डॉक्टर और अस्पताल पर निर्भर रहता है और एक विश्वास के साथ जीवन जीता है कि कोई घटना होने पर यह व्यवस्था मदद करेगी। लेकिन कोरोना महामारी ने व्यवस्था के ऊपर विश्वास पर ही सवाल खड़े कर दिये हैं। यह सही है कि स्वास्थ्य सुविधा की कमी को आसानी से दूर नहीं किया जा सकता। लेकिन इस व्यवस्था पर गंभीरता से सोचने और आवश्यक सुधार करने हेतु प्रयत्न जरूरी है। आशा है कि नए वर्ष में इस व्यवस्था को ठीक करने का संकल्प और प्रयत्न महत्वपूर्ण होंगे जो महामारियों की स्थिति में काम आयेंगे।
सुरक्षा व्यवस्था का सवाल
2022 वर्ष के शुरू में ही प्रधानमंत्री की सुरक्षा में ढील पाई गई और प्रधानमंत्री को एक फ़्लाइओवर पर काफी समय असुरक्षित ढंग से बिताना पड़ा। कुछ अनहोनी नहीं हुई लेकिन सुरक्षा की कमी सामने आ गई जो खतरनाक हो सकती थी। देश के सामान्य लोग तो हमेशा से ही असुरक्षित महसूस करते रहे हैं और यह बात पूरी कानून व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा करती है। राज्य को कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी दी गई है जो भी इस कमजोर होती व्यवस्था का एक कारण कहा जा सकता है। पुलिस व्यवस्था में सुधार और इससे जुड़े कई सवालों के ऊपर बहस की जरूरत है। न्यायपालिका की भूमिका भी इसमें बहस का मुद्दा हो सकता है। नए वर्ष में इस विषय पर बहस की शुरुआत और सुधार के प्रयत्न होना आवश्यक कहा जा सकता है।
घिनौनी राजनीति की समस्या
घिनौनी राजनीति की समस्या
भारत में धर्म को आधार बनाकर तोड़-फोड़ की राजनीति तो स्वतंत्रता के पहले से ही शुरू हो चुकी थी और देश को विभाजन झेलना पड़ा। लेकिन बाद में भी चुनावी राजनीति ने इसको आगे बढ़ाया और साथ ही यहाँ के बचे हुए बहुसंख्यक हिन्दू समाज को भी टुकड़ो में बांट कर छिन्न-भिन्न कर दिया। लोकतंत्र के नाम पर खानदानी सत्ता को स्थापित करने की कोशिश हुई जिसका असर यहाँ के अधिकांश राजकीय दलों पर हुआ जो आज कोई न कोई राजनीतिक खानदान बन गये हैं। चुनावी राजनीति ने एक विकृत धर्मनिरपेक्षता की बात कर यहां की एकात्मता को ठेस पहुंचाई और वोट-बैंक बनाकर सत्ता का किसी न किसी परिवार तक केन्द्रीकरण होने दिया। आज यह राजनीति एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। अब तो विरोधी दलों ने लोकतंत्र खतरे में है, कह कर हंगामा खड़ा कर रखा है और विपक्ष के नेता भारत विरोधी तत्वों और देशद्रोही तत्वों के साथ खड़े होते दिखते है, जो देश के हित में नहीं कहा जा सकता। भारतीय राजनीति चुनाव को ज्यादा अहमियत दे रही है और चुनाव जीतने के लिए किसी भी स्तर पर जाने को तैयार है। यह लोकतंत्र और भारत की सार्वभौमिकता को ही नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए नए वर्ष में इस समस्या का इलाज ढूंढना जरूरी माना जाना चाहिए।
आर्थिक क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियां
1990 के दशक से चली आ रही आर्थिक नीतियों से समाज के सभी वर्गों का लाभ नहीं हुआ है। उदारीकरण और निजीकरण की नीति पूंजीपतियों के लिए लाभदायक सिद्ध हुई है। यह नकारा नहीं जा सकता कि सरकार और शासन व्यवस्था की आर्थिक संतुलन बनाए रखने में एक अहम भूमिका है और वह सिर्फ आर्थिक संकट के समय में ही नहीं, साधारण समय में भी उपयोगी है। ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में तो सरकार को पहल करनी आवश्यक है क्योंकि निजी निवेश इस क्षेत्र में आता नहीं, यह ऐतिहासिक सत्य है। भारत को शासन व्यवस्था पर होने वाले खर्चे कम करके ही ऐसे निवेश के लिए संसाधन जुटाने होंगे। बढ़ता सब्सिडी खर्च और सरकारी खर्च भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा यह ध्यान में रखना आवश्यक है। नए वर्ष में सरकार अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करेगी ऐसी अपेक्षा की जा सकती है।
राज्यों और केंद्र में दूरी की समस्या
केंद्र और राज्यों के संबंधों में दरार अब स्पष्ट दिख रही है। जैसे-जैसे भारतीय नागरिक लोकतांत्रिक रूप से चेतन होता जा रहा है चुनावी नतीजे अलग-अलग आ रहे है। केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार का होना नामुमकिन सा होता जा रहा है। ऐसे समय में केंद्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकार एक आम बात होती जाएगी। ऐसे हालात में केंद्र सरकार की नीति का विरोध समझ आता है लेकिन कई राज्य केंद्र की सत्ता को ही चुनौती दे रहे हैं जो आने वाले वर्षों में एक गंभीर समस्या का रूप ले सकती है। अस्मिता और भाषा के आधार पर बने राज्यों का विघटनकारी रूप देश की एकता के लिए खतरा बन सकता है। नए वर्ष में इन संबंधों पर गंभीरता से सोचना होगा और समाधान निकालना होगा।
संस्कृति की सुरक्षा जरूरी
भारत अमृत वर्ष मना रहा है और आज़ादी के सौ वर्ष पूरे करने की ओर आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत की संस्कृति, जो कि परिवार और ग्राम व्यवस्था, कृषि और ग्रामोद्योग, मंदिरों, उत्सवों, तीर्थयात्राओं में तथा धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक सामंजस्यता में पली बढ़ी है, को बचाए रखने का और मजबूत करने का काम आने वाले वर्षों में प्रमुखता से करना होगा। यह सिर्फ राजनीतिक चुनावी यात्रा निकालने से नहीं होगा, न ही सिर्फ ऊपरी तौर पर आत्मनिर्भरता की बात करके होगा। यह करने के लिए राष्ट्रीय एकात्मता और ग्रामीण आत्मनिर्भरता की आर्थिक नीति को महत्व देना होगा। नए वर्ष में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था और सरकारों को यह बात समझ में आये तो नया वर्ष सुखमय होगा इसमें कोई शंका नहीं।
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