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मोदी 2.0: नई सरकार के सामने प्रचंड जनादेश की आकांक्षाओं पर खरा उतरने की होगी चुनौती

narendra modi

नई दिल्ली। एक बार फिर से नरेंद्र मोदी की ताजपोशी हो चुकी है। देश के लोगों ने एक बार फिर से मोदी में विश्वास दिखाया है। अपार बहुमत के रथ पर सवार नरेंद्र मोदी करिश्माई लग भी रहे हैं। कभी न रुकने, कभी न थकने और कभी न झुकने वाली उनकी छवि उनके करिश्माई व्यक्तित्व का आधार है। ऐसे में 'मैन इन एक्शन' इमेज वाले मोदी की प्राथमिकता इस अपार जनादेश के उम्मीदों पर खरा उतरने की होगी।

जनादेश मोदी सरकार से कैसी उम्मीद कर रही है?

जनादेश मोदी सरकार से कैसी उम्मीद कर रही है?

यूँ तो इस लोकसभा चुनाव 2019 में वही मुद्दे हावी रहे जिसे भजपा ने उछाला था। विपक्ष के मुद्दे इनके मुद्दों के सामने बैकफ़ुट पर ही रहे, जिसमें आम जन के सरोकार की बातें तुलनात्मक रूप से भाजपानीत गठबंधन से ज्यादा थीं। राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भाजपा ने स्ट्रेट छक्का लगाया है। चुनाव जीतने के लिए भले ही यह मुद्दा मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ हो लेकिन आने वाले दिनों में पाकिस्तान, जम्मू कश्मीर, राम मंदिर आदि मुद्दे के सहारे ही देश वांछित प्रगति नहीं कर पाएगी, यह सरकार भी समझती है और देश की जनता भी। हालांकि इन मुद्दों के सहारे भाजपा ने देश की जनता में जो आत्मगौरव का भाव नए दृष्टिकोण से जगाया है उसे समय समय पर इसकी खुराक मिले, जनता का एक बड़ा तबका ऐसा चाहता भी है और भाजपा इसमें माहिर भी है।

लेकिन इसके इतर आम आदमी, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की सहज उपलब्धि भी अपने तक सुनिश्चित चाहती है। रोजगार के अवसर आसानी से उन्हें उपलब्ध हों। महंगाई से उन्हें परेशान होना ना पड़े, शिक्षा का स्तर बेहतर हो। यानी कि आम जनता से सरोकार के जितने भी मुद्दे हैं जैसे कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जो सीधे उन्हें समझ आती हैं, उसमें उन्हें गुणात्मक और परिमाणात्मक सुधार चाहिए।

मोदी सरकार 2.0 की चुनौतियां क्या सिर्फ यही है?

मोदी सरकार 2.0 की चुनौतियां क्या सिर्फ यही है?

मोदी सरकार अब जब जीत के जश्न से निकलकर एक्शन मोड में आ गई है तो उन्हें जिन चुनौतियों का सबसे ज्यादा सामना करना होगा वह है देश के अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती। अपने पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार देश के आर्थिक मोर्चों पर कोई खास सफलता हासिल नहीं कर सकी है। नोटबन्दी और GST लागू करने के तरीकों की खामियों से देश की अर्थव्यवस्था 'स्लो डाउन' हुई है। हालांकि मोदी सरकार नें अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ कड़े कदम जरूर उठाए थे जैसे नया बैंकरप्सी कानून लाया गया जिससे बढ़ते NPA की समस्या से राहत मिले। सरकार ने रेड टेप घटाया जिससे भारत विश्व बैंक की व्यापार करने की सहूलियत वाली देशों की सूची में साल 2014 के 134वें स्थान से 77वें पायदान पर आ गया था।

लेकिन साल 2016 में कालेधन से निपटने के इरादे से देश में हुई नोटबन्दी से देश की अर्थव्यवस्था को धक्का लगा। इसे लागू करने के तरीकों से नए नोट बाज़ार में प्रचुरता से उपलब्ध थे नहीं और पुराने नोटों को वापस ले लिया गया था। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की गति धीमी हुई। देश में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ी। छोटे, मध्यम लोगों पर तो प्रभाव पड़ा ही इसके अलावे कई संस्थानों तक ने अपने कर्मचारियों की छंटनी कर दी थी। इसके बाद नई टैक्स नीति GST लाई गई और वह पहले से ही धीमी पड़ी अर्थव्यवस्था को और धीमा कर गई। इसके लागू होने के तौर तरीकों ने छोटे-मझोले व्यापारियों पर नकारात्मक प्रभाव डाला था।

इसके अलावा किसानों की समस्याओं का समाधान करना भी है। विगत सालों में भी किसानों के हालात नहीं सुधरे हैं। उनका प्रदर्शन सरकार के सामने बराबर होता ही रहा है।

मोदी सरकार 2.0 इन मसलों के ख़ात्मा के लिए क्या करेगी?

मोदी सरकार 2.0 इन मसलों के ख़ात्मा के लिए क्या करेगी?

फिलहाल तो इस सरकार के लिए चीजें मुश्किल जरुर हैं लेकिन इन सारे मुद्दों पर सरकार को एक साथ काम करना होगा। सरकार को जल्द ही ऐसे नीति बनानी होगी और उस पर अमल भी करना होगा जिससे इन सारे मसलों पर जल्द ही काबू पाया जा सके। इसके लिए सरकार को इस दिशा में कुछ नए और साहसिक कदम उठाने होंगे। साथ ही देश में बढ़ती बेरोजगारी दूर करने के लिए नए अवसर भी पैदा करने होंगे। इन सारे मुद्दों को साथ लेकर चलना इस सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है ताकि देश आगे बढ़ सके ठीक वैसे ही जैसे देश आगे बढ़ने की बात को उन्होंने अपने चुनावी स्लोगन में इस्तेमाल भी किया था।

जनता ने भाजपा को शानदार बहुमत देकर मोदी सरकार में विश्वास दिखाया है। मोदी वैसे भी अपने चौंकाने वाले फैसले के लिए जाने जाते हैं। तो ऐसा प्रचंड जनादेश देख कर हम उम्मीद कर सकते हैं कि अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी साहसिक क़दम उठा सकते हैं।

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