CBSE Results: अंकों की अंधी दौड़ के आगे दुनिया और भी है
जिन्होंने स्कूल, नगर, जिला या फिर देश प्रदेश के स्तर पर टॉप किया, उनको बधाई लेकिन जो नहीं कर पाये उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। अपनी रुचि और समझ के अनुसार वो अपने जीवन में इससे बेहतर और भी बहुत कुछ कर सकते हैं।

शुक्रवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा दसवीं एवं बारहवीं का परीक्षा-परिणाम घोषित कर दिया गया। बोर्ड-परीक्षाओं का परिणाम आते ही सोशल मीडिया से लेकर पास-पड़ोस तक कहीं बधाइयों का तांता लगा है तो कहीं अवसाद का सन्नाटा पसरा है। कोई ठहरकर यह सोचने को तैयार नहीं कि कोई भी परीक्षा ज़िंदगी की अंतिम परीक्षा नहीं होती और न ही किसी एक परीक्षा के परिणाम पर सब कुछ निर्भर ही करता है। जीवन अवसर देता है और बहुधा बार-बार देता है। अंततः ज्ञान और प्रतिभा ही मायने रखती है और इन्हीं पर जीवन की स्थाई सफलता-असफ़लता निर्भर किया करती है।
समाज में प्रायः ऐसे दृष्टांत देखने को मिलते हैं कि बोर्ड-परीक्षाओं में कम अंक लाने या प्रतियोगी परीक्षाओं में मिली प्रारंभिक विफलता के बाद भी धैर्य और निरंतरता के साथ किए गए परिश्रम और पुरुषार्थ अंततः फलदायी सिद्ध होते हैं। परंतु ऐसे तमाम दृष्टांतों के बावजूद बोर्ड एवं प्रतियोगी परीक्षाओं आदि के दबाव और तनाव में एक ओर गुम होता बचपन दिखाई देता है तो दूसरी ओर येन-केन-प्रकारेण पास होने और अधिक-से-अधिक अंक बटोरने का तीव्रतम उतावलापन भी दिखलाई पड़ता है।
सवाल है कि क्या कागज के एक प्रमाणपत्र भर से किसी के ज्ञान या व्यक्तित्व का समग्र मूल्यांकन किया जा सकता है? क्या किसी एक परीक्षा की सफलता-असफलता पर ही भविष्य की सारी सफलताएँ या योजनाएँ निर्भर किया करती हैं? जीवन की वास्तविक परीक्षाओं में ये परीक्षाएँ कितनी सहायक हैं? इन्हें जाने-विचारे बिना अंकों के पीछे बदहवास होकर दौड़ने की प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
अधिक प्राप्तांक को ही सफलता की एकमात्र कसौटी बनाने-मानने से सामाजिकता, संवेदनशीलता, सरोकारधर्मिता, रचनात्मकता जैसे गुणों या मूल्यों की कहीं कोई चर्चा ही नहीं होती। यदि किसी विद्यार्थी के प्राप्तांक प्रतिशत कम हैं, पर वह व्यावहारिक कसौटियों पर खरा उतरता हो तो क्या यह सब उसकी योग्यता का मापदंड नहीं होना चाहिए? क्या उसके संवाद-कौशल, नेतृत्व-क्षमता, सेवा एवं सहयोग की भावना, प्रकृति-परिवेश, स्वास्थ्य-स्वच्छता आदि के प्रति सजगता आदि का आकलन-रेखांकन नहीं किया जाना चाहिए।
पिछले सौ वर्षों की महानतम मानवीय उपलब्धियों पर यदि हम नज़र डालें तो मानवता को दिशा देने वाले, बड़े कारनामे करने वाले लोग, विद्यालयी परीक्षाओं में सर्वोच्च अंक लाने वाले लोग नहीं थे, बल्कि उनमें से कई तो तत्कालीन शिक्षण-तंत्र की दृष्टि में कमज़ोर या फिसड्डी थे। हाँ, समाज को लेकर उनका ज्ञान विशद और दृष्टिकोण व्यापक अवश्य था।
अंकों की अंधी दौड़ का हिस्सा बनने से उचित क्या यह नहीं होता कि हम इस पर गंभीर चिंतन और व्यापक विमर्श करते कि क्यों हमारे शिक्षण-संस्थान वैश्विक मानकों एवं गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते? क्यों हमारे शिक्षण-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में मौलिक शोध एवं वैज्ञानिक-व्यावहारिक दृष्टिकोण का अभाव दिखता होता है? क्यों हमारे शिक्षण-संस्थान नये प्रयोगों, पद्धतियों और विश्लेषणपरक प्रवृत्तियों को बढ़ावा नहीं देते? क्यों हमारे शिक्षण-संस्थानों से निकले अधिकांश विद्यार्थी आत्मनिर्भर और स्वावलंबी नहीं बन पाते? क्यों उनमें कार्यानुकूल दक्षता एवं कुशलता की कमी देखने को मिलती है? क्यों वे साहस और आत्मविश्वास के साथ जीवन की चुनौतियों, विषमताओं, प्रतिकूलताओं का सामना नहीं कर पाते?
अंकों की प्रतिस्पर्द्धा का ऐसा आत्मघाती दबाव दारुण और दुःखद है। इस दबाव में बच्चे सहयोगी बनने की अपेक्षा परस्पर प्रतिस्पर्द्धी बन रहे हैं। ऐसी अंधी प्रतिस्पर्द्धा कुछ के अहं को सेंक देकर उन्हें एकाकी और स्वार्थी बनाती है तो कुछ को अंतहीन कुंठा के गर्त्त में धकेलती है। और यह तथ्य है कि प्रतिस्पर्द्धा और ईर्ष्या में व्यक्ति प्रकृति में सर्वत्र व्याप्त सहयोग, सामंजस्य और सौंदर्य को विस्मृत कर बैठता है। फिर वह चराचर में फैले जीवन के गीत को गुनगुनाना, गाना और सुनना ही भूल जाता है। प्रतिस्पर्द्धा करते-करते वह अपने घर-परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति भी अक्सर प्रतिस्पर्द्धी-भाव रखने लगता है। कई बार तो वह अपनों के प्रति भी कटु और कृतघ्न हो उठता है।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि हम उसे बचपन से ही दूसरों को पछाड़ने की सीख दे रहे हैं? जबकि हमें साथ, सहयोग और सामंजस्य की सीख देनी चाहिए। 'जीवन एक संघर्ष है' उससे कहीं अधिक आवश्यक है, यह जानना-समझना कि जीवन 'विरुद्धों का सामंजस्य' तथा 'सहयोग व संतुलन' की सतत साधना है।
अंकों की गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा वाले इस दौर में सफलता के सब्ज़बाग दिखाते और सपने बेचते कुकुरमुत्ते की तरह उग आए ऑनलाइन और ऑफलाइन कोचिंग संस्थान कोढ़ में खाज़ का काम करते हैं। वे अभिभावकों से सफलता का सौदा करते हैं। सफल अभ्यर्थियों के चमकते-दमकते सितारा चेहरों और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए अतिरेकी दावों के पीछे वे तमाम विफल अभ्यर्थियों की अंतहीन सूची और उनका दर्द नहीं छिपा ले जाते हैं। सजे-चमचमाते कालीन के पीछे के काले-कड़वे सत्य को कौन देखे-दिखाये?
रातों-रात करोड़पति बनने या छा जाने की मानसिकता हमारी सोचने-समझने की सहज शक्ति को भी कुंद कर देती है। भ्रामक प्रचार-प्रसार या आक्रामक विज्ञापनों के जरिये भोले-भाले मासूमों और उनके अभिभावकों को बहलाया-फुसलाया जाता है। बल्कि कई बार तो बहुतेरे अभिभावक अपने बच्चों की रुचि एवं क्षमता का विचार किए बिना अपने सपनों व महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ जाने-अनजाने उनके कोमल-कमज़ोर कंधों पर डालने की भूल कर बैठते हैं। प्रायः बच्चे उनके सपनों व महत्त्वाकांक्षाओं का भार ढोते-ढोते अपना सहज-स्वाभाविक बचपन और जीवन तक भूल जाते हैं। वे कुछ और कर सकते थे। कुछ बेहतर बन सकते थे! लेकिन भेड़चाल के कारण उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं (जेईई, नीट, क्लेट, सीए आदि) की अंतहीन दौड़ एवं भीड़ में धकेल दिया जाता है।
यदि वे सफल हुए तो ठीक, पर कहीं जो वे विफल हुए तो जीवन भर वे उस विफलता की ग्लानि भरी मनोदशा से बाहर नहीं निकल पाते। फिर उनके होठों से सहज हास और जीवन से आंतरिक आनंद एवं उल्लास ग़ायब हो जाता है। समाज और संस्थाओं को सोचना होगा कि ये बच्चे या विद्यार्थी उत्पाद(प्रोडक्ट) न होकर जीते-जागते मनुष्य हैं। और मनुष्य का निर्माण स्नेह, समर्पण, सहयोग, समझ एवं संवेदनाओं से ही संभव है। इसलिए अपने संतान को अंकों की अंधी दौड़ में झोंकने की बजाय उनके समग्र, संतुलित एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान देना चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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