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CBI Action on FCI: एफसीआई अधिकारियों पर छापेमारी और टिकैत

छोटे किसानों से कैश में सस्ता गेंहू एवं धान लेकर बड़े आढ़ती एमएसपी पर एफसीआई को बेचकर मुनाफा कमा रहे थे। एफसीआइ अधिकारियों की मिलीभगत से उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों का घटिया गेंहू भी पंजाब व हरियाणा में एमएसपी पर खरीदा

CBI Action on FCI: Raids and tickets on FCI officials

शायद यह खबर आप के दिमाग से ओझल हो गई होगी कि इस हफ्ते सीबीआई ने फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के अफसरों और चावल मिल मालिकों के 50 ठिकानों पर छापे मारे थे। शायद यह खबर भी आपके दिमाग से आई गई हो गई होगी कि इसी हफ्ते राकेश टिकैत ने हरियाणा में भारत जोड़ो यात्रा कर रहे राहुल गांधी से मुलाक़ात की थी। आप के दिमाग में यह तो कतई नहीं आया होगा कि इन दोनों खबरों का आपस में कोई संबंध है। इन दोनों खबरों का 2020 के किसान आन्दोलन से भी सीधा संबंध है, यह तो आपने सोचा भी नहीं होगा।

तीनों कृषि कानूनों में से कोई भी क़ानून किसानों के खिलाफ नहीं था। तीनों में से दो क़ानून तो किसान को सिर्फ विकल्प देते थे (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और मंडियों से बाहर सौदा), तीसरा क़ानून भी किसानों के खिलाफ नहीं था, हालांकि वह कॉरपोरेट घरानों को जमाखोरी की छूट देने वाला था। तो किसान आन्दोलन की वजह क्या थी। कांग्रेस समेत विपक्ष के सभी दलों ने किसान आन्दोलन का समर्थन किया था। कम्युनिस्ट और शहरी नक्सली तो खुल कर खुद आन्दोलन में कूदे थे।

करीब सवा साल सरकार किसानों को समझाती रही, लेकिन जब सरकार उन्हें समझाने में नाकाम हो गई तो मोदी ने 19 नवंबर 21 को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया था। सरकार ने कृषि क़ानून वापस ले लिए थे, फिर भी आन्दोलन वापस नहीं हुआ था। पंजाब से शुरू हुआ आन्दोलन पश्चिमी यूपी के किसान नेता राकेश टिकैत के हाथ में आ गया था। कृषि क़ानून वापस होने के बाद अचानक एमएसपी को कानूनी दर्जा देने की मांग शुरू हो गई थी। भारत सरकार एमएसपी पर एफ़सीआई के माध्यम से 85 प्रतिशत गेहूं पंजाब और हरियाणा से खरीदती है। तो टिकैत क्यों एमएसपी को कानूनी दर्जा देने की मांग कर रहे थे।

CBI Action on FCI: Raids and tickets on FCI officials

किसान आन्दोलन के पीछे की कहानी और इस हफ्ते मारे गए छापों का आपस में गहरा संबंध है। यह बात मैंने किसान आन्दोलन के समय भी अपने लेखों में लिखी थी कि एफसीआई अधिकारियों से मिलीभगत कर आढ़त से हजारों करोड़ की कमाई करने वाले पंजाब के बड़े किसान, सभी दलों के नेता और अफसर आंदोलन की रीढ़ की हड्डी बने हुए थे। जो पंजाब के छोटे किसानों से एमएसपी से कम भाव पर गेहूं चावल ले कर सरकार को एमएसपी रेट पर बेचने का धंधा करते हैं। भाजपा, कांग्रेस, अकाली हर पार्टी का नेता इस लूट में शामिल था।

इन पार्टियों के नेताओं की पंजाब और हरियाणा में आढ़त की दूकानें हैं और इन्हीं की चावल निकालने वाली मिलें हैं। सच यह है कि भ्रष्ट अफसरों से इनकी मिलीभगत के चलते छोटे किसानों को कभी एमएसपी नहीं मिली। इन्हीं की मिलीभगत से उत्तर प्रदेश का घटिया क्वालिटी का गेहूं और चावल भी पंजाब हरियाणा के व्यापारी यूपी से खरीद कर पंजाब में एफसीआई को एमएसपी पर बेच देते थे।

एमएसपी का यह गौरखधंधा सिर्फ पंजाब हरियाणा में हो रहा था। एमएसपी का सर्वाधिक फायदा इन्हीं दोनों राज्यों को मिलता है। लेकिन यह फायदा किसानों को नहीं होता, बल्कि एफसीआई के अफसर, पंजाब हरियाणा के आढ़ती और चावल मिलों व शेलरों के मालिक आपस में मिल बांट कर लाभ उठा रहे थे। तीनों कानूनों से यह अंदेशा पैदा हो गया था कि सरकार धीरे धीरे एमएसपी खत्म कर देगी। इसी वजह से अफसरों, आढतियों और मिल मालिकों का गैंग घबराया हुआ था।

आन्दोलन के पीछे इसी गैंग का हाथ था, आन्दोलन को सारा फाईनेंस यही अपवित्र गठबंधन कर रहा था। राकेश टिकैत यूपी के साधारण किसान नहीं हैं। उनका सारा निम्न स्तर का गेहूं और धान पंजाब के आढतियों के माध्यम से एफसीआई को एमएसपी पर बेचा जा रहा था। दूसरी तरफ आढती पंजाब के छोटे किसानों से कम भाव पर कैश में गेहूं और धान खरीद कर एफसीआई को महंगे भाव में बेच देते थे।

एफसीआई के अफसरों की बड़े आढ़तियों और मिल मालिकों से सांठगांठ की मोदी सरकार को जानकारी थी, लेकिन मोदी सरकार में बैठे अफसर इस अपवित्र गठबंधन को तोड़ने के लिए कुछ नहीं कर रहे थे। मोदी एमएसपी की इस लूट को समाप्त कर उसका लाभ असली किसानों को दिलाना चाहते थे। इसीलिए छोटे किसानों को मंडियों से बाहर सौदा करने का विकल्प दिया गया था।

लेकिन जब आन्दोलन के चलते कृषि क़ानून वापस लिए गए तो मोदी सरकार ने दूसरा तरीका अपनाया। सरकार ने यह फैसला किया कि किसानों से एमएसपी पर खरीदी गई उसकी उपज का पैसा सीधे किसान के खाते में जाएगा। इससे उन आढतियों की कमर टूट गई जो यूपी से गेहूं और धान खरीद कर पंजाब में एफसीआई को बेच रहे थे।
पिछले सात आठ महीनों में एफसीआई के अफसरों, आढतियों और मिल मालिकों का धंधा पंजाब और हरियाणा के किसानों की लूट तक सीमित हो गया था। लेकिन सरकार को इसे भी बंद करना था, क्योंकि राशन की दूकानों से उपभोक्ताओं को बहुत ही घटिया किस्म का गेहूं और चावल मिल रहा था, जबकि बेहतर गेहूं और चावल मिल मालिकों को बेचा जा रहा था।

मई 2022 में इस संबंध में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। एफआईआर में एफसीआई के कार्यकारी निदेशक सुदीप सिंह सहित 74 लोगों और संस्थाओं को बुक किया गया था। जिसमें अधिकारियों, चावल मिल मालिकों और प्रक्रिया में शामिल बिचौलियों से जुड़े सिंडिकेट की पहचान करने के लिए छह महीने की अंडरकवर जांच की गई। चावल मिल मालिकों और बिचौलियों को खाद्यान्न की खरीद, भंडारण और वितरण में शामिल किया गया।

एफआईआर में नामित लोगों में से 34 कार्यरत अधिकारी हैं, जिनमें तकनीशियन से लेकर कार्यकारी निदेशक तक शामिल हैं, जबकि तीन सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। एफआईआर में सत्रह निजी व्यक्तियों और 20 संस्थाओं को भी नामित किया गया है। एफआईआर की छुटपुट जानकारी कहीं कहीं लीक हो रही थी, लेकिन पुष्टि किसी को नहीं हुई थी। किसान आन्दोलन के सभी अगुआ भी घबराए हुए थे।

मंगलवार 10 जनवरी को जैसे ही एफसीआई के एक उपमहाप्रबंधक राजीव मिश्रा को एक राइस शैलर के मालिक रविंदर सिंह खेड़ा से 50,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया, अगले दिन पंजाब हरियाणा और दिल्ली में अफसरों, चावल मिल मालिकों और आढतियों के यहाँ छापेमारी शुरू हो गई। सीबीआई पंजाब सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है क्योंकि वे भी 'बेनामी' गोदाम चला रहे थे, जिन्हें एफसीआई को आउटसोर्स किया गया था। आरोपी अधिकारियों ने टेंडर प्रक्रिया के दौरान साइलो संचालकों और राइस मिलर्स से रिश्वत ली।

अब सीबीअई के छापों से यह भी साबित हो रहा है कि किसान आन्दोलन को उस समय की कांग्रेसी पंजाब सरकार का समर्थन, विपक्ष का किसान आन्दोलन को समर्थन, टिकैत की भूमिका और भ्रष्ट एफसीआई के अधिकारियों के आढतियों, मिल मालिकों के अपवित्र गठजोड़, सभी का आपस में गहरा रिश्ता था। जिस का राजीव मिश्रा की गिरफ्तारी से भंडाफोड़ हो गया है।

छह महीने पहले दाखिल की गई एफआईआर के घेरे में कुछ किसान नेता भी आ सकते हैं, क्योंकि पकड़े गए आढती किसान आन्दोलन के पीछे इस गैंग की भूमिका का राज खोल सकते हैं। सरकार की इस कार्रवाई में आने वाले दिनों में राकेश टिकैत का नाम भी आ सकता है, इसलिए जो टिकैत न्योते के बावजूद उतर प्रदेश में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल नहीं हुए थे, वह मोदी के डर के मारे हरियाणा में जा कर यात्रा में शामिल हो गए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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