Data Privacy Bill: डिजिटल धोखाधड़ी से बचा पायेगा डेटा सुरक्षा का नया कानून?
Data Privacy Bill: आये दिन ऐसी खबरें आ रही हैं जब कहीं न कहीं कोई न कोई डिजिटल धोखाधड़ी का शिकार हो रहा है। बढ़ती आनलाइन ठगी और धोखाधड़ी को कारगर तरीके से रोकने के लिए केन्द्र सरकार संसद में एक महत्वपूर्ण विधेयक लेकर आयी है। हालांकि संसद के मौजूदा मानसून सत्र में हंगामों के बीच कई आवश्यक विधेयक अधर में लटके नज़र आ रहे हैं, इन्हीं विधेयकों में से वह 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2023 भी है जो संसद में शोर की भेंट चढ़ता नज़र आ रहा है। 27 जुलाई को चर्चा के लिए लाया गया यह विधेयक विपक्ष के संसद से वॉक आउट की भेंट चढ़ गया।
डिजिटल युग में इश्क की इबारतें भी सोशल मीडिया पर लिखी जा रही हैं। प्रेमी की तलाश में देश की सरहदों तक को लांघ दिया जा रहा है। लोन ऐप के ज़रिये लोन देकर परिवार को आत्महत्या तक के लिए विवश कर दिया जा रहा है। सेक्सटॉर्शन, गैस लाइटिंग, कैट फिशिंग जैसी घटनाएं मानसिक, आर्थिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुँचा रही हैं। ऐसे माहौल में इस विधेयक का पास होना कितना जरुरी है यह सरकार भी बखूबी समझ रही है।

पहली बार इस विधेयक को दिसंबर 2019 में पेश किया गया था, परंतु विभिन्न स्टेक होल्डर और एजेंसियों से सुझाव और आपत्तियां मिलने के बाद इसे वापस ले लिया गया था। सरकार ने पिछले नवंबर में नया मसौदा तैयार कर एक सार्वजनिक परामर्श शुरू किया था। जनता, 46 विभिन्न संगठनों और 38 सरकारी मंत्रालयों से प्राप्त सुझावों के आधार पर अब इसका खाका तैयार किया गया है।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक (DPDB) 2023, केंद्र द्वारा बनाए जा रहे प्रौद्योगिकी नियमों के व्यापक ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसमें डिजिटल इंडिया विधेयक, भारतीय दूरसंचार विधेयक, 2022 का मसौदा, और गैर-व्यक्तिगत डेटा प्रशासन के लिए एक नीति शामिल है। आगामी डिजिटल इंडिया बिल भारत के मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी अधिनियम) 2000 को प्रतिस्थापित करेगा।
यह नया कानून भारत के डिजिटल परिदृश्य पर व्यापक निगरानी स्थापित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह प्रस्तावित विधेयक इंटरनेट प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के नकारात्मक प्रभाव के बीच साइबर अपराध, डेटा सुरक्षा, डीपफेक, प्रतिस्पर्धा जैसी समकालीन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटता है।
संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के संगठन (यूएनसीटीएडी) के अनुसार, 194 देशों में से लगभग 137 देशों ने डेटा और गोपनीयता को सुरक्षित करने के लिए कानून बनाया है। अफ्रीका और एशिया में क्रमशः 61% (54 में से 33 देश) और 57% (60 में से 34 देश) ने इसे अपनाया है। वही केवल 48% अल्प विकसित देशों (46 में से 22) के पास डेटा सुरक्षा और गोपनीयता कानून हैं। ऐसे कानूनों की जरूरत वैश्विक स्तर पर तो है ही मगर व्यक्तिगत रूप से बहुत से अवांछनीय स्थितियों से बचने के लिए भी है।
बच्चों की साइबरबुलिंग, पहचान की चोरी, गैसलाइटिंग, डॉक्सिंग, प्रतिरूपण और कैटफ़िशिंग कुछ ऐसे ऑनलाइन अपराध हैं जिन्हें आगामी डिजिटल इंडिया बिल में दंडित किए जाने की संभावना है। विधेयक में इन सबको समाहित करने की जरूरत हम कुछ रिपोर्ट और सर्वे के आधार पर समझ सकते हैं। वैश्विक कंप्यूटर सुरक्षा फर्म 'मैक्एफ़ी कॉर्प' द्वारा 2022 में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में लगभग 85 प्रतिशत बच्चों ने साइबरबुलिंग का शिकार होने की सूचना दी है और यह दुनिया में सबसे अधिक है। 'साइबर बुलिंग इन प्लेन साइट' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट साइबरबुलिंग के संबंध में नये आंकड़ों को उजागर करती है जो 10 देशों के सर्वेक्षण पर आधारित है।
भारत में बच्चों के साइबर बुलिंग के तीन रूप हैं। पहला झूठी अफवाहें फैलाना (39%), दूसरा रूप है सोशल मीडिया पर बने समूहों से बच्चों को बाहर रखना पर स्कूल, सोसाइटी या अन्य स्थलों पर बच्चों की आपस में जान-पहचान का होना (35%), तीसरा, विभिन्न अशोभनीय नाम रखना और सोशल मीडिया पर प्रसारित करना (34%)। 'कैट फिशिंग' या 'डूपिंग' में सोशल मीडिया पर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की फोटो और जानकारी चुराकर अपना एकाउंट बनाता है। कई बार ऐसे छद्म अकॉउंट से पैसों की मांग और सेक्स चैट जैसी बातें कर व्यक्ति के चरित्र और सामाजिक प्रतिष्ठा का हनन किया जाता है। पीड़ित व्यक्ति समझ भी नहीं पाता कि कौन कैसे क्या कर रहा है।
ऐसे में इस विधेयक का उद्देश्य इंटरनेट कंपनियों, मोबाइल ऐप और व्यावसायिक घरानों जैसी संस्थाओं को "गोपनीयता के अधिकार" के हिस्से के रूप में नागरिकों के डेटा के संग्रह, भंडारण और प्रसंस्करण के बारे में अधिक जवाबदेह बनाना है। एक बार स्वीकृत होने के बाद, सार्वजनिक और निजी दोनों तरह की कई संस्थाओं को अपना डेटा एकत्र करने के लिए उपयोगकर्ताओं से सहमति लेने की आवश्यकता होगी। इसका मतलब यह है कि प्रत्येक उपभोक्ता की निजता के अधिकार को अधिक महत्व दिया जाएगा और उनका डेटा पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित किया जाएगा।
निजता व्यक्ति विशेष के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। जहाँ देश में निजी स्वतंत्रता मायने रखती है वही इंटरनेट के मकड़ जाल से स्वयं को सुरक्षित रखने की जवाबदेही भी व्यक्ति पर बनती है। 'डिजिटल नागरिक' की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है परंतु स्वयं को किसी संकट से बचाने की जवाबदेही हर उस व्यक्ति की भी है हो विभिन्न तरह के ऐप को उपयोग में ला रहा।
जिस लोन को मिलने की प्रक्रिया काफी जटिल है उसे कोई ऐप सरलता से देती है तो दिमाग की घंटी बजनी चाहिए। किसी से चैट करते समय हमे अपने निजी विवरणों या फोटोग्राफ को शेयर करने से भी बचना चाहिए। बच्चे बेहिचक इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं लेकिन उन पर परिवार वालों की कड़ी निगरानी जरुरी है। किसी भी ऐप को कांटैक्ट लिस्ट, कैमरा, मेसेज आदि के लिए परमिशन देने से पहले अपनी डिजिटल सुरक्षा को भी दिमाग में रखना जरूरी होता है। प्रस्तावित विधेयक जब पारित होगा तो वह हमारे साथ धोखाधड़ी हो जाने पर कानूनी मदद जरूर देगा लेकिन धोखाधड़ी न हो इसके उपाय तो हमें ही करने होंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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