बिहार में क्यों गरजा बुलडोजर?

रविवार, 3 जुलाई की सुबह पांच बजे लोग जगे भी नहीं थे कि पटना के नेपाली नगर में बुलडोजरों का आना शुरू हो गया। सैकड़ों पुलिसकर्मियों के साथ 22 बुलडोजरों ने आते ही घरों को तोड़ना शुरू कर दिया। नींद से जगे लोग पहले तो भौंचक रह गए, फिर विरोध करते हुए सड़क पर उतरे, लेकिन पुलिस ने लाठी भांजकर उन्हें भगा दिया। पत्थरबाजी शुरू हुई, जबाब में पुलिस ने आंसूगैस के गोले छोड़े। बड़ी संख्या में पुलिस बुला ली गई और जिलाधिकारी चंद्रशेखर सिंह समेत कई मजिस्ट्रेट पहुंच गए। कार्रवाई अगले दिन भी चलती रही।

bulldozers action on illegal construction in Bihar

सोमवार, 4 जुलाई को दोपहर बाद मामला हाइकोर्ट में पहुंचा, अदालत ने फौरन कार्रवाई रोकने का आदेश दिया। बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने रोक को 13 जुलाई तक बढ़ा दिया है। लोगों के बिजली-पानी के कनेक्शन बहाल करने और गिरफ्तार लोगों को तुरंत छोड़ने का आदेश भी दिया है।

असल में यह मामला 45 वर्ष पुराना है और हर दो-चार वर्ष पर जिंदा हो जाता है। बिहार राज्य आवास बोर्ड ने इलाके की 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण 1974 में किया था, पर जमीन पर कब्जा नहीं लिया। जमीन का मुआवजा तब 2300 रुपए प्रति कट्ठा तय हुआ। इसका भुगतान करने के लिए जिला प्रशासन को रकम दी गई, पर मुआवजा दर कम होने का आरोप लगाते हुए ढेर सारे किसानों ने मुआवजा की रकम नहीं उठाई। इसी क्रम में भू-माफिया की दखल शुरू हुई और किसानों से सीधे जमीन की खरीद-फरोख्त शुरु हो गई।

हाउसिंग समितियों ने किसानों को अधिक दर पर जमीन बिकवाने का झांसा दिया। तब पटना में जमीन-बिक्री के पंजीकरण पर रोक लगी थी, इसलिए लोगों ने कलकत्ता जाकर रजिस्ट्री करा दी। लेकिन मामला चलता रहा। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मामला गया। शहर की कीमती जमीन की खरीद-बिक्री करने वाले भू-माफिया और आवास बोर्ड के अफसरों की मिलीभगत में धंधा चलता रहा जिसमें शहर में बसने की अभिलाषा में भोले-भाले लोग फंस गए।

आवास बोर्ड, हाउसिंग सोसाइटी और गृहस्वामियों के बीच के इस विवाद को सुलझाने के लिए अदालत की पहल पर बीच का रास्ता निकाला गया। दीघा-आशियाना रोड के पूरब की जमीन पर बसे लोगों को जमीन बंदोबस्त कर देने और पश्चिम की जमीन खाली कराने के लिए कानून बना। तब सड़क के पश्चिम मकान नहीं बने थे। पूरब में करीब 624 एकड़ जमीन है जबकि सडक के पश्चिम 400 एकड़ जमीन है। पूरब के मुहल्ले का नाम राजीव नगर है तो पश्चिम में बसी बस्ती का नाम नेपाली नगर है। मौजूदा विवाद इसी 400 एकड़ जमीन को लेकर है। इसे खाली मानते हुए विभिन्न सरकारी विभागों को आवंटित कर दिया गया है। जबकि पिछले दस वर्षों में इस क्षेत्र में बड़े पैमाने जमीन की खरीब-बिक्री हुई है और बकायदा सड़कें बनी हैं, बिजली के पोल लगे हैं और नगर निगम मकान टैक्स वसूलता है। कई लोगों के आधार कार्ड इसी पते पर बने हैं।

दिलचस्प यह है कि कानून बनने के बाद और दीघा रोड के पूरब और पश्चिम की जमीन की स्थिति स्पष्ट करने के बाद भी आवास बोर्ड ने बाकी जमीन पर कब्जा नहीं किया और जमीन की खरीद-फरोख्त चलती रही। कभी आवास बोर्ड पुलिस व जिला प्रशासन को पत्र लिखता तो थोड़ी सख्ती होती, फिर सब कुछ सामान्य हो जाता और स्थानीय थाना की पुलिस की मिलीभगत से लगातार मकान बनते रहे। दलालों और भूमाफियाओं के मायाजाल में लोग फंसते रहे।

पुलिस की कार्रवाई के बाद अखबार वालों की छानबीन में पता चला कि इस 400 एकड में 30 प्रतिशत मकान पुलिस कर्मियों, 10 प्रतिशत नेताओं और 10 प्रतिशत भूमाफियाओं के हैं। बाकी पचास प्रतिशत में विभिन्न आयवर्ग के आम लोग है। पुलिस वालों में कुछ आईपीएस, कई इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर रैंक के पुलिसकर्मी हैं। इसके अलावा अनेक वकील, पत्रकार, विभिन्न स्तर के अधिकारियों के मकान भी इनमें हैं।

पटना के जिलाधिकारी चंद्रशेखर सिंह के अनुसार, शनिवार से सोमवार के बीच चली कार्रवाई में 40 एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया गया है जिसके लिए करीब 95 घर तोडे गए हैं। कार्रवाई का विरोध कर रहे दीघा कृषि भूमि-आवास बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष श्रीनाथ सिंह समेत 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, अभी ढाई सौ से अधिक मकानों पर ढहाने की कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा है। पता चला है कि इलाके की करीब 140 एकड़ जमीन को सरकार ने विभिन्न विभागों को आवंटित कर दिया है।

सोमवार को दोपहर बाद मामला पटना हाईकोर्ट में उठा। अदालत ने बुलडोजर की कार्रवाई पर रोक लगा दी और पटना के जिलाधिकारी व आवासबोर्ड के प्रबंध निदेशक को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया। अदालत को बताया गया था कि यह कार्रवाई उस कानून के अनुसार नहीं की गई है जिसे इस पूरे जमीन के विवाद को हल करने के लिए बनाया गया था। दीघा अधिग्रहित भूमि बंदोबस्ती कानून 2010 के अंतर्गत कानूनसम्मत ढंग से नोटिस नहीं दी गई। हालांकि प्रशासनिक सत्रों के अनुसार तीन बार नोटिस दिया गया। जिन लोगों ने नोटिस नहीं लिया, उनके घरों पर उसे चिपका दिया गया था। कार्रवाई अतिक्रमण विरोधी कानून के अंतर्गत अंचल अधिकारी के आदेश पर किया गया जो कानूनसम्मत नहीं है।

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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