Budget Expectations 2023: अमीर और गरीब के बीच संतुलन साध पायेंगी वित्त मंत्री?
महंगाई एक ऐसा अप्रत्यक्ष कर है जो सबकी जेब पर डाका डालता है। यदि वित्त मंत्री सरकारी घाटे को साध ले तो महंगाई, विकास दर और व्यापार घाटे को औसत स्तर पर लाने के रास्ते खुद ब खुद खुल जाएंगे।

Budget Expectations 2023: बजट निर्माण एक सालाना अनिवार्य प्रक्रिया है, पर यह किसी भी वित्तमंत्री के लिए हमेशा एक दुष्कर कार्य होता है। भारत जैसे देश में यह कार्य और ज्यादा मुश्किल है क्योंकि यहां असमानता की खाई बहुत बड़ी है। हाल ही में दावोस में वार्षिक बैठक से पूर्व ऑक्सफैम इंटरनेशनल द्वारा पेश असमानता रिपोर्ट "सर्वाइवल ऑफ रिचेस्ट" में कहा गया है कि भारत में मात्र एक फ़ीसदी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। यह आंकड़ा भी हैरत में डालने वाला है कि नीचे के 50 फ़ीसदी आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का सिर्फ 3% है।
घरेलू दिक्कतों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कारकों की तलवार भी हमेशा बजट के ऊपर लटकी रहती है, बल्कि कहना तो यह चाहिए कि सरकार के आय-व्यय का निर्धारण करने में अंतरराष्ट्रीय कारक भी अहम हो गए हैं। चूंकि वर्ष 2024 के आम चुनाव से पहले का पूर्ण बजट होने के कारण देश के सभी वर्ग के लोग बजट में राहत की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन लगता है कि एक बार फिर सरकार लोकलुभावन बजट करने से परहेज करेगी। सरकार चाहेगी कि ऐसा बजट पेश किया जाए जिसमें विकास गति में तेजी बरकरार रहे और आमजन को भी कोई परेशानी ना हो।
एक ही शब्द है जिससे आगामी बजट का स्वरूप और प्रवृतियां तय होनी है, वह ब्रह्म शब्द है 'सरकारी घाटा।' बजट की भाषा में इसे राजकोषीय घाटा कहते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार का व्यय उसकी आय से ज्यादा है। इस शब्द का मतलब तो सीधा है लेकिन इसके प्रभाव व्यापक और गहरे हैं। इस घाटे से महंगाई, ऊंची ब्याज दरें, मांग, निवेश, विकास दर, व्यापार घाटा आदि सब की स्थितियां और उनकी नियति तय होती है, जो देश के हर नागरिक के आय-व्यय को प्रभावित करता है।
सरकारी घाटे का मामला देश के लिए गले की हड्डी बना हुआ है। हालांकि केंद्र में भाजपानीत सरकार पिछले कई सालों से सरकारी घाटे को काबू में करने का प्रयास कर रही है और बहुत हद तक इसमें सफल भी हुई है। एक अनुमान के अनुसार चालू वित्त वर्ष में सरकार राजकोषीय घाटा को 6.4% के स्तर पर रखने के लक्ष्य को हासिल कर सकती है और अगले वित्त वर्ष में इसमें 0.58% की कमी लाने में सफल हो सकती है, क्योंकि चालू वित्त वर्ष में राजस्व संग्रह में उल्लेखनीय प्रगति आई है।
बता दें कि राजकोषीय घाटा कुल आय और व्यय का अंतर होता है, और जब सरकार आय से ज्यादा व्यय करती है तो घाटे को पाटने या उसमें कमी लाने के लिए उसे बाजार से कर्ज लेना पड़ता है। चालू वित्त वर्ष में राजस्व संग्रह की स्थिति पहले से बेहतर है लेकिन मौजूदा परिवेश में विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी बेरोजगारी, महंगाई, कोरोना महामारी की आशंका लगातार बनी हुई है।
फिर भी देश में कर संग्रह में लगातार हो रही वृद्धि से एक उम्मीद जगी है। सकल व्यक्तिगत आय संग्रह नवंबर तक 8.77 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि 10 नवंबर तक कॉरपोरेट सकल कर संग्रह 10.54 लाख करोड़ रुपए का हुआ जो पिछले साल की समान अवधि से लगभग 30% अधिक है।
एक अनुमान के अनुसार चालू वित्त वर्ष में सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष राजस्व संग्रह के बजटीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरा प्रयास कर रही है। लेकिन विनिवेश लक्ष्य को हासिल करना अभी दूर की कौड़ी लगता है। क्योंकि अब चालू वित्त वर्ष के समाप्त होने में महज 2 महीने की अवधि बची है और सरकार को अभी तक इस मोर्चे पर कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है।
सरकार के समक्ष आर्थिक मुश्किलें जरूर है लेकिन राजस्व संग्रह में तेजी बने रहने से सरकार पूंजीगत व्यय में वृद्धि करने के साथ-साथ विकासात्मक और कल्याणकारी दोनों मोर्चे पर आगामी वित्त वर्ष में काम कर सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार आम बजट के बाद करीब 35 से अधिक वस्तुओं की जीएसटी दर में सरकार वृद्धि करने वाली है। आर्थिक मामले की जानकारी रखने वालों का कहना भी है कि राजस्व संग्रह की मौजूदा गति को बरकरार रखने के लिए ऐसा कदम सरकार द्वारा जरूर उठाया जाना चाहिए।
इस क्रम में प्राइवेट जेट, हेलीकॉप्टर, महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, प्लास्टिक के सामान, ज्वेलरी, हाई क्लास पेपर, विटामिन आदि के जीएसटी दर में बढ़ोतरी की जा सकती है। सरकार वैसी वस्तुओं के आयात को भी कम करना चाहती है जिससे आयात के बिल में कमी आए और मेक इन इंडिया की संकल्पना को भी और अधिक बल मिले। ऐसे में कुछ वस्तुओं पर बजट में कस्टम ड्यूटी में इजाफा किया जा सकता है। ऐसा करने से दो फायदे होंगे, पहला देश का चालू खाता घाटा कम होगा और दूसरा मेक इन इंडिया पहल को मजबूती मिलेगी।
देश अर्थव्यवस्था के अनेक पहलुओं में कोरोना काल से पहले वाली अवस्था में अब धीरे-धीरे पहुंच रहा है। बावजूद बढ़ती महंगाई, वैश्विक स्तर पर राजनीतिक तनाव बने रहने के कारण सरकार के लिए जरूरी है कि वह संतुलित बजट पेश करे। अर्थात कल्याणकारी कार्यों पर खर्च करें, लेकिन फ्री की रेवड़ी बांटकर घाटा बढ़ाने से परहेज करें और विकासात्मक कार्यों को बढ़ावा दें।
देश में थोक और खुदरा महंगाई दर पिछले साल की तुलना में कम हुई है। लोगों को थोड़ी राहत मिली है। अब पेंशन में वृद्धि के साथ-साथ आयकर में राहत की भी लोगों को उम्मीद है। जरूरी वस्तुओं पर जीएसटी कम करने की भी चाहत उनके भीतर है। मेडिक्लेम नीतियां सकारात्मक बनाए जाने के लिए वे सरकार की ओर देख रहे हैं। निवेश योजनाओं पर ब्याज दर में वृद्धि की मांग भी करते रहे हैं।
मध्यवर्ग चाहता है कि आयकर और रोजमर्रा की वस्तुओं पर जीएसटी दर में कटौती की जाए। कारोबारी लालफीताशाही से मुक्ति चाहता है। किसानों की अपेक्षा है कि खेती किसानी को किसान के अनुकूल बनाया जाए ताकि उनका आर्थिक जीवन आसान बने और उनकी अगली पीढ़ी खेती किसानी के लिए प्रेरित हो।
ऐसे में यक्ष प्रश्न है कि क्या सरकार सभी की अपेक्षाओं को बजट में पूरा करने में समर्थ है? इसका सीधा उत्तर है कि सभी की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए सरकार का खजाना भरा हुआ होना चाहिए। देश का राजकोषीय घाटा कम से कम होना चाहिए।
उम्मीद की जानी चाहिए कि वित्त मंत्री कारोबारी माहौल को और अधिक सुगम बनाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की घोषणा कर सकती हैं। सरकार उर्वरक सब्सिडी में कटौती करने से बचेगी एवं खेती किसानी को और आसान बनाने वाले उपायों का ऐलान कर सकती है। मध्यवर्ग और बुजुर्गों को राहत देने की घोषणा भी वित्तमंत्री कर सकती है।
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बाहरहाल अब सबकी निगाहें एक फरवरी पर टिकी हुई है कि वित्त वर्ष 23-24 के आम बजट में सरकारी घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के लिए वित्त मंत्री क्या प्रावधान एवं उपाय करती हैं।
यह भी पढ़ें: Middle Class and Budget: बजट में अपनी जगह तलाशता मध्यवर्ग
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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