Middle Class and Budget: बजट में अपनी जगह तलाशता मध्यवर्ग
अपने आप को मध्य वर्ग का बताकर वित्तमंत्री निर्मला सीतारामन ने मध्य वर्ग के प्रति सहानुभूति दिखाने की कोशिश की है। तो क्या आगामी बजट में वित्तमंत्री मध्यवर्ग की मुसीबतों को कम करने का प्रयास करेंगी?

Middle Class and Budget: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बोलते हुए मध्यवर्ग की चिंताओं से अवगत होने की बात कही है। संघ के मुखपत्र पांचजन्य की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि "मैं भी मध्य वर्ग से ताल्लुक रखती हूं, इसलिए मैं मध्यवर्ग के दबावों को समझ सकती हूं। मैं खुद को मध्यवर्ग से ही पहचानती हूं, इसलिए मैं मध्यवर्ग के हर सुख दुख से परिचित हूं।"
वित्त मंत्री ने यह बोलकर आगामी बजट में मध्य वर्ग के लिए सकारात्मक संदेश तो दिया ही है, आसन्न चुनावों को देखते हुए इस वर्ग को साधने की भी कोशिश की है। विपक्षी दल वित्त मंत्री के बयान को राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के निगाह से प्रायः दूर रहने वाला मध्यवर्ग इतने से ही खुश है कि सरकार ने आखिर उनका हाल तो पूछा।
आजादी के बाद से ही देश में बजट पेश करने से पहले जाने-माने अर्थशास्त्रियों, भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की), कनफेडरेशन आफ इंडियन इंडस्ट्री, भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम), भारत चेंबर ऑफ कॉमर्स, नामचीन औद्योगिक और श्रमिक संगठनों, अमीर घरानों के साथ-साथ कामयाब चार्टर्ड अकाउंटेंट से बात करने की परंपरा रही है। लेकिन कभी किसी सरकार ने बजट को लेकर मध्यवर्ग से बात करना मुनासिब नहीं समझा। स्वभाव से किसी का वोट बैंक ना होने के कारण यह वर्ग देश के आर्थिक निर्णयों में लगभग उपेक्षित ही रहा है। सर्वदा से सत्ता के संतुलनकारों ने इसे अपने हाल पर छोड़ रखा है।
भारत का अर्थतंत्र मूल रूप से खपत पर आधारित है और हमारे देश में किसी भी उत्पाद की खपत का मूल आधार मध्यवर्ग ही है। स्वभाव से बहुत ही महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग हर नई चीज, हर नए ब्रांड को खरीदना चाहता है। फिलहाल यह वर्ग क्रय करने से कतरा रहा है, क्योंकि कोरोना वायरस ने देश की अर्थव्यवस्था को तो भारी चोट पहुंचाई ही है, मध्यवर्ग को भी तबाह करके रख दिया है।
कोरोना काल के बाद मध्य वर्ग के लाखों लोग नौकरियों से हाथ धो बैठे हैं वहीं बड़ी तादाद में लोगों के वेतन में भी कटौती हो गई है। इससे न सिर्फ मध्यवर्ग की क्रय शक्ति कमजोर हुई है बल्कि मध्य वर्ग की संख्या भी बहुत घट गई है।
वर्ष 1991 में जब नई आर्थिक नीति के तहत देश की अर्थव्यवस्था को आजादी दी गई और लाइसेंस राज्य का खात्मा किया गया। इसके कारण देश में भारी संख्या में विदेशी निवेश होने लगा। भारत के विशाल मध्यवर्ग को देखकर विदेशी कंपनियां अपने उत्पाद और सेवाएं बेचने के लिए आ पहुंची। जैसे जैसे देश की अर्थव्यवस्था बढ़ी, मध्यवर्ग की खरीदारी और उनकी संख्या में भी गुणात्मक वृद्धि हुई। मध्यवर्ग ने व्यापारियों को निराश नहीं किया। खूब जमकर खरीदारी की।
मध्यवर्ग की खरीदारी ने जीडीपी ग्रोथ को सहारा दिया और देखते ही देखते भारत को दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में बदल दिया।
लेकिन खाते कमाते लगभग 30 करोड़ की आबादी वाला मध्यवर्ग राहु केतु की जोड़ी सदृश्य नोटबंदी और जीएसटी की पेचीदगियों से बाहर निकलने के लिए अभी जूझ ही रहा था कि शनि समान आये कोरोना की आफत से पूरी तरह तबाह हो गया। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। वर्ष 2008 में आई वैश्विक मंदी से बचते हुए ऊंचाई की ओर जा रही हमारी अर्थव्यवस्था अचानक धड़ाम से नीचे गिर गई और वृद्धि दर माइनस में आ गई। लॉकडाउन के कारण छोटे कारोबारियों और उद्यमियों के कामकाज लगभग ठप से हो गए।
सरकार ने तब अपनी ओर से राहत के कई कदम उठाए। व्यापारियों के हित के लिए अनेक तरह की घोषणाएं की गई। अन्य वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त अनाज से लेकर नकद धनराशि की सहायता दी गई। सभी के लिए कुछ ना कुछ किया गया लेकिन मध्यवर्ग की सुध लेने वाला कोई नहीं था। सिर्फ इसलिए कि मध्यवर्ग किसी का वोट बैंक नहीं होता, इसलिए किसी भी सरकार ने इसके लिए कभी कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। किसी ने यह भी नहीं सोचा कि इस वर्ग के हाथ में अर्थव्यवस्था के विकास की कुंजी है, इसे तुरंत सहारा दिया जाना चाहिए। यह वर्ग संभलेगा तो देश की आर्थिक सेहत भी तंदुरुस्त रहेगी।
वर्ल्ड डाटा की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के मध्य वर्ग का देश की कुल खपत में 70% योगदान है, जबकि उसकी संख्या देश की कुल आबादी के एक तिहाई से भी कम है। पिछले बजट में सरकार ने टैक्स में राहत दी थी। आयकर की सीमा ढाई लाख रुपए से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दी थी, लेकिन लगे हाथों ढाई लाख रुपए ब्याज की रकम से ज्यादा निकालने वालों पर टैक्स लगाकर एक चोट भी पहुंचाई थी। यूलिप पर भी टैक्स का भार डाल दिया गया जिससे निवेशकों को धक्का लगा। कोरोना काल के बाद मध्य वर्ग का अस्पताल और इलाज का खर्च बढ़ गया। 18% जीएसटी लागू होने के कारण मेडिकल इंश्योरेंस भी महंगा हो गया है। मंहगे टैक्स के कारण लोग इंश्योरेंस कराने से हिचकने लगे हैं।
विडंबना पूर्ण है कि सरकार ने एक तरफ कम आय समूह के लोगों के लिए मुफ्त में 5 लाख रुपए तक के इलाज की व्यवस्था कर रखी है लेकिन मध्यवर्ग के इलाज के रास्ते में भारी टैक्स का प्रावधान कर स्वास्थ्य की राह में रोड़ा खड़ा किया है। इस देश में लगभग 16 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं। इनमें से ज्यादातर अपने बच्चों पर निर्भर हैं। ऐसे लोगों के लिए इंश्योरेंस एक महंगा सौदा है। इन लोगों को उपेक्षित छोड़ देना एक तरह से उनके साथ अन्याय ही है।
छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर बढ़ाकर सरकार ने कुछ सहायता करने का प्रयास किया है, लेकिन यह कम है। इसे और अधिक बढ़ाया जाना चाहिए, क्योंकि ब्याज दर बढ़ेगी तो लोग छोटे निवेश में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे। इससे बैंकों का निवेश भी बढ़ेगा और देश की आर्थिकी को भी लाभ पहुंचेगा। सरकारों ने कॉरपोरेट सेक्टर को हमेशा रियायत दी है। यही कारण है कि देश में अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसकी भी समीक्षा किए जाने की जरूरत है।
बहरहाल, प्राचीन भारतीय वैदिकी में मध्य को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। समाज विज्ञानी भी मध्य से ही ऊपर और नीचे को साधते रहे हैं। मध्य केंद्र की तरह होता है जो सबको साथ लेकर चलता है, लेकिन ऊपर-नीचे वाले अक्सर मध्य को विस्मृत कर देते हैं।
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ऐसे में वित्त मंत्री द्वारा मध्य वर्ग को लेकर की गई बातें न सिर्फ ढांढस बंधाती हैं, बल्कि उनमें आशा और उत्साह का संचार करती है। बजट में मध्य वर्ग को कुछ मिलेगा या नहीं मिलेगा इसकी उन्हें फिक्र नहीं है, उन्हें फक्र है कि सरकार ने उनका हाल तो पूछा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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