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अंग्रेजों की “चीता मारो नीति” ने भारत से गायब कर दिए चीते

आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 72वें जन्मदिन के मौके पर मध्य प्रदेश के कूनो वन्यजीव पार्क में 8 चीतों का स्वागत किया। ये चीते नामीबिया से भारत लाये गये हैं, जिसमें 5 नर और 3 मादा हैं। केन्द्र सरकार सिर्फ इन्हीं आठ चीतों तक सीमित नहीं रहेगी। 2021-22 के बजट में भारत में चीतों के पुनर्वास के लिए 38.70 करोड़ रूपये आवंटित किये गये थे जिसका उपयोग करके अगले तीन सालों में अफ्रीकी देशों से अभी और चीते भारत लाये जाएंगे और उन्हें देश के अलग अलग वन्यजीव पार्क में बसाया जाएगा। अगले महीने 12 चीतों का एक और बैच भारत पहुंचने की उम्मीद है। यह क्रम तब तक चलेगा जब तक देश में चीतों की जनसंख्या 40 तक नहीं पहुंच जाती।

British policy of hunting killed Indian Cheetahs

चीता के बारे में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वो 85 लाख साल पहले से धरती पर मौजूद हैं। इनकी बसावट मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और अरब इलाके में थी। लेकिन धरती पर बढते यूरोपीय व्यावसायिक सोच ने जैसे बाकी जानवरों के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर दिया वैसे ही चीतों के अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लग गया। अनुमाान है कि आज संसार में सिर्फ सिर्फ 8000 चीते बचे हैं जिसमें सबसे अधिक अफ्रीकी देशों में हैं।

भारत में चीता बहुतायत से गायब होने तक

किसी दौर में भारत में चीतों की बहुतायत थी। इनकी बसावट मुख्य रूप से राजस्थान और वर्तमान पंजाब और हरियाणा के आसपास होती थी। लेकिन इनके खत्म होने के दो प्रमुख कारण बने। पहला कारण था चीतों का अंधाधुंध शिकार और दूसरा चीता की मृत्युदर। चीता के बच्चे बहुत कम जिन्दा बच पाते हैं।

वन्यजीवशास्त्रियों का अनुमान है कि चीता के 100 में से सिर्फ 30 बच्चे बच पाते हैं। इसलिए बीते चार दशक में चीता संरक्षण कार्यक्रम के बाद भी अफ्रीकी देशों में इनकी जनसंख्या बढने की बजाय घटती जा रही है। वन्यजीव संरक्षण करनेवाली संस्थाओं का अनुमान है कि बीते चार दशक में ही ये 16 हजार से घटकर 8 हजार रह गये हैं।

भारत में चीतों के समाप्त होने का एक बड़ा कारण चीतों का शिकार रहा है। चीता एक ऐसा जानवर है जो मनुष्य के साथ घुल मिलकर पालतू बिल्ली जैसा बन जाता है। मुगल शासक अकबर ने अपने 55 साल के शासन में 9,000 चीतों को पकड़कर उन्हें पालतू बनाया था और शिकार के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता था। जहांगीर भी चीतों को पकड़कर पालतू बनाता था और उनका शिकार के लिए इस्तेमाल करता था। अबुल फजल लिखता है कि जहांगीर ने करीब 400 चीतों को तो पालम इलाके से पकड़ा था और उन्हें पालतू बनाया था। पालम वर्तमान में दिल्ली का हिस्सा है। उस समय तक चीता के शिकार का वैसा चलन नहीं था जैसा ब्रिटिश शासकों के भारत आने के बाद बन गया।

एक चीता मारने पर मिलता था 12 रूपये

ब्रिटिश शासकों के समय में चीता का शिकार फुर्ती और बहादुरी का काम समझा जाता था। चीता बहुत तेज दौड़ता है इसलिए उसका शिकार करनेवाले ब्रिटिश अधिकारी इससे अपनी चतुराई सिद्ध करते थे। ब्रिटिश अधिकारियों की देखा देखी भारतीय राजाओं महाराजाओं ने भी चीता का शिकार करना शुरु कर दिया।

पंजाब का बठिंडा, हरियाणा का हिसार, राजस्थान का झुंझनू और जोधपुर में बड़ी संख्या में चीता मिलते थे। इन इलाकों में चीतों की बड़ी संख्या को देखते हुए यहां इनके शिकार पर कोई रोक टोक नहीं होती थी बल्कि इन्हे मारनेवालों को सम्मान से देखा जाता था। इसका कारण संभवत: ये था कि इससे स्थानीय निवासियों के जानवरों की सुरक्षा हो जाती थी।

ब्रिटिश काल में 1871 के बाद से ही चीता मारने पर पुरस्कार दिया जाता था। किसी बच्चा चीता को मारने पर 6 रूपये और वयस्क चीता को मारने पर ब्रिटिश हुकूमत 12 रूपये का नकद पुरस्कार देती थी। ब्रिटिश शासकों द्वारा चीता सफाई अभियान का कारण उनका व्यवसायिक हित था। उन्होंने देश में व्यापक स्तर पर जंगलों का कटान किया। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया और खेती योग्य नयी जमीन तैयार की। ऐसे में जहां शेर, बाघ या चीता का खतरा होता था ब्रिटिश शासक उसका शिकार करवाते थे।

ब्रिटिश लोगों की देखा देखी भारतीय राजाओं महाराजाओं ने शेर, बाघ और चीता का शिकार शुरु कर दिया। इसमें महाराजा कोल्हापुर और महाराजा भावनगर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हालांकि महाराजा भावनगर और कोल्हापुर ने 1918 से 1939 के बीच अफ्रीका से 32 चीता आयात करवाकर उन्हें जंगलों में छोड़ा था। ऐसा कहा जाता है कि चीता का आखिरी शिकार वर्तमान छत्तीसगढ में कोरिया के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह ने किया था। रामानुज प्रताप सिंह ने एक साथ तीन चीतों का शिकार किया था, इसके बाद जंगलों में फिर कभी चीता दिखाई नहीं दिया।

सरकार ने की चीता की चिंता

हालांकि भारत में चीता कभी समाप्त नहीं हुए और ब्रिटिश राज से आजादी के बाद चीता को अफ्रीका से आयात करके उन्हें भारतीय चिड़ियाघरों में रखा जाता था। 1949 से 1989 के बीच भारत के अलग अलग 7 चिड़ियाघरों में 25 चीता मौजूद थे। 2009 में केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वाइल्डलाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया के साथ मिलकर भारत में चीता को पुन: बसाने की योजना तैयार की थी और इसके लिए कूनो नेशनल पार्क का चुनाव किया था।

लेकिन 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दिया और कहा कि कूनो नेशनल पार्क एशियाई शेरों के लिए उपयुक्त है इसलिए उसी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन गुजरात के वन्यजीव विभाग ने शेर को गीर से बाहर ले जाने पर सहमति नहीं दी। इसके बाद 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए अनुमति दे दी कि अफ्रीकी चीता को अगर कूनो नेशनल पार्क में बसाना है तो यह काम बहुत सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की सहमति मिलने के बाद केन्द्र सरकार ने इंडियन ऑयल के सीएसआर फंड की मदद से आज कूनो नेशवल पार्क में आठ अफ्रीकी चीतों को पहुंचा दिया है।

हालांकि वन्यजीवशास्त्रीयों का इस पर मतभेद बना हुआ है। कुछ का कहना है कि अफ्रीकी चीता को भारतीय वातावरण में पालने की कोशिश का कोई लाभ नहीं होगा और उनका यहां के वातावरण में बढना मुश्किल है जबकि कुछ वन्यजीवशास्त्री मानते हैं कि अफ्रीकी और एशियाई चीतों में किसी प्रकार का आनुवांशिक भेद नहीं है इसलिए वो यहां फल फूल सकते हैं।

बहरहाल अब ये तो समय बतायेगा कि अफ्रीकी चीता भारतीय वातावरण में कितना फलता फूलता है, लेकिन लगभग 100 साल बाद भारत के जंगल फुर्तीले चीता से आबाद तो हो ही गए हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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