भ्रष्टाचार और जमीन जिहाद का जरिया बने वक्फ बोर्ड
तमिलनाडु के त्रिची जिले के तिरुचेंथुरई गाँव के राजगोपाल की जमीन उनकी नहीं बल्कि तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की संपत्ति है, यह दावा है बोर्ड का। यही नहीं, पूरे गाँव की जमीन को वक्फ बोर्ड ने अपनी मिल्कियत बता दिया है। आश्चर्य तो इस बात है कि इसी गाँव में 1500 वर्ष से अधिक पुराने मंदिर की जमीन को भी वक्फ अपनी बता रहा है जबकि इस्लाम का प्रादुर्भाव ही 1400 वर्ष पूर्व हुआ है।

तिरुचेंथुरई गाँव की 95 प्रतिशत आबादी हिन्दू बाहुल्य है बावजूद इसके गाँव और इसके आसपास की लगभग 370 एकड़ जमीन पर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने अवैध कब्जा कर लिया है। त्रिची जिले में ही ऐसे आधा दर्जन गाँव हैं जिनकी जमीन पर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने अपना हक जता दिया है। इसमें एक प्रश्न यह उठता है कि तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के पास आखिर यह अधिकार कहाँ से आया कि वह पूरे गाँव की जमीन को अपना बता दे? आखिर कौन से प्रावधान वक्फ को इतनी असीमित शक्तियां दे रहे हैं कि वह निरंकुश हो गया है?
वक्फ बोर्ड क्या है और किसे कहते हैं वक्फ संपत्ति
वक्फ उन संपत्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के नाम पर धार्मिक और चैरिटेबल कार्यों के लिए दान में दे दी जाती हैं। यदि कानूनी नजरिए से देखें तो कोई व्यक्ति अपनी चल-अचल संपत्ति अपनी मर्जी से इस्लाम के कार्य में लगाने के लिए दान करता है तो उसे वक्फ पुकारा जाता है। वक्फ का निर्माण डीड के जरिए भी किया जाता है। यानि किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित किया जा सकता है। किन्तु ऐसा तभी किया जा सकता है जब उक्त संपत्ति का उपयोग लंबे समय के लिए इस्लाम से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों या चैरिटी के लिये किया जा रहा हो।
वक्फ बोर्ड एक कानूनी निकाय है जिसका गठन 1964 में भारत सरकार ने वक्फ कानून, 1954 के तहत किया था। बोर्ड के पास वक्फ की संपत्ति के अधिग्रहण, उसे अपने पास रखने या उसके हस्तांतरण का अधिकार होता है। यह न्यायिक व्यवस्था के तहत गठित कानूनी बोर्ड है अतः यह किसी व्यक्ति पर मुकदमा चला सकता है अथवा न्यायालय में मुकदमे का सामना कर सकता है।
वक्फ बोर्ड के पास एक अधिकार यह भी है कि वह अपनी संपत्ति का अपने हिसाब से उपयोग कर सकता है। वह अतिक्रमण हो चुकी संपत्ति को पुनः हासिल करने का हक रखता है। वह अपनी संपत्ति बेच सकता है, उसे लीज पर दे सकता है या किसी को गिफ्ट भी कर सकता है लेकिन इसके लिए उसे बोर्ड के दो से तीन सदस्यों की मंजूरी लेना आवश्यक होगी।
वर्तमान में भारत में एक केंद्रीय वक्फ बोर्ड (अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधीन) और 32 राज्य वक्फ बोर्ड हैं जिन्हें रेगुलेट करने के लिए वक्फ बोर्ड एक्ट 1995 है जो पी.वी. नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री काल में लागू किया गया था। तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने जो जमीनी कारस्तानी की है वह दरअसल वक्फ बोर्ड एक्ट 1995 के कड़े प्रावधानों व असीमित शक्तियों के कारण की है।
आठ लाख एकड़ जमीन का मालिक है वक्फ बोर्ड
वर्तमान में सभी वक्फ बोर्ड के पास कुल 08 लाख 54 हजार 509 संपत्तियां हैं जो आठ लाख एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैली हैं। वहीं एक अनुमान के मुताबिक, लगभग 2 लाख संपत्तियों पर वक्फ का अवैध कब्जा है। भारतीय सेना के पास करीब 18 लाख एकड़ जमीन पर संपत्तियां हैं जबकि रेलवे की चल-अचल संपत्तियां करीब 12 लाख एकड़ में फैली हैं। यानी सेना और रेलवे के बाद वक्फ के पास तीसरी सबसे अधिक संपत्तियां हैं।
वक्फ की संपत्तियां दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं जबकि देश में बंटवारे के बाद जमीन उतनी की उतनी ही है। देखा जाये तो यह सीधा-सीधा जमीन अतिक्रमण का मामला है। देश में जहाँ भी कब्रिस्तान की चारदीवारी होती है वहां आसपास की बड़ी जमीन पर वक्फ निर्माण कार्य करवाकर उसे अपनी संपत्ति घोषित कर देता है। फिर देश भर में अवैध मजार और मस्जिदों को भी बोर्ड अपनी संपत्ति घोषित करता है जिससे इन्हें भी कानूनी मान्यता प्राप्त हो जाती है।
वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार
इसके अलावा वक्फ की सबसे बड़ी ताकत है वक्फ एक्ट 1995 का सेक्शन 3 जिसके अंतर्गत यह प्रावधान है कि यदि वक्फ सोचता है कि जमीन किसी मुस्लिम से संबंधित है तो वह वक्फ की संपत्ति है। यदि वक्फ ने यह मान लिया कि आपकी संपत्ति, आपकी नहीं बल्कि वक्फ बोर्ड की है तो फिर आप न्यायालय भी नहीं जा सकते। आपको अपनी जमीन वापस पाने के लिये वक्फ के ट्रिब्यूनल जाना होगा।
इसी वक्फ एक्ट के सेक्शन 85 के अनुसार यदि वक्फ बोर्ड ट्रिब्यूनल आपके उत्तर से संतुष्ट नहीं है तो आपको जमीन खाली करना ही होगी क्योंकि एक्ट के हिसाब से ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम होगा और कोई सिविल कोर्ट वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को बदल नहीं सकेगी।
इसी वक्फ एक्ट के सेक्शन 40 के तहत जब वक्फ बोर्ड किसी की जमीन पर दावा करता है तो जमीन पर दावा सिद्ध करने की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड की नहीं होती है बल्कि जमीन के असली मालिक को अपनी जमीन पर मालिकाना हक साबित करना होता है।
ऐसे वक्फ कानून को खत्म करने की मांग वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में 19 सितम्बर को सुनवाई होगी। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि पूरी दुनिया में भारत ही एकमात्र देश है जहाँ वक्फ जैसा कानून और बोर्ड है। यहाँ तक कि मुस्लिम राष्ट्रों में भी वक्फ नामक कोई बोर्ड, एक्ट या कानूनी प्रावधान नहीं है।
वक्फ बोर्ड का जमीन जिहाद
मुस्लिम तुष्टिकरण की आड़ में कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों ने वक्फ बोर्ड को इतने असीमित अधिकार दे दिये हैं कि वे अब जमीन जिहाद से भी बाज नहीं आ रहे। इन जमीनी सौदों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार भी किया जा रहा है। विभिन्न राज्यों के वक्फ बोर्डों के पास अरबों की संपत्ति है जो जाहिर तौर पर कब्जे और भ्रष्टाचार से बनाई गई है।
2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने शिया-सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड पर करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप की जांच हेतु प्रयागराज में मुकदमा दर्ज करवाया था। इसी प्रकार का एक मुकदमा 2017 में लखनऊ में भी दर्ज हुआ है। एंटी करप्शन डिपार्टमेंट ने जनवरी 2020 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत दिल्ली के ओखला से विधायक और दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमेन अमानतुल्लाह खान पर केस दर्ज किया था।
अमानतुल्लाह खान पर वक्फ बोर्ड के बैंक खातों में वित्तीय गड़बड़ी, वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में किरायेदारी का निर्माण, वाहनों की खरीद में भ्रष्टाचार और दिल्ली वक्फ बोर्ड में सेवा नियमों में उल्लंघन करते हुए 33 लोगों की अवैध नियुक्ति करवाने के आरोप हैं। इन्हीं मामलों के चलते केंद्र सरकार ने वक्फ की सभी संपत्तियों को डिजिटल रूप में लाने तथा उनके रिकॉर्ड को ऑनलाइन करने की प्रक्रिया शुरू की है।
अवैध कब्जे और भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामले तो इसी कारण सामने आ पाये हैं जिन पर जांच बिठाई गई है। केंद्र सरकार ने सच्चर समिति की उस रिपोर्ट को भी मान लिया है जिसमें यह कहा गया था कि वक्फ की संपत्तियों का व्यवसायिक उपयोग किये जाने से इन्हें माफियाओं के चंगुल से बचाया जा सकेगा और उनसे अर्जित धन को मुस्लिम कल्याण की योजनाओं में खर्च किया जायेगा।
हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने सरकार की पहल पर तेजी दिखाते हुये संपत्तियों को चिन्हित भी कर लिया है। अब देखना यह है कि गैर-भाजपा शासित राज्यों में इस पहल के क्या परिणाम होते हैं? फिलहाल तो तमिलनाडु वक्फ बोर्ड का मामला इन प्रावधानों के काले पक्ष को उजागर करते हुये इन्हें समाप्त करने की आवश्यकता पर बल देता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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