BJP and RLD: जयंत को साथ लाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजेय होना चाहती है भाजपा
मायावती के इंडिया गठबंधन में शामिल होने से मना करने के बाद अब मोदी और शाह की योजना जयंत चौधरी को अपनी ओर करने की है। ऐसा वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी 14 सीटों को जीतने के लिए करना चाहते हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना महत्व रखता है इसको इस बात से समझा जा सकता है कि 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के ठीक तीन बाद 25 जनवरी को मोदी ने कल्याण सिंह की कर्मभूमि रही बुलंदशहर में रैली की।

मोदी ने इस रैली में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को याद किया और कई बार राम मंदिर आंदोलन में उनके योगदान और राम मंदिर का जिक्र किया। मोदी ने अपने भाषण को विकास से ज्यादा राम पर केन्द्रित किया। मोदी उत्तर प्रदेश की इस भूमि से हिन्दुत्व का संदेश देकर गए।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार अभियान की शुरूआत भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से की थी। वो 2014 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगो का जिक्र कर हिन्दुओं को जागृत होने का संदेश दे गए थे। 2014 में मोदी के संदेश का असर ऐसा हुआ था कि भारतीय जनता पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी 14 सीटें जीत गई थी। लेकिन 2019 के आम चुनाव में इसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने भाजपा को तगड़ा झटका दिया था जब इस क्षेत्र से भाजपा 7 सीटें हार गयी थी। से सीटें थीं, बिजनौर, सरहानपुर, अमरोहा, नगीना, संभल, मुरादाबाद और रामपुर।
2019 में बसपा, सपा और जयंत चौधरी की आरएलडी ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। बहुजन समाज पार्टी ने बिजनौर, सहारनपुर, अमरोहा और नगीना सीट जीती थी, वहीं समाजवादी पार्टी ने संभल, मुरादाबाद और रामपुर सीट जीती थी।
भारतीय जनता पार्टी गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बुलंदशहर और कैराना लोकसभा सीट जीती थी। इसीलिए इस बार भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र में हिन्दुत्व को आगे रखकर अपनी चुनावी रणनीति का तानाबाना बुन रही है।
25 जनवरी को बुलंदशहर में मोदी की रैली के दौरान जनता के जय श्री राम का नारा लगाने पर मोदी का मंद मंद मुस्कराना और नारों के बीच कुछ सेंकड के लिए अपना भाषण रोक देना इस बात को बताने के लिए काफी था कि इस बार राम मंदिर का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हो रहा है जो मोदी के लिए संतोष की बात है।
किसान आंदोलन से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे इस क्षेत्र में संगठन को चुस्त दुरूस्त करने के लिए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पिछले साल जून में कार्यकर्ताओं के साथ टिफिन बैठक कर संगठन को सक्रिय कर दिया था। वहीं 2019 में हारी 7 सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व संगठन महामंत्री सुनील बंसल को इन हारी हुई 7 सीटों का प्रभारी बनाया गया है।
इन हारी हुई सीटों पर मोदी सरकार के एक केन्द्रीय मंत्री को क्षेत्र में लगातार भेजकर संवाद से समर्थन कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसके अलावा इन सीटों पर राज्यसभा सांसदों को 'विकसित भारत संकल्प यात्रा' की जिम्मेदारी सौंपकर मोदी की योजनाओं को घर घर तक पहुचाने के काम पर लगाया गया है।
पश्चिमी उत्तर पद्रेश के जाट मतदाताओं को भाजपा कितनी गंभीरता से ले रही है, इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार भाजपा ने किसी जाट भूपेन्द्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपकर जाटों को संदेश देने की कोशिश की है। फिर भी पश्चिमी यूपी में जातिगत समीकरण साधना भाजपा के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है।
पश्चिमी यूपी में दरकते जाट वोट को साधने के लिए मोदी और शाह हर संभव कोशिश कर रहे है। जयंत चौधरी के अखिलेश के साथ गठबंधन होने के बाद भी अमित शाह इस कोशिश में जुटे हैं कि जयंत को सम्मानजनक स्थान देकर एनडीए में लाया जाए। खबर है कि अमित शाह खुद जयंत से दो बार बात कर चुके हैं। मोदी ओर शाह की जोड़ी जानती है कि उत्तर प्रदेश में मायावती के अखिलेश से अलग होने के बाद अब यदि जयंत चौधरी को भी अखिलेश से अलग कर दिया जाता है तो पश्चिमी यूपी की सभी 14 सीटें जीतने में भाजपा की राह आसान हो जाएगी।
2019 के चुनाव में जयंत चौधरी की आरएलडी सपा के साथ गठबंधन में मुजफ्फरनगर, बागपत और मथुरा सीट पर लड़ी थी और तीनों सीटों पर हार गई थी। हालांकि बाद में जयंत चौधरी अखिलेश यादव के सहयोग से राज्यसभा भेजे गए थे। अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को सात सीटें देने की घोषणा की है लेकिन जयंत चौधरी राम मंदिर का असर भी जमीनी स्तर पर महसूस कर रहे हैं।
जयंत चौधरी जानते हैं कि मायावती के अलग होने के बाद सिर्फ सपा उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकती है। जयंत चौधरी पर 2022 में उनके जीते हुए आठ विधायक भी इस बात का दबाव बना रहे हैं कि जयंत भाजपा से गठबंधन की राह तलाशें जिससे उत्तर प्रदेश की सरकार और केन्द्र की सरकार में कुछ हिस्सा आरएलडी को मिल सके।
अगर जयंत चौधरी एनडीए में चले जाते हैं तो भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश की 77 सीटें जीतने के अपने लक्ष्य के करीब पहुच जाएगी। जबकि समाजवादी पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मुस्लिम गठजोड़ के भरोसे है। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान खासतौर पर पश्चिमी यूपी के मुसलमानों को अखिलेश के साथ एकजुट करने में जुटे हैं। ऐेसे में जयंत चौधरी सपा का साथ छोड़ते हैं तो अखिलेश यादव के जाट मुस्लिम गठजोड़ की कोशिश का धराशाही होना तय है।
लोकसभा से इतर अगर विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2022 में पश्चिमी यूपी की 71 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 41 सीटें जीती थी। समाजवादी पार्टी ने 22 और राष्ट्रीय लोकदल ने 8 सीटें जीती थी। बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। 2022 के विधानसभा चुनाव में 17 जाट विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे थे, जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में 14 जाट विधायक विधानसभा पहुंचे थे। उस समय 13 जाट विधायक भारतीय जनता पार्टी से थे और एक आरएलडी से था।
इसलिए इतना तो कहा ही जा सकता है कि जमीनी स्तर पर पश्चिमी यूपी में भाजपा दूसरे दलों से अधिक मजबूत स्थिति में है। लेकिन अब जयंत चौधरी को साथ लाकर वह अजेय होना चाहती है। जयंत चौधरी भाजपा के साथ आते हैं या सपा के साथ रहते हैं, यह आने वाले कुछ दिनों में तय होगा लेकिन यह तय है कि उत्तर प्रदेश की असली लड़ाई पश्चिमी यूपी में देखने को मिलेगी जहां भाजपा मोदी के काम से ज्यादा राम के नाम और जातिगत समीकरणों पर दांव चलेगी।
यहां भाजपा मोदी मैजिक पर निर्भर है और मोदी राम के नाम पर निर्भर हैं। ऐसे में इस बार लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लड़ाई दिलचस्प होने वाली है इसमें काई दो राय नहीं।
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