Rajasthan BJP: राजस्थान में भाजपा को राजपूतों का ही सहारा

मरुधरा के रण में होने वाले विधानसभा के चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी प्रदेश की पुरानी परंपरा को तोड़ने की हर कोशिश में जुटी है, वहीं भाजपा राज्य की 200 विधानसभा सीटों में 150 प्लस का लक्ष्य निर्धारित कर दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए करो या मरो की स्थिति पैदा किए हुए हैं। आधिकाधिक सीट हासिल करने की गरज से टिकट बंटवारे में जातियों में भी उप-जातियों तक के समीकरण देखे जा रहे हैं, लेकिन विशेष रूप से दोनों दलों की नजर राजपूत मतदाताओं को अपने पाले में खींचने पर लगी हुई है।

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राजपूत समुदाय को टिकट देने के मामले में भारतीय जनता पार्टी आगे है। अब तक जारी सूची में लगभग 10% टिकट राजपूतों को देने की घोषणा की है जबकि कांग्रेस ने इस बिरादरी को अभी तक केवल पांच प्रतिशत टिकट ही दिए हैं। हालांकि अगली सूची में इसके कुछ और बढ़ने की संभावना है।

वर्ष 2013 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 29 राजपूतों को टिकट दिया था जिसमें 24 जीत कर विधायक बने थे, जबकि कांग्रेस पार्टी ने 15 टिकट दिए और जीते केवल दो ही थे। लेकिन पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को क्षत्रियों की नाराजगी का खामियाजा उठाना पड़ा था। साल 2018 के चुनाव में भाजपा ने 26 राजपूतों को टिकट दिया जिनमें से केवल 10 ने जीत दर्ज की वहीं कांग्रेस ने राजपूत समुदाय के 15 उम्मीदवारों को टिकट दिया इनमें से सात ने जीत का परचम लहराया था।

बाड़मेर लोकसभा चुनाव में भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने संघ की नाराजगी के कारण जिन्ना की तारीफ करके एक बार पार्टी से निलंबित हो चुके और फिर वापसी करने वाले भाजपा नेता जसवंत सिंह का टिकट काटकर कांग्रेस छोड़कर आने वाले जाट नेता कर्नल सोनाराम को चुनाव लड़वाया था और जसवंत सिंह को हरवाने में संघ परिवार ने पूरी ताकत झोंक दी थी। जसवंत चुनाव हार गए। इस चुनाव में भाजपा विधायक रहे उनके पुत्र मानवेंद्र सिंह ने पार्टी के विरोध में प्रचार किया तो उन्हें भी पार्टी में अलग-थलग कर दिया गया, तब वे भाजपा छोड़कर पत्नी चित्रा सिंह के साथ कांग्रेस में चले गये। पश्चिमी राजस्थान में अपने गृह जिले बाड़मेर से सैकड़ों किलोमीटर दूर पूर्वी राजस्थान के झालावाड़ जिले में झालरापाटन सीट से उन्होंने वसुंधरा राजे के सामने चुनाव भी लड़ा लेकिन बुरी तरह से हार गए।

राजपूत समाज को पिछड़ा वर्ग में आने वाले रावणा राजपूत समाज का समर्थन भी मिलता रहा है और विधानसभा चुनाव में 25 से लेकर 30 सीटों पर सीधा असर डालता है। राजपूत समाज ने पिछले चुनाव में कई सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी खड़े करके भाजपा की हार सुनिश्चित कर दी थी। इस बार भी अनेक सीटों पर राजपूत उम्मीदवार भाजपा के बागी बनकर सामने आ चुके हैं। इसी कारण राजपूत समुदाय की नाराजगी का तोड़ तलाशते हुए भाजपा अपनी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है।

राजस्थान का इतिहास मोटे तौर पर राजपूतों का इतिहास रहा है। संख्या बल में अन्य के मुकाबले कम होने के बाद भी प्रतिनिधित्व के मामले में राजपूत बिरादरी सभी पर भारी पड़ती रही है। यही कारण है कि कोई भी पार्टी चुनाव में कभी उनकी अनदेखी नहीं करती। 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण राजपूत समाज की नाराजगी ही रही थी। 2023 में भी बीजेपी के लिए हाल ही में लिए गए फैसलों से यह लग रहा है कि पार्टी राजपूत बिरादरी को लेकर या तो असमंजस में है या दबाव में है।

पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य में भाजपा के सबसे बड़े चेहरा रहे भैरों सिंह शेखावत के दामाद का टिकट कटने के बाद पार्टी और अधिक जल्दीबाजी में दिख रही है। महाराणा मेवाड़ के वंशज विश्वराज सिंह मेवाड़ और करणी सेना के संस्थापक लोकेंद्र सिंह के पुत्र भवानी सिंह कालवी को वोटिंग के एक महीने पहले आनन-फानन में पार्टी में शामिल करने से यह लगने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी राजपूत वोटों को लेकर इस बार भी निश्चिंत होने वाली स्थिति में अभी नहीं है।

राजस्थान में राजपूतों की कुल संख्या 8 से 10 प्रतिशत के करीब है, जो अपनी प्रतिद्वंद्वी जातियों जाटों और गुर्जरों के मुकाबले काफी कम है। परन्तु उनकी राजनीतिक हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य के हर विधानसभा चुनाव में करीब 14 से 15% विधायक इसी समुदाय से चुने जाते हैं। जबकि लोकसभा चुनाव में यह प्रतिशत कई बार 20% के पार भी पहुंच जाता रहा है। राजस्थान की करीब 120 विधानसभा सीटों से राजपूत समुदाय के प्रत्याशी कभी न कभी अपनी जीत का झंडा लहरा चुके हैं। यानी कि जिन सीटों पर राजपूत समुदाय की जनसंख्या बहुत ही कम है, कई बार वहां से भी राजपूत चुनकर विधानसभा और लोकसभा तक जाते रहे हैं।

वर्ष 2014 में बीजेपी के कद्दावर नेता जसवंत सिंह का टिकट कटने से शुरू हुई राजपूत समाज की नाराजगी घटने के बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। वसुंधरा सरकार के समय राजकुमारी दीया कुमारी के होटल का प्रकरण, आनंदपाल के एनकाउंटर, सामराऊ प्रकरण, चतुर सिंह एनकाउंटर आदि को लेकर राजपूतों में राज्य सरकार के प्रति जो नाराजगी पैदा हुई वह 2018 के चुनाव में साफ नजर आई थी।

इसके साथ ही गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष न बनाए जाने को लेकर राजपूतों में निराशा रही। माना गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के विरोध के चलते अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय चेहरा मदनलाल सैनी को राजस्थान बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया। यही सब कारण रहा है कि राजपूत बिरादरी को कांग्रेस से अधिक टिकट बांटने के बावजूद बीजेपी कांग्रेस से अधिक वोट नहीं पा सकी।

2018 के चुनाव में मिली हार के चलते भाजपा संगठन पिछले 2 साल से राजपूत समुदाय को मनाने में जुटा हुआ था। अगस्त 2022 में दुर्गा दास राठौड़ और पन्नाधाय की मूर्ति का अनावरण राजनाथ सिंह के कर कमलों से कराकर राजपूत समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश शुरू हो गई थी। बाद में प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे भैरो सिंह शेखावत का 100वां जन्मदिन बड़े पैमाने पर मनाने की योजना बनाई गई।

बीजेपी ने पूर्व सीएम शेखावत के जन्मशती महोत्सव के बहाने मतदाताओं को साधने के लिए 5 महीने का वोटर कनेक्ट प्लान भी चलाया। राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया को हटाकर उनकी जगह राजपूत बिरादरी के राजेंद्र सिंह राठौड़ को प्रतिपक्ष का नेता बनाया गया। महारानी दीया कुमारी को हर मोर्चे पर फ्रंट पर रखने की कोशिश की गई। अब यह कहा जा रहा है कि अगर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनती है तो महारानी दीया कुमारी मुख्यमंत्री भी बन सकती हैं।

भाजपा की ओर से लगातार यह बताने की कोशिश हो रही है कि राजपूत समुदाय भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन पांच बार विधायक रहे नरपत सिंह राजवी का टिकट कटने के बाद बिरादरी अस्मिता एक बार फिर खुलकर बाहर आ गई है। नरपत सिंह भैरो सिंह शेखावत के दामाद तो हैं ही, प्रदेश में बीजेपी के प्रमुख नेता के रूप में भी पहचाने जाते हैं।

अब इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या वसुंधरा राजे से उनकी नजदीकी ही उनके टिकट कटने का सबसे बड़ा कारण बन गई। हालांकि प्रदेश की राजनीति की समझ रखने वाले कहते हैं कि लंबे समय तक नरपत सिंह राजवी खुल कर वसुंधरा राजे का विरोध करते रहे थे। राजवी की सीट से जयपुर की महारानी दीया कुमारी को टिकट दिया गया है। पार्टी के कार्यकर्ता यह सवाल पार्टी के बड़े नेताओं से पूछ रहे हैं कि दीया कुमारी को विद्याधर नगर जैसी बेहद आसान सीट क्यों दी गई? कुछ लोग तो यह भी सवाल उठा रहे हैं कि मुगलों के आगे घुटने टेकने वाले और महाराणा प्रताप के खिलाफ लड़ने वाले परिवार पर पार्टी इतनी मेहरबान आखिर क्यों है?

हालांकि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, अशोक गहलोत की लोकप्रिय राजनीति से घबराया भाजपा नेतृत्व पहले के सारे गिले-शिकवे भुला कर वसुंधरा राजे सिंधिया को तवज्जो देने लगा है। पार्टी में बेकाबू हो रहे असंतोष को देखते हुए शीर्ष नेतृत्व यह समझ गया है कि दीया कुमारी और वसुंधरा राजे में बहुत बड़ा अंतर है। वसुंधरा बीजेपी की बहुत पुरानी नेता हैं। वह बीजेपी और राजस्थान की रग-रग से परिचित है। उन्होंने पार्टी को राजस्थान में खड़ा करने में खून पसीना बहाया है और सबसे बड़ी बात कि वह खुद को क्षत्रिय की बेटी भी कहती रही है।

बहरहाल राजस्थान में 25 नवंबर को मतदान होने हैं। सत्ता किसके पक्ष में जाएगी इसका फैसला तो 3 दिसंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा, लेकिन टिकटों के वितरण और राजनीतिक दाव पेंच से एक दूसरे को पटखनी देने का दावा दोनों दलों की ओर से किया जा रहा है।

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