Premchand: मुंशी प्रेमचंद की गरीबी का सच
Premchand: इस पर कोई शक नहीं कि प्रेमचंद हिंदी कथा संसार के बेताज बादशाह हैं। प्रेमचंद को लेकर बार-बार कहा जाता है कि उनका जीवन बहुत गरीबी में बीता। उनका एक फोटो भी है जिसमें वे अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ बैठे हैं। श्वेत-श्याम इस फोटो में काठ की साधारण-सी कुर्सी पर प्रेमचंद और उनकी पत्नी बैठे हैं। प्रेमचंद के पैरों में जो जूते हैं उनमें से एक फटा हुआ है जिसके कोने से उनकी पैर की अंगुली बाहर झांकती नजर आती है।
प्रेमचंद की गरीबी का जब भी हवाला दिया जाता है हर बार इसी फोटो का उदाहरण सामने आता है। लेकिन प्रेमचंद की गरीबी को लेकर काशी के रईस और मशहूर लेखक रायकृष्ण दास के बेटे कुछ और ही कहानी कहते हैं। रायकृष्ण दास सांस्कृतिक भावभूमि के बड़े रचनाकार थे। उन्होंने कई मशहूर पुस्तकें लिखी हैं। रायकृष्ण दास का खानदान, काशी के रईसों में शुमार किया जाता है।

प्रेमचंद ने नौकरी छोड़ने के बाद प्रकाशन का काम शुरू किया था। उनका सरस्वती प्रकाशन और प्रेस का दफ्तर रायकृष्ण दास की कोठी के ही एक हिस्से में था। पिछली सदी के तीसरे दशक में इस दफ्तर को खाली कराने को लेकर रायकृष्ण दास के साथ प्रेमचंद जी का मुकदमा चलता रहा। इस मुकदमेबाजी के बावजूद दोनों के निजी रिश्ते प्रगाढ़ रहे। मुकदमा शुरू होने के पहले प्रेमचंद रोजाना दोपहर का भोजन रायकृष्ण दास के साथ करते थे। इसके लिए उन्हें मुख्य सड़क की ओर स्थित रायकृष्ण दास जी के दफ्तर में आना पड़ता था। दोनों का भोजन रायकृष्णदास के घर से ही आता था।
रायकृष्ण दास और प्रेमचंद के इस रिश्ते की जानकारी ललित कला अकादमी से प्रकाशित पुस्तक 'कला विमर्श' में मिलती है। साल 2016 में प्रकाशित यह छोटी-सी किताब राय आनंदकृष्ण से व्योमेश शुक्ल के साक्षात्कार पर आधारित है। राय आनंदकृष्ण, रायकृष्ण दास के बेटे हैं। उन्होंने व्योमेकश शुक्ल को बताया है कि उनके पिता रायकृष्ण दास के साथ मैत्री अपनी जगह पर थी, केस अपनी जगह पर। कोई अंतर नहीं आया। प्रतिदिन प्रेस (सरस्वती प्रेस) में दोपहर खाने की छुट्टी होने पर प्रेमचंद सभा यानी राय कृष्णदास की सभा यानी दफ्तर में आ जाते थे। पिताजी वहीं होते थे। उनका कला भवन भी वहीं था।
यहां बताना जरूरी है कि रायकृष्ण दास ने काशी में कलाभवन बना रखा था जो आज भी है। इसी इंटरव्यू में राय आनंदकृष्ण कथा सम्राट की गरीबी की कहानी बताते हैं। राय आनंद कृष्ण ने बताया है कि सभा में ही उनके पिता रायकृष्ण दास को प्रेमचंद ने अपनी बैंक का पासबुक दिखलाया था। उस वक्त के हिसाब से उनके खाते में आठ हजार रूपए थे। राय आनंदकृष्ण के मुताबिक, साल 2016 के हिसाब से वह रकम करीब बारह लाख रूपये के बराबर थी।
इसी इंटरव्यू में राय आनंदकृष्ण ने बताया है कि प्रेमचंद ने अपने दोनों बेटों श्रीपत राय और अमृत राय को पढ़ने के लिए मसूरी भेजा था। राय आनंदकृष्ण के मुताबिक, तब भी मसूरी में पढ़ाना खर्चीला था। राय आनंदकृष्ण के मुताबिक, प्रेमचंद को खाने-पीने की कभी कोई दिक्कत नहीं रही क्योंकि उनके गांव लमही से पूरा राशन आता था। साफ है कि प्रेमचंद के गांव में जमीन भी थी जिस पर खेती-बाड़ी होती थी और उससे उपजा राशन उनके घर आता था।
इसी इंटरव्यू में राय आनंदकृष्ण ने कहा है कि प्रेमचंद की गरीबी का जैसा प्रचार है, वैसी गरीबी कभी नहीं रही। उनके मुताबिक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस में पुस्तकों का बड़ा स्टॉक था। राय आनंदकृष्ण कहते हैं कि प्रेमचंद के प्रसंग में भुखमरी और गरीबी का जिक्र लोकापवाद है। वे आगे कहते हैं कि गरीबी का प्रचार तब ज्यादा हुआ, जब उनके दोनों बेटे श्रीपत और अमृत राय कम्युनिस्टों की संगत में आए, इसके बाद ही इसे खूब उछाला गया।
प्रेमचंद को लेकर एक और कहानी है कि साल 1908 में उनके कहानी संग्रह 'सोजेवतन' को जब्त कर लिया गया था। लेकिन नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी में इतिहास के शोधार्थी नरेंद्र शुक्ल ने इस बारे में रिसर्च किया है। शुक्ल का कहना है कि सोजेवतन की जब्ती की कहानी सुनी-सुनाई है। उससे जुड़ा कोई तथ्य नहीं है। नरेंद्र शुक्ल का कहना है कि 1908 के सोजेवतन से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन किया है। उसमें कहीं भी उस पुस्तक की जब्ती का जिक्र नहीं है।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के इतिहास शोधार्थी प्रदीप जैन ने एक पुस्तक लिखी है, सोजे वतन जब्ती की कहानी। प्रदीप जैन के शोध के मुताबिक, उन दिनों पुस्तक जब्ती का कोई कानून ही नहीं था। प्रदीप जैन लिखते हैं कि सोजेवतन पर अंग्रेज सरकार ने कार्रवाई जरूर की, लेकिन जिस तरह कहा जाता है, वैसा नहीं हुआ।
उन दिनों प्रेमचंद हमीरपुर जिले में शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे। कहा जाता है कि सोजेवतन को लेकर हमीरपुर के कलेक्टर ने प्रेमचंद को बुलाया था, लेकिन प्रदीप जैन के शोध के मुताबिक, ऐसा नहीं हुआ। प्रदीप जैन के मुताबिक, इस कार्रवाई में हमीरपुर के कलेक्टर की कोई भूमिका नहीं रही। सोज़ेवतन पर कार्रवाई की शुरुआत अंग्रेज सरकार के तत्कालीन क्रिमिनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट ने की थी। उन दिनों शिक्षा महकमा गृह विभाग के अधीन होता था और क्रिमिनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट तो सदा से ही गृह विभाग के ही अधीन है। प्रदीप जैन के शोध के अनुसार, उन दिनों संयुक्त प्रांत के गृह विभाग ने कार्रवाई की थी। इस कार्रवाई के तहत प्रेमचंद ने लिखित में सफाई दी थी। प्रदीप जैन ने अपनी पुस्तक में प्रेमचंद के उस स्पष्टीकरण को भी शामिल किया है।
इन तथ्यों से रचनाकार प्रेमचंद का कद छोटा नहीं हो जाता। प्रेमचंद हिंदी के ही नहीं, भारतीय भाषाओं के कथा सम्राट हैं। अपनी रचनात्मकता के दम पर बने रहेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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