Bilawal Bhutto on Modi: 'पाकिस्तानी पप्पू' के बेतुके बोल

बिलावल भुट्टो जरदारी को पाकिस्तान का पप्पू भी कहा जाता है। क्योंकि वो कब क्या बोल देंगे, उसका कोई ठिकाना नहीं होता। न्यूयार्क में अकारण मोदी को 'गुजरात का कसाई' बोलकर बिलावल ने फिर साबित कर दिया कि वह पप्पू ही है।

Bilawal Bhutto’s comments on PM Modi reflect he is pappu of pakistan

Bilawal Bhutto on Modi: बिलावल भुट्टो जरदारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के भविष्य हैं। आसिफ अली जरदारी और बेनजीर भुट्टो की तीन संतानों में से एक बिलावल भुट्टो पर ही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का दारोमदार है। 2007 में बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद 19 साल की उम्र में ही उन्हें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का प्रमुख घोषित कर दिया गया था। हालांकि उनके वयस्क होने तक पार्टी का काम काज उनके पिता आसिफ अली जरदारी ने संभाला। 2018 के चुनाव में पहली बार बिलावल भुट्टो जरदारी ने पार्टी का काम काज अपने हाथ में लिया और अप्रैल 2022 से वो अपनी पार्टी की धुर विरोधी मुस्लिम लीग (एन) के नेतृत्व में बनी साझा सरकार में विदेश मंत्री हैं।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की स्थापना जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1967 में एक प्रगतिशील सोशलिस्ट पार्टी के रूप में की थी। जुल्फिकार अली भुट्टो जिस परिवार से ताल्लुक रखते थे उसका मूल राजस्थान के एक राजपूत परिवार से था। औरंगजेब के समय में उनके पुरखे सेहतो ने जजिया से बचने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया था। सेहतो के वंश में ही शाहनवाज भुट्टो जूनागढ रियासत के दीवान नियुक्त हुए। बंटवारे के समय जब जूनागढ के नवाब पाकिस्तान में विलय की अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाये तो दीवान शाहनवाज भुट्टो का परिवार भागकर नवनिर्मित पाकिस्तान चला गया।

लरकाना में शाहनवाज भुट्टो की पहले से बहुत जमीन जायदाद थी। इसलिए पाकिस्तान में बस जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। इन्हीं शाहनवाज भुट्टो के बेटे जुल्फीकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की स्थापना की थी जो आज पाकिस्तान के सिन्ध इलाके में अच्छा राजनीतिक प्रभाव रखने वाला राजनीतिक दल है। लेकिन इस पार्टी का जो इतिहास रहा है उसमें बहुत विरोधाभासी बातें सामने आती रही हैं। जुल्फिकार अली भुट्टो हों, बेनजीर भुट्टो या फिर अब बिलावल भुट्टो, इन नेताओं ने समय समय पर जो मूर्खताएं की हैं, उसका खामियाजा अंतत: उन्हें ही चुकाना पड़ा है।

जैसे, जुल्फिकार अली भुट्टो सोशलिस्ट और सेकुलर राजनीति के पक्षधर थे। वो मानते थे कि इसी रास्ते पर चलकर पाकिस्तान का विकास हो सकता है। लेकिन सच यह भी है कि राजनीति में उन्होंने ही सबसे पहले इस्लामिक कट्टरपंथ को बढावा देना शुरु किया, जिसका खामियाजा उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। अपनी इस्लामिक स्वीकार्यता बढाने के लिए सबसे पहले उन्होंने कट्टरपंथी सुन्नी मौलानाओं को संरक्षण देना शुरु किया। यह जुल्फिकार अली भुट्टो ही थे जिन्होंने "घास खायेंगे लेकिन इस्लामिक बम बनायेंगे" का नारा दिया। न सिर्फ नारा दिया बल्कि परमाणु बम बनाने के लिए गुपचुप तरीके से काम भी किया।

जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपनी स्वाभाविक सोशलिस्ट सोच के उलट जाकर 1974 में अहमदिया मुसलमानों को गैर मुस्लिम घोषित कर दिया। 1974 से पहले वो जिस इस्लामिक समाजवाद की बात कर रहे थे 1974 के बाद वह शुद्ध रूप से इस्लामिक रियासत हो गया। स्वाभाविक है यह सब वो अपने आपको इस्लाम का सच्चा हितैषी साबित करने के लिए कर रहे थे। खासकर 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद उन्हें ये साबित करना था कि वही हैं जो पाकिस्तान को इस्लामिक सिद्धांतों पर संचालित कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने कट्टरपंथी मुल्ला मौलवी बिरादरी को हुकुमत में हद से ज्यादा हस्तक्षेप करने दिया।

लेकिन इस सबके बावजूद वो सफल नहीं हुए। सेंन्ट स्टीफन्स कॉलेज दिल्ली में पढ़े जिस जिया उल हक को 1976 में उन्होंने आर्मी चीफ बनाया, उसी ने 1977 में उनको प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतारकर जेल में डाल दिया। जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान को जिस सच्चे इस्लाम की खोज में भटका दिया था उसका पहला शिकार जुल्फिकार अली भुट्टो ही बने। 4 अप्रैल 1979 को एक लंबी अदालती लड़ाई में हार के बाद उन्हें फांसी दे दी गयी।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जुल्फिकार अली भुट्टो अपने इस्लामिक सोशलिज्म के शिकार हो गये। कुछ ऐसा ही हाल उनकी बेटी और पीपीपी की उत्तराधिकारी बेनजीर भुट्टो का हुआ। एक ओर वो प्रगतिशील और बाजार आधारित विकास की वकालत करती थीं, जिया उल हक जैसे इस्लामिक कट्टरपंथ से अपने आपको दूर रखती थीं लेकिन दूसरी ओर कश्मीर में जिहाद का समर्थन भी करती थीं। कश्मीर में आतंकवाद को न सिर्फ समर्थन किया बल्कि संरक्षण भी दिया। उनकी इस दोहरी नीति का शिकार वो खुद हो गयीं और 2007 में एक आतंकवादी हमले में मारी गयीं।

इस संक्षिप्त विश्लेषण का आशय सिर्फ इतना है कि भुट्टो परिवार या पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में जिसने अपने आप को पाकिस्तान में सच्चा इस्लामिक हितैषी और भारत विरोधी साबित करने का प्रयास किया है, उसने मुंह की खाई है। पाकिस्तान की जो जनता पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को सपोर्ट करती है वह भी उससे किसी इस्लामिक चरमपंथी संगठन जैसे व्यवहार की उम्मीद नहीं करती। पाकिस्तान में पीपीपी मुख्य रूप से शिया मुसलमानों और हिन्दुओं की नुमाइंदगी करती है तो उससे कट्टर सुन्नी भी इस्लामिक कट्टरपंथ की उम्मीद नहीं करते।

लेकिन ऐसा लगता है कि अपनी उदारता को अपने ऊपर लगा इस्लामिक दाग समझने वाले पीपीपी लीडर्स समय समय पर इसे धोने का प्रयास करते हैं। बिलावल भुट्टो जरदारी का भी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में पहुंचने के बाद मोदी को 'बुचर ऑफ गुजरात' कहने का संकेत अपने आप को सुन्नियों जैसा सच्चा मुसलमान साबित करने की कवायद ही है। जो न सिर्फ बेतुका है बल्कि बेमतलब भी है।

पाकिस्तान में ही बिलावल भुट्टो की कोई ऐसी छवि नहीं है कि पाकिस्तानी कट्टरपंथी उनसे सख्त भारत विरोधी बयानों की उम्मीद करें। फिर उनके बारे में ये धारणा भी है कि वो लंदन से पढे लिखे हैं इसलिए कम से कम मदरसा छाप नेताओं की भाषा नहीं बोंलेगे। लेकिन जिस तरह से न्यूयार्क में उन्होंने मोदी को गुजरात का कसाई बताया है उससे साफ है कि वह भी वही होना चाहते हैं जो बनने की चाह में उनके नाना और अम्मी का खात्मा हो गया। तिस पर तुर्रा ये कि उन्होंने बोलने का अंदाज भी अब शाह महमूद कुरैशी से उधार ले लिया है।

इमरान खान सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए जब शाह महमूद कुरैशी की हैसियत एक मसखरे से अधिक नहीं बन पायी तो उनकी नकल करके बिलावल भुट्टो जरदारी राजनीतिक पप्पू से अधिक और भला क्या साबित होंगे? पहले उनका ये पप्पू रूप पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली और राजनीतिक रैलियों में दिखता था, अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दिख गया है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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