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Bikini Girl in Delhi Metro: मॉडर्निटी के मायाजाल में उलझा भारतीय युवा

एक ओर हमें अमेरिका और यूरोप भी बनना है और दूसरी ओर अपनी संस्कृति को भी बचाकर रखना है। यह कैसे संभव हो सकता है? या तो हम गाल फुलाकर रखें या फिर हंस ही लें। दोनों काम एक साथ कैसे हो पायेगा?

Bikini Girl in Delhi Metro modernity trend over indian youth

Bikini Girl in Delhi Metro: दो दिनों से ट्विटर पर कुछ ऐसी तस्वीरें शेयर हो रहीं हैं जिन्हें लोग आपत्तिजनक बता रहे हैं। ये तस्वीरें दिल्ली मेट्रो की हैं। इनमें कुछ ऐसी लड़कियों की फोटो हैं जिन्होंने अपने शरीर पर नाम मात्र के चीथड़े डाल रखे हैं। पूरा शरीर लगभग नग्न है। कुछ ऐसी भी तस्वीरें सामने आ रही हैं जब मेट्रो के भीतर सरेआम 'किसिंग' या 'हगिंग' हो रही है। दिल्ली मेट्रो ने एक अस्त व्यस्त कहे जाने वाले शहर को जिस तरह 'मॉडर्न' बनाया है, ये चित्र उसी 'मॉडर्निटी' के कुछ नमूने हैं।

कुछ लोग ऐसे दृश्य को सही कहेंगे तो कुछ गलत। लेकिन इतना तो तय है कि जो नौजवान ऐसा कर रहे हैं उन्हें इस बात की बुनियादी समझ भी नहीं है कि सार्वजनिक स्थान पर हमारा निजी व्यवहार कैसा होना चाहिए। या फिर ये भी हो सकता है कि वो अपने अलावा और किसी के अस्तित्व को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उनकी बॉडी उनका च्वाइस। वो मॉडर्निटी के उस मन मानस में चले गये हैं जहां आपको अपनी आंख बंद करनी है, वो अपना कर्म नहीं सुधारेंगे।

सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह का प्रदर्शन सही है या गलत, इसको देखने का कोई निश्चित फार्मूला नहीं हो सकता। कौन क्या कपड़े पहनता है, क्या भोजन करता है, या फिर कौन सी भाषा बोलता है ये उसका निजी मामला है। कम से कम इतना अधिकार तो किसी को भी होता ही है कि वह अपने लिए अपनी पसंद का भोजन, वस्त्र और भाषा का चुनाव कर सके। लेकिन इस तरह का चुनाव आमतौर पर होता नहीं है। अपने भोजन, भाषा या फिर पहनावे के लिए हम अपनी संस्कृति पर ही पूरी तरह से निर्भर होते हैं।

हमारी संस्कृति हमारे भोजन, भाषा, वस्त्र और व्यवहार को पूरी तरह से प्रभावित करती है। हम धरती के जिस भूभाग पर जन्म लेते हैं वहां की संस्कृति में रहना हमें सुख देता है। ये मनुष्य मन का स्वाभावित व्यवहार होता है कि वह वही करता है जिसमें उसे सुख मिलता है। संस्कृति का महत्व किसी भी व्यक्ति के जीवन में इसलिए बहुत अधिक होता है क्योंकि उसके वास्तविक सुख का साधन उसकी संस्कृति में ही होता है।

संस्कृतियों का विकास कोई एक दशक या एक शताब्दी में नहीं होता। यह एक लंबी प्रक्रिया होती है जिसमें हमारा भोजन, भैषज, वस्त्र अलंकार, भाषा और जीवनचर्या का निर्धारण होता है। संस्कृतियों का विकास वहां के स्थानीय प्राकृतिक परिवेश से जन्म लेता है इसलिए अगर इसमें बहुत ज्यादा हस्तक्षेप किया जाए तो संस्कृति भी नष्ट होती है और उस संस्कृति में जीवन जीने वाले लोग भी। ऐसा इसलिए होता है कि आप अपने प्रकृति और पर्यावरण के बाहर जाकर कोई जीवनचर्या निर्धारित ही नहीं कर सकते। करेंगे तो सिवाय दुख के और कुछ मिलेगा नहीं।

लेकिन भारत में अपनी ही संस्कृति से अलग जाने की शुरुआत अठारवीं सदी में ही हो गयी थी जब बंगाल में अंग्रेजों ने अपना शासन स्थापित किया। वहां से हमारे मन में धीरे धीरे ये बात बैठनी शुरु हुई कि अगर हम जो हैं, वही रह गये तो हम मॉडर्न कहां हुए। बदलते समय के साथ हमें अपने आप को बदल लेना चाहिए। इसके शुरुआती लक्षण ब्रिटिश अधिकारियों की पार्टियों में दिखने शुरु हुए जब भारत के सेठ साहूकार या फिर प्रभावशाली लोग वहां जाकर 'सुपिरियर' होने का अनुभव करने लगे। 1859 में जब सीधे तौर पर विक्टोरिया का शासन स्थापित हुआ तब ये प्रयास और सघनता से बढ़ा। जल्द ही ब्रिटिश अधिकारियों ने ब्रिटेन में बैठे शासकों को सूचित करना शुरु कर दिया कि लगता है हम सफल हो रहे हैं क्योंकि सेठ साहूकार अब हमारी पार्टियों में आकर 'गर्व की अनुभूति' करते हैं।

1947 में भारत स्वतंत्र भले हो गया हो, लेकिन 'ब्रिटिश भाषा और तौर तरीकों में गर्व की अनुभूति' करने का भाव हमारे मन में गहरा होता गया। आप कह सकते हैं कि अंग्रेज मुख्य दरवाजे से तो गये लेकिन चोर दरवाजे से वापस लौट आये। व्यापार के जरिए भारत को परिवर्तित करने की जो मुहिम उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए शुरु की थी, उसको अनेकानेक कंपनियों में बांट दिया। वो ये बात अच्छी तरह से समझते थे कि कोई भी समाज उसकी अर्थव्यवस्था से पहचाना जाता है। अगर अर्थव्यवस्था हमारे हाथ में रहेगी तो समाज भी वैसा ही बनेगा जैसा हम चाहेंगे।

1991 के उदारीकरण के बाद तो हमने ही सारे दरवाजे खिड़कियां उखाड़कर फेंक दिये। हमें लगा कि संकीर्ण मन से वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बना जा सकता। लेकिन ऐसा करते हुए हम एक बात भूल गये कि सामाजिक संरचना का निर्धारण अर्थव्यवस्था से ही होता है। अगर अर्थव्यवस्था हमारी अपनी नहीं होगी तो उससे जो समाज बनेगा, वह भी हमारा अपना नहीं होगा। उस समाज में जो संस्कृति विकसित होगी, उसे देखकर हम रोज रोज अपने ही पतन का रोना रोएंगे लेकिन उसे रोक नहीं पायेंगे।

भूमंडलीकरण वाली अर्थव्यवस्था में जो बच्चे युवक बन रहे हैं उनके सामने सबसे बड़ा संकट अपनी संस्कृति को लेकर ही है। इक्कीसवीं सदी में उन्हें अगर मॉडर्न दिखना है तो वह सब छोड़ना पड़ेगा जो कुछ उनसे पहले वाली पीढी के पास था। मॉडर्निटी का यही अघोषित सिद्धांत हर नौजवान के पास है। इसलिए वह सबसे पहले अपनी भाषा छोड़ता है। फिर अपना भोजन छोड़ता है। फिर कपड़े छोड़ता है और इसकी जगह विदेशी भाषा, भोजन, पहनावा, दिखावा सब अपनाता है। यह सब करते हुए उसे लगता है कि अब वह मॉडर्न हो गया है। उसके सामने बदलती अर्थव्यवस्था के जरिए हमने ही मॉडर्निटी का जो पैरामीटर रखा, वह उसी पर चलकर मॉडर्न हो गया। फिर हम कैसे शिकायत करें कि वह गलत कर रहा है?

यहां हम से आशय जनता से नहीं बल्कि जनता के उन प्रतिनिधियों से है जो संसद या विधानसभाओं में बैठकर आर्थिक और सामाजिक नीतियां तय करते हैं। समाज का सामान्य वर्ग नीति निर्धारक नहीं होता। ये काम अंग्रेजों के आने के बाद धीरे धीरे बंद हो गया। समाज के पास जो कुछ अधिकार था, उसे भी हमारी सरकारों ने कानून बनाकर अपने पास रख लिया। अब भारतीय समाज भी वहीं दिखता है जहां माडर्निटी और विकास नहीं पहुंचा है। भारत का हर 'विकसित, पढा लिखा और तथाकथित सभ्य मनुष्य' अभारतीय हो चुका है। उसके लिए यही मॉडर्निटी है और इसी मॉडर्निटी में वह 'गर्व की अनुभूति' भी कर रहा है।

कितने "पढे लिखे माडर्न लोग" होंगे जो अपनी भाषा बोलकर गर्व की अनुभूति करेंगे? हमारे यहां तो पूरा सिद्धांत ही बदल दिया गया है। हमारी सारी दौड़ अपनी संस्कृति से दूर जाने के लिए है, क्योंकि हमने ही उसे पिछड़ा और दकियानूसी मान लिया है। अब जो पिछड़ा हुआ और दकियानूसी होगा, उसमें हमारा नौजवान मन भला गर्व की अनुभूति कैसे कर पायेगा? इस दौड़ में हम धीरे धीरे इतने दूर भागते जा रहे हैं कि वापस लौटने के लिए किसी सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत होगी।

मार्केट इकोनॉमी वाली मॉडर्निटी एक भस्मासुर की तरह होती है जो अंतत: उसे ही भस्म करती है जो इसे पैदा करता है। अब हमने जब इसे पैदा कर ही लिया है तो भस्म होने से डरना भी नहीं चाहिए। कहा होगा किसी विवेकानंद ने अमेरिका जाकर कि हमारे यहां कपड़े और गाड़ियों से लोग जेन्टलमैन नहीं बनते। लेकिन आज तो भारत में ही गाड़ियों, शानो शौकत और भोग विलास से 'बड़े आदमी' बन रहे हैं। विवेकानंद ने अमेरिका को कितना प्रभावित किया, ये तो नहीं पता लेकिन वहां जिस 'कल्चर' पर विवेकानन्द ने हमला किया था, वह कल्चर पलटकर हमसे बदला जरूर ले रही है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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