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Bihar Politics: क्या लोकप्रियता की लहर पर सवार तेजस्वी जीत लेंगे बिहार?

Bihar Politics: बिहार में फिर से नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनने के बाद से नाराज युवा नेता तेजस्वी यादव प्रदेश भर के दौरे पर हैं। उनकी जन विश्वास यात्रा में जबरदस्त भीड़ जुट रही है। वाकपटुता बढ़ी है और वह समर्थकों के बीच पहले से ज्यादा कनेक्ट कर पा रहे हैं।

विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वास प्रस्ताव पर बोलने के क्रम में उन्होंने बारीकी से अपना राजनीतिक नैरेटिव गढ़कर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई है। यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव इस बार नीतीश कुमार सरकार में 17 महीनों तक रहकर किए अपने काम को बताकर छवि चमका रहे हैं। वो अपने आप को बिहार के युवाओं को नौकरी दिलाने वाले नायक की तरह पेश कर रहे हैं।

Bihar Politics:

बंपर सरकारी नौकरी देने से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ा है जिसे देखकर कहना मुश्किल है कि इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पुराने मित्र लालू प्रसाद से दुश्मनी साधी है या फिर मित्र धर्म निभाने के लिए तेजस्वी को निखरने का मौका देते हुए अपनी राजनीतिक छाया से आजाद कर दिया है।

तेजस्वी का निखरना बता रहा है कि यही चाल और ढाल बरकरार रही तो वो आने वाले लोकसभा चुनाव में एनडीए की डबल इंजन सरकार पर भारी पड़ सकते हैं। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। पिछली बार के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। मोदी की आंधी में आरजेडी एक भी लोकसभा सीट हासिल नहीं कर पाई थी।

2019 लोकसभा चुनाव में एनडीए को बिहार में 53 प्रतिशत वोट मिले और जेडीयू, बीजेपी और एलजेपी ने साथ मिलकर 39 लोकसभा सीटें जीत ली थी। लेकिन अब पांच साल से गंगा में काफी पानी बह चुका है। 2020 का विधानसभा चुनाव एनडीए की अंदरूनी आपसी कलह में बीता।

चिराग पासवान कथित हनुमान बनकर गठबंधन के बाहर से बीजेपी की मदद और जेडीयू का नुकसान करते रहे। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में जेडीयू की हैसियत सिमटकर महज 45 विधायकों की रह गई। बीजेपी ने वायदे के अनुसार नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री तो बनाया पर उनके समर्थक बीजेपी के कद्दावर नेता व कुशल प्रशासक सुशील मोदी को नीतीश से दूर कर दिया।

इससे असहज नीतीश कुमार ने बीच में ही एनडीए से अलग होकर आरजेडी, कांग्रेस व लेफ्ट के साथ मिलकर महागठबंधन की सरकार का मुख्यमंत्री बन जाना पसंद किया। साथ ही विपक्ष की ओर से बीजेपी को केंद्र से हटाने की व्यूह रचना बनाने में मशगूल हो गए। मौजूदा इंडिया गठबंधन की अवधारणा नीतीश कुमार की ही बनाई हुई है। मगर इंडिया गठबंधन के धुअंधरों के बीच अपनी दाल नहीं गलती देख वह सत्रह महीनों बाद एनडीए में लौट आए हैं।

जेडीयू के अचानक छोड़ जाने से बिहार में सदमे में फंसे इंडिया गठबंधन की लोकसभा सीटों की उम्मीदवारी का मसला अभी सुलझा नहीं है। लेकिन तेजस्वी की सक्रियता को लेकर साफ लग रहा है कि उनकी पार्टी अब मजबूत दावेदार होगी। कांग्रेस पार्टी को उत्तर प्रदेश की तरह ही बिहार में भी सीमित सीटों पर चुनाव लड़कर संतोष करना होगा। पिछली बार की तरह इस बार राजद को शून्य लोकसभा सीट तक समेट देना एनडीए के लिए मुश्किल होगा।

एनडीए में अंदरूनी तकरार बढ़ाने के लिए तेजस्वी ने अपनी सभाओं में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चाहत का बखान भी कर रहे हैं। नीतीश के पुराने सिपहसालार और नए प्रतिद्वंदी तेजस्वी यादव होशियारी से बता रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीजेपी के साथ इस शर्त पर गए हैं कि लोकसभा के साथ ही विधानसभा का भी चुनाव करा दिया जाए। नीतीश अब एनडीए में रहकर ही लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव लड़कर अपने पिछले नुकसान की भरपाई करना चाहते हैं।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल सितंबर 2025 तक है। ऐसे में विधानसभा का डेढ़ साल का कार्यकाल बचा है। भला कोई विधायक बिला वजह इतना पहले दोबारा चुनाव के लिए जनता के बीच जाने की जहमत क्यों उठाना चाहेगा। मगर तेजस्वी का कहना है कि समय पूर्व विधानसभा चुनाव कराने के इरादे से ही महीने भर से नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल के विस्तार को निलंबित कर रखा है।

राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ इस बार 17 महीने तक चुपचाप सरकार चला कर उपमुख्यमंत्री तेजस्वी ने जो विश्वास बहाल किया है वह पिछले मौकों पर संभव नहीं हो पाया था। पाला बदल के लिए बदनाम नीतीश कुमार ने तीन बार लालू प्रसाद की आरजेडी के साथ मिलकर सरकार चलाई है और तीनों ही बार विपक्ष के मौजूदा नेता तेजस्वी यादव उनकी सरकार के उपमुख्यमंत्री रहे हैं। सरकार में रहते वक्त नीतीश कुमार उदारतावश खुले मंच से कहते रहे कि तेजस्वी जैसे युवा ही उनकी समाजवादी विचारधारा के राजनीतिक वारिस हैं। आगे तेजस्वी को ही बिहार का राजकाज सम्हालना है।

यही वजह है कि विपक्षी नेता के तौर पर दिए जा रहे तमाम भाषणों में तेजस्वी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति आदर प्रकट करने में कोई कंजूसी नहीं कर रहे। इतना ही नहीं विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने अद्भुत संस्कार का परिचय देते हुए नवनियुक्त विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चरण स्पर्श किये। इस नए रवैए पर पूछे गए सवाल पर तेजस्वी की सफाई थी कि दोनों ही नेता उनके पिता के जमाने से राजनीति में रहे हैं। साथ काम किया है इसलिए विशेष मौके पर आदर प्रकट करने में दिक्कत क्या है?

ये वही तेजस्वी यादव हैं जिनके माता पिता यानी मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव की सरकार को जंगल राज की संज्ञा देकर ही बीजेपी ने नीतीश कुमार के सहारे बिहार में अपनी पैठ बनाई है। अब परिपक्व दिख रहे तेजस्वी संस्कारवान होने का इजहार कर परिवार पर लगे अराजक शासक के दाग को धोने में लगे हैं।

बिहार की राजनीति में प्रचलित मजाक है कि तेजस्वी यादव की शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास है और उससे अधिक नौ बार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं। लेकिन तेजस्वी इस बार धोखा खाने के साथ ही बिहार के दौरे पर निकल गए हैं। निरंतर सभाएं कर रहे हैं, समर्थकों में उत्साह भर रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनकल्याण के कामों को अपने हिस्से में बताकर श्रेय लूट रहे हैं।

यह सब देखकर साफ लग रहा है कि पिछली बार तेजस्वी ने काफी सोच समझकर नीतीश कुमार की सरकार में शामिल होने का फैसला लिया था। उन्हें नीतीश कुमार से अलग हो जाने की परिणति का आरंभ से ही आभास था। अपनी नई कोशिशों से तेजस्वी निरंतर यह साबित कर रहे हैं कि राजनीति शैक्षणिक योग्यता का नहीं बल्कि खालिस प्रयोग से साधने का विषय है जिसमें वो खरे उतर रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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