Nitish Kumar: मझधार में फंस गए नीतीश कुमार

Nitish Kumar: एक तरफ तो नीतीश कुमार के करीबी बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष महेश्वर हजारी ने कहा है कि इंडी एलायंस में नीतीश कुमार को पीएम पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला हो गया है| दूसरी तरफ नीतीश कुमार को लेकर बिहार में फिर से अटकलों का बाज़ार गर्म है कि वह एनडीए में जाने का रास्ता खोज रहे हैं| इसकी वजह यह है कि बिहार की लोकसभा सीटों को लेकर उनका लालू यादव के साथ समझौता नहीं हो पा रहा है| इसीलिए वह जी-20 के मौके पर राष्ट्रपति के रात्रिभोज में शामिल हुए थे, और प्रधानमंत्री से मुलाक़ात भी की थी|

अभी दो दिन पहले उनकी लालू यादव से मुलाक़ात हुई है| इस मुलाक़ात में लोकसभा सीटों के बारे में कोई चर्चा हुई या नहीं, यह नहीं पता लेकिन उससे पहले से यह चर्चा चल रही थी कि लालू यादव ने जेडीयू को आठ सीटें देने की पेशकश की है| फिलहाल जेडीयू के सोलह लोकसभा सदस्य हैं|

bihar politics Nitish Kumar stuck between india alliance and nda

2014 में भाजपा को धोखा देने के बावजूद जब नीतीश कुमार 2017 में एनडीए में लौटे थे, तो भाजपा ने उन्हें समझौते में 17 सीटें लड़ने को दी थी, जिनमें वह 16 जीत गए थे| इसलिए उन जीती हुई 16 सीटों में से केवल आधी सीटों पर चुनाव लड़ने की लालू यादव की पेशकश नीतीश कुमार स्वीकार नहीं कर सकते|

इसीलिए दिल्ली में हुई कोऑर्डिनेशन कमेटी की मीटिंग में नीतीश कुमार ने फारूख अब्दुल्ला से यह फार्मूला पेश करवाया था कि हारी हुई सीटों पर बातचीत हो, जीती हुई सीटें उसी दल के पास रहें जिसने 2019 में जीती थीं| लेकिन लालू यादव ने यह फार्मूला ठुकरा दिया था| अब नीतीश कुमार की लालू यादव से मुलाक़ात के बाद यह अटकल दुबारा से शुरू हुई है कि नीतीश कुमार फिर से एनडीए के साथ जाने का रास्ता खोज रहे हैं| राजनीति में कई बार दबाव बनाने के लिए भी अटकलों का इस्तेमाल होता है| यह अटकल लालू यादव पर दबाव बनाने के लिए खुद नीतीश कुमार कैंप से फैलाई हुई हो सकती है|

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लालू यादव के बेटे और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इन अटकलों को सिरे से खारिज करते हैं, लेकिन केन्द्रीय मंत्री पशुपति पारस ने यह कह कर इन अटकलों को हवा दे दी कि अगर नीतीश कुमार वापस लौटते हैं, तो उनका स्वागत होगा| हालांकि नीतीश कुमार को एनडीए में वापस लेने का फैसला करना उनके हाथ में नहीं है|

दूसरी तरफ भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि अगर नीतीश कुमार को एनडीए में वापस लिया गया तो भाजपा में बगावत हो जाएगी| सुशील मोदी उन लोगों में से एक हैं, जो नीतीश कुमार के लिए एनडीए का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो जाने की बात कह रहे हैं|

हालांकि भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह भी यह बात कह चुके हैं कि नीतीश कुमार के वापस लौटने के सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं| फिर सुशील कुमार मोदी को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि अगर नीतीश को एनडीए में वापस लिया जाता है, तो भाजपा में बगावत हो जाएगी| इसका मतलब यह है कि उन्हें भी कहीं से यह भनक लगी है कि नीतीश कुमार कुछ कोशिश कर रहे हैं, और इंडी एलायंस बनने के बाद 2024 के गंभीर संकट को देखते हुए मोदी-शाह की जोड़ी पिघल सकती है| तो सुशील कुमार मोदी का यह बयान भी मोदी-शाह पर दबाव बनाने के लिए है कि वे ऐसी गलती न करें|

सच यह है कि साल भर पहले नीतीश कुमार में जितना उत्साह था, इंडी एलायंस बनते ही वह ठंडा पड चुका है| साल भर पहले तो उन्होंने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष लल्लन सिंह से लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान भी करवा दिया था| यह भी एलान करवा दिया था कि वह बिहार से नहीं, उत्तर प्रदेश से लड़ेंगे|

उत्तर प्रदेश से इसलिए क्योंकि उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने से प्रधानमंत्री बनने की संभावना बढ़ जाती है| नरेंद्र मोदी भी इसीलिए 2014 में गुजरात के साथ साथ यूपी से चुनाव लड़े थे| लल्लन सिंह ने यह भी बता दिया था कि वह उत्तर प्रदेश की फूलपुर सीट से चुनाव लड़ेंगे| एनडीए छोड़ने और लालू यादव के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद नीतीश कुमार ने फूलपुर का दौरा भी किया था|

उस समय नीतीश बड़े सपने देख रहे थे| वह हवा उड़ा रहे थे कि वह उत्तर प्रदेश की फूलपुर, मिर्जापुर या अंबेडकर नगर सीट से चुनाव लड़ेंगे, इन तीनों सीटों पर उनकी कुर्मी जाति के वोट मायने रखते हैं| वह बिहार, झारखंड के अलावा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के कुर्मियों को भी अपने पक्ष में इकट्ठा करने की रणनीति बना रहे थे| वह बहुत बड़े सपने ले रहे थे कि विपक्ष के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बन कर वह देश भर की कृषक जातियों कुर्मियों, पटेलों और जाटों को अपने पीछे लामबंद करेंगे| इसमें वे आंध्रप्रदेश के रेड्डी, कापू और नायडू जातियों को भी जोड़ते थे|

नीतीश कुमार ने उन दिनों ही मंडल राजनीति को पुनर्जीवित करने के लिए ही जातीय जनगणना का दांव भी चला था, जबकि उस दांव को भी अब कांग्रेस और राहुल गांधी ने उनसे हथिया लिया है| कांग्रेस और राहुल गांधी की आवाज निश्चित ही लालू यादव, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव से ज्यादा है|

लोकसभा में जिस तरह राहुल गांधी ने जातीय जनगणना की आवाज उठाई है, उस तरह कभी लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव भी नहीं उठा पाए थे| यह बात अलग है कि मंडल की जातियां अब कमंडल से जा मिली हैं, और उन्हें कमंडल से निकालना इतना आसान नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने अपनी हैदराबाद कार्यसमिति में जातीय जनगणना का प्रस्ताव पास करके प्रयास शुरू कर दिया है|

इस बीच राहुल गांधी ने अपना तौर तरीका पूरी तरह बदल दिया है| भारत जोड़ो यात्रा के बाद वह पप्पू की छवि से बाहर निकल चुके हैं| उसके बाद लगातार जनता के बीच दिखाई देकर ट्विटर नेता की छवि भी तोड़ चुके हैं| नेहरू परिवार का कोई भी वारिस जनता में इतना दिखाई नहीं दिया, जितना राहुल गांधी दिखाई दे रहे हैं| वह हर रोज अखबारों और सोशल मीडिया में नए अवतार में दिख रहे हैं|

राहुल गांधी के इस नए रूप ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले नीतीश कुमार की उम्मीदों पर चुनावों से पहले ही पानी फेर दिया है| अलबत्ता अब उन्हें अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाना भी भारी पड़ रहा है, क्योंकि लालू यादव जेडीयू को निगलने की पूरी तैयारी कर चुके हैं| जेडीयू के कुछ सांसद भाजपा से टिकट मांग रहे हैं, तो कुछ लालू यादव से टिकट मांग रहे हैं|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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