Bihar Politics: कर्पूरी ठाकुर के राजनीतिक दांव से लालू-नीतीश पर भारी मोदी
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के वक्त भाजपा को एक झटका बहुत जोर से लगा था। जब भाजपा के लिए एक एक सीट जीतना महत्वपूर्ण था, साफ़ लग रहा था कि कांग्रेस का पलड़ा भारी है, तब भी भाजपा ने अपने पूर्व मुख्यमंत्री और लिंगायत नेता जगदीश शेट्टार को टिकट देने से इंकार कर दिया था।

शेट्टार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से बात करने दिल्ली भी आए थे, लेकिन भाजपा ने तय कर लिया, तो कर लिया। जिन्दगी भर आरएसएस और भाजपा के साथ रहने वाले जगदीश शेट्टार अपने बुढापे में कांग्रेस में चले गए। जब कर्नाटक में कांग्रेस की हवा बह रही थी, कांग्रेस अपार बहुमत के साथ विधानसभा चुनाव जीत रही थी। ऐसे समय में जगदीश शेट्टार का कांग्रेस में चले जाना कर्नाटक में भाजपा सरकार के कफन में आख़िरी कील साबित हुआ।
लेकिन संघ और भाजपा परिवार के बारे में मशहूर है कि वह विश्वासघात करने वालों को कभी नहीं बख्शता। कांग्रेस अपार बहुमत से जीत गई लेकिन जगदीश शेट्टार फिर भी हार गए। अब ठीक नौ महीने बाद 25 जनवरी को शेट्टार भाजपा में लौट आए हैं।
क्या यही हाल बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार का होने वाला है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने ठान लिया है कि नीतीश कुमार का खेल पलटना ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली भारतीय जनता पार्टी के पुराने मिजाज से एक दम अलग है।
मोदी से पहले की भाजपा अपने संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ता पर ही जोर देने में विश्वास रखती थी, लेकिन मोदी की भाजपा ज्यादा से ज्यादा बाहरी लोगों को अपने साथ जोड़ने में विश्वास रखती है। इसके अलावा एक बड़ा फर्क यह है कि नरेंद्र मोदी सामने वाली पार्टी की अगली चाल पर निगाह रखते हुए उसकी काट का बन्दोबस्त पहले से करके रखते हैं।
2022 में जब नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोडकर लालू यादव के साथ चले गए थे, नरेंद्र मोदी को तभी समझ आ गया था कि बिहार में उन दोनों का जुड़ना भाजपा के लिए घातक हो सकता है। 2024 के चुनाव की तुलना 2014 से नहीं की जा सकती, क्योंकि उस समय नीतीश कुमार अकेले थे, लेकिन इस बार लालू यादव, नीतीश कुमार और कांग्रेस एक साथ होंगे। जेडीयू, आरजेडी और भाजपा में से जब भी दो दल साथ आए हैं, वे चुनाव में भारी पड़े हैं।
नीतीश कुमार ने हाल ही में जातीय सर्वेक्षण के जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक़ अति पिछड़ों की संख्या 36.01 प्रतिशत और पिछड़ों की संख्या 27.13 प्रतिशत है। अति पिछड़ों में कपरिया, कानू, कलंदर, कोछ, खंगर, खटीक, वट, काडर, लुहार, कहार, कुम्हार, नाई, तेली (हिन्दू मुस्लिम दोनों) आदि 25 जातियां आती हैं। जबकि पिछड़ा वर्ग में यादव, कुर्मी, कुशवाहा, कोईरी, भाट, भट, ब्रह्मभट्ट, कागजी, कोस्टा आदि जातियां आती हैं। इसके अलावा सुरजापूरी मुस्लिम और मलिक मुस्लिम भी पिछड़ी जातियों में शामिल हैं।
पिछड़ों और अति पिछड़ों को मिला कर 63 प्रतिशत बनता है। इसलिए बिहार में चुनाव जीतने के लिए पिछड़े वर्ग में गोलबंदी जरूरी है। 1967 में जनसंघ ने अति पिछड़ी जाति के कर्पूरी ठाकुर को उप मुख्यमंत्री बनवा कर अति पिछड़ों में अपना आधार बनाने की शुरुआत कर दी थी। 1970 में जनसंघ विधायकों और 1977 में जनता पार्टी की सरकार में पूर्व जनसंघियों के समर्थन से ही कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने थे, इसलिए यह जो धारणा है कि पिछड़े और अति पिछड़े एकतरफा लालू-नीतीश गठबंधन के साथ चले जाएंगे, यह इतना आसान नहीं है।
लालू और नीतीश के बावजूद अति पिछड़ों में भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव ज्यादा है। उस आधार को और मजबूत करने के लिए 23 जनवरी को मोदी सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न सम्मान का एलान करके लालू नीतीश की जातीय राजनीति का जवाब उन्हीं की भाषा में दे दिया है।
वैसे भी अति पिछड़ी जातियां अपेक्षाकृत भाजपा के साथ रही हैं, 2014 का उदाहरण लें, जब जेडीयू, भाजपा और आरजेडी ने अलग अलग चुनाव लड़ा था, आरजेडी को 49 प्रतिशत, भाजपा को 21 प्रतिशत और जेडीयू को सिर्फ 14 प्रतिशत पिछड़ों ने वोट किया था। दूसरी तरफ अति पिछड़ों ने आरजेडी को सिर्फ 10 प्रतिशत और जेडीयू को 18 प्रतिशत वोट किया था, जबकि भाजपा को 52 प्रतिशत अति पिछड़ों ने वोट किया था।
वहीं 2019 में जब जेडीयू और भाजपा का गठबंधन था तो भाजपा-जेडीयू गठबंधन को 42 प्रतिशत पिछड़ों और 75 प्रतिशत अति पिछड़ों ने वोट किया। जबकि कांग्रेस और आरजेडी को 41 प्रतिशत पिछड़ों और सिर्फ 14 प्रतिशत अति पिछड़ों ने वोट किया। अब आप दूसरी तरफ आरजेडी और जेडीयू के गठबंधन को देखिए, 2015 के विधानसभा चुनावों में जब इन दोनों दलों का गठबंधन हुआ तब इस गठबंधन को पिछड़ों का 63 और अति पिछड़ों का 35 प्रतिशत वोट मिला।
इस चुनाव में भी अति पिछड़ों में भाजपा का प्रभाव ज्यादा था, उसे पिछड़ों का सिर्फ 16 प्रतिशत, लेकिन अति पिछड़ों का तब भी 42 प्रतिशत वोट मिला था। अब फिर फिलहाल 2015 वाली स्थिति है, लेकिन भाजपा अगर 2019 की तरह अति पिछड़ों का 75 प्रतिशत वोट बनाए रखने में कामयाब हो जाती है, तो स्थिति पलट जाएगी। अति पिछड़ों में अपनी स्थिति को और मजबूत करने के लिए कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर नरेंद्र मोदी ने लालू नीतीश की जातीय राजनीति में बड़ी घुसपैठ कर दी है। जिससे लालू और नीतीश दोनों ही घबराए हुए हैं।
बिहार के जननायक कर्पूरी ठाकुर दोनों बार भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ की मदद से ही मुख्यमंत्री बने थे। जनसंघ की मदद से चल रही कर्पूरी सरकार ने ही मंडल आयोग की सिफारिशों से 12 साल पहले बिहार में पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू कर दिया था। उनका आरक्षण फार्मूला भारतीय जनता पार्टी के आरक्षण के मौजूदा फार्मूले पर ही आधारित था।
कर्पूरी फार्मूले में पिछड़ों, अति पिछड़ों और सामान्य वर्ग के आर्थिक तौर पर कमजोर के तीन वर्ग बनाकर अलग अलग आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। अब भले ही लालू यादव और उनकी पार्टी कर्पूरी ठाकुर की माला जपती दिखाई देती है, लेकिन लालू यादव कर्पूरी ठाकुर को कपटी ठाकुर कहा करते थे। वह भी इसलिए क्योंकि कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण फार्मूले में यादव क्रीमी लेयर में आ गए थे, जिन्हें कर्पूरी ठाकुर ने आरक्षण से वंचित किया था।
अपनी आलोचना पर कर्पूरी ठाकुर ने कहा था कि अगर वह यादव होते, तो उनकी आलोचना नहीं होती। अब जब मोदी सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का एलान किया है, तो लालू यादव ने इसे चुनावी हथकंडा कहा है, जबकि नीतीश कुमार ने स्वागत करते हुए मोदी का आभार जताया है।
इस मौके पर नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर की तारीफ़ करते हुए कहा कि उन्होंने परिवारवाद की राजनीति नहीं की, कर्पूरी ठाकुर के देहांत के बाद नीतीश उनके बेटे रामनाथ ठाकुर को राजनीति में लाए, जो अब जेडीयू के सांसद और महामंत्री हैं। वह आगे कहते हैं कि कर्पूरी ठाकुर की तरह उन्होंने भी परिवारवाद की राजनीति नहीं की, उनके परिवार का कोई सदस्य भी राजनीति में नहीं है।
इससे साफ़ है कि उन्होंने परिवारवाद की राजनीति पर मोदी की लाईन अपनाते हुए गांधी परिवार और लालू परिवार, मुलायम परिवार, उद्धव परिवार और करुणानिधी परिवार की आलोचना की है, ये सभी दल इंडी एलायंस का हिस्सा है। नीतीश कुमार के इस बयान के बाद उनकी फिर से एनडीए आने की कोशिशों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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