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Illicit Liquor in Bihar: जो बेचेगा वह राज करेगा, जो पीएगा वह मरेगा

अप्रैल, 2016 में बिहार सरकार ने राज्य में शराब की बिक्री और खपत पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। बावजूद इसके छपरा जैसी घटनाओं से संकेत मिलता है कि नीतीश सरकार अवैध और नकली शराब की बिक्री को रोकने में सक्षम नहीं है।

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Illicit Liquor in Bihar: बिहार में शराब की बिक्री पर पाबंदी के बावजूद जहरीली शराब पीकर 100 से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाए, वह प्रदेश में शासन की असफलता का स्पष्ट प्रमाण है। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि जो पीएगा, वह मरेगा। यह बयान देकर वह किसे बचाना चाह रहे हैं? यह सवाल इसलिए जरूरी है, क्योंकि बिना राजनीतिक संरक्षण के सरकारी पाबंदी में इस तरह शराब बेचने का साहस कौन कर सकता है? क्या इसी साहस का परिणाम है कि जहरीली शराब से 100 से अधिक लोग मर गए लेकिन बिहार पुलिस पता नहीं लगा पाई कि जहरीली शराब कौन बना रहा था? बिहार में हुई इस त्रासदी के पीछे कौन लोग शामिल हैं?

जहरीली शराब से हुई मौतों का संज्ञान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी लिया है। आयोग ने ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने अपनी स्वयं की एक जांच टीम बनाई है। मानवाधिकार आयोग की जांच की बात सामने आते ही संसद के दोनों सदनों में विपक्ष सक्रिय हो गया। बुधवार को राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान तृणमूल कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों के सदस्य विरोध करते हुए सदन से बाहर चले गए। उनका कहना था कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) जांच के लिए सिर्फ विपक्ष शासित राज्यों का दौरा क्यों करता है? दूसरी ओर लोकसभा में मुंगेर से जनता दल यूनाइटेड के सांसद राजीव रंजन सिंह ने सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बिहार सरकार को सूचित किया है कि छपरा में जहरीली शराब से हुई मौतों की जांच उनकी ओर से की जाएगी। मानवाधिकार आयोग इसमें कैसे आया?

जबकि आयोग का कहना है कि वह जानने के लिए चिंतित है कि इन पीड़ितों को कहां और किस प्रकार का चिकित्सा उपचार प्रदान किया जा रहा है। एनएचआरसी टीम घटनास्थल का दौरा कर आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश करेगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जिन लोगों की मौत हुई है, उनमें से ज्यादातर गरीब परिवारों से आते हैं और शायद निजी अस्पतालों में महंगा इलाज नहीं करा सकते। इसलिए अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जहां कहीं भी उपलब्ध हो, बिहार सरकार द्वारा उन्हें अच्छा उपचार उपलब्ध कराए।

मानवाधिकार आयोग की दो टीमों ने बिहार का दौरा किया। पहली दस सदस्यीय टीम आयोग के सदस्य राजीव जैन के साथ आई और इन्होंने छपरा सदर अस्पताल जाकर घटना के विभिन्न पहलुओं पर अधिकारियों से बातचीत की। आयोग के डीजी मनोज कुमार यादव के नेतृत्व में एक दूसरी टीम भी पटना पहुंची। इस टीम में 2 सदस्य शामिल हैं। ये टीम छपरा और सिवान में बीमार मरीजों से बात करेगी।

आयोग के सदस्यों के बिहार आने पर बिहार सरकार में जिस तरह की बेचैनी दिखाई पड़ी, उसे देखकर यह अनुमान ही लगाया जा सकता है कि ऐसा कुछ है, जिसे सरकार छुपाना चाहती है। उसे डर है कि आयोग की जांच में वे बातें सबके सामने ना आ जाएं।

यह बात स्थानीय लोगों के हवाले से सामने आई है कि जिस जहरीली स्पिरिट से शराब बनाई गई वह मशरक थाने में ही रखी हुई थी, जिसे थाने के कर्मचारियों से ही कच्ची शराब बनाने वालों ने खरीदा था। कानून के अनुसार जप्त की गई स्पिरिट को नष्ट कर देने का आदेश है। अब आरोप है कि थाने में जप्त करके रखी गई ड्रमों में से एक ड्रम स्पिरिट को थाने वालों ने ही बेच दिया था। उसी स्पिरिट से अवैध शराब कारोबारियों ने जहरीली शराब बनाई, जिसके पीने से लोगों की मौत हुई। थाना प्रभारी द्वारा इस बात को झूठ बताया जा रहा है लेकिन इतनी बड़ी संख्या में स्पिरिट भरे ड्रम नष्ट क्यों नहीं किए गए और कई ड्रमों के ढक्कन क्यों गायब है और कई ड्रमों में स्पिरिट कम क्यों हो गई? जैसे सवालों का जवाब थाने की तरफ से नहीं दिया गया।

जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ के आदेश पर बिहार सरकार ने अमल किया होता तो मसरख थाने पर लग रहे आरोपों की जांच में सुविधा होती। पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि प्रत्येक थाने में प्रवेश और निकासी के स्थान, मुख्य प्रवेश द्वार, हवालात, सभी गलियारों, लॉबी, स्वागत कक्ष क्षेत्र और हवालात कक्ष के बाहर के क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य रूप से लगे हों। क्या बिहार के थानों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो रहा है?

शराब के कई हजार करोड़ के अवैध कारोबार के मामले में जब भी गिरफ्तारी होती है तो हर बार सप्लायर और डिलीवरी बॉय जैसे सबसे निचले पायदान के लोगों को गिरफ्तार कर औपचारिकता पूरी की जाती है। जिस कुणाल सिंह का नाम एक बार फिर इस बार शराब कांड में आ रहा है, वह शराब का पुराना सप्लायर है। यदि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इतनी सख्ती के बाद भी कोई व्यक्ति बिहार के अंदर लंबे समय से शराब की सप्लाई के काम में जमा हुआ है, जिसकी पहचान क्षेत्र में शराब के सप्लायर के तौर पर है तो इसका साफ मतलब है कि उसे किसी का संरक्षण प्राप्त है। यदि संरक्षण ना होता तो पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे निर्बाध रूप से कोई कैसे अपना गैर कानूनी कारोबार चला सकता है?

बिहार में यह भी आश्चर्यजनक है कि पिछले साढे छह साल की शराबबंदी में शराब का एक भी बड़ा माफिया गिरफ्तार नहीं हुआ। चार डिलीवरी बॉय पकड़े जाते हैं और खबर बनती है कि अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। जिनके संरक्षण में यह सारा काम चल रहा है, पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंचती।

शराब माफियाओं को मिला राजनीतिक संरक्षण और इस नेटवर्क में पुलिस की हिस्सेदारी भी एक वजह है, जिसकी वजह से अपराधियों के बीच शासन और प्रशासन का डर कम हुआ है। रामनगर (पश्चिम चंपारण) के धनगर टोली इलाके में जहरीली शराब की तलाश में आबकारी विभाग की एक टीम पुलिसकर्मियों के साथ पहुंची थी। लेकिन इस दौरान ग्रामीणों ने टीम पर हमला कर दिया, जिसमे 2 से 3 पुलिसकर्मी घायल हो गए। साथ ही टीम की गाड़ियां भी क्षतिग्रस्त हो गई। यह हमला शराब माफियाओं के बढ़ते मनोबल की तरफ संकेत था या फिर पुलिस बल से समाज के उठते विश्वास का प्रतीक, यह बात तो जांच से सामने आएगी लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि हमला करने वालों में महिलाएं भी शामिल थी और उन्होंने जांच टीम पर पत्थर फेंके और रॉड से भी हमला किया।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथ से जनता की नब्ज छूट ही रही थी। अब उनका अपने नेताओं, शासन और प्रशासन पर भी पहले जैसा नियंत्रण नहीं रहा। बिहार में चल रहे ताजा घटनाक्रम से यही बात सामने आई है। बिहार में साढ़े छह साल पहले लिया गया शराबबंदी का निर्णय स्वागतयोग्य कदम था लेकिन जब उनकी पुलिस और पार्टी के नेता ही शराब के कारोबार में कमीशन एजेन्ट की भूमिका में हैं फिर वे शराब की अवैध बिक्री को कैसे रोक पाएंगे?

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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