Bharat or India: गुलामी का चिन्ह है इंडिया नाम

जी-20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान में राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए रात्रि भोज के निमंत्रण से बवाल खड़ा हो गया है| कांग्रेस ने इस निमंत्रण की भाषा पर कड़ी आपत्ति जताई है| आपत्ति यह है कि निमंत्रण पत्र में अंग्रेजी में प्रेसिडेंट आफ भारत यानि भारत की राष्ट्रपति लिखा है, जबकि अमूमन इससे पहले प्रेसिडेंट आफ इंडिया लिखा होता था|

कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश को लगता है कि मोदी सरकार इंडी एलायंस से डर कर देश का नाम बदलना चाहती है, क्योंकि विपक्ष अपने एलायंस को इंडिया एलायंस कहता है, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी डरे हुए हैं| लेकिन सच यह है कि यह विचार लंबे समय से चल रहा था|

Bharat or India: The name India is a symbol of slavery

इंडी एलायंस बनने से दो महीने पहले उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने संसद के मानसून सत्र में 15 जून को राज्यसभा में यह प्रस्ताव पेश किया था कि देश का नाम सिर्फ भारत होना चाहिए| उन्होंने सदन में कहा था कि इंडिया नाम औपनिवेशक गुलामी का प्रतीक है, इसे हटाया जाना चाहिए|

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से कहा था कि अमृतकाल में गुलामी की मानसिकता और उसके प्रतीकों से मुक्ति पाना जरूरी है| बाद में जब इंडी एलायंस ने अपना नाम इंडिया के नाम से रखा तो प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा संसदीय दल की बैठक में कहा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अपने नाम में इंडिया लगाया हुआ था, आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने भी अपने नाम के आगे इंडिया लगाया हुआ है और प्रतिबंधित आतंकी संगठन ने पीएफआई ने भी अपने नाम में इंडिया लगाया हुआ है|

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राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी पिछले दिनों कहा था कि इंडिया की बजाए भारत शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए| भाजपा सांसद नरेश बंसल की ओर से राज्यसभा में प्रस्ताव रखे जाने और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद विपक्षी दलों ने इसे आरएसएस का एजेंडा कहना शुरू कर दिया था|

अब भाजपा के सांसद हरनाथ सिंह ने मांग कर दी है कि संविधान में संशोधन करके भारत का नाम सिर्फ भारत ही किया जाना चाहिए| संविधान के पहले अनुच्छेद में देश का नाम लिखा है, इंडिया देट इज भारत, यानि इस देश का नाम तो भारत है, लेकिन इसे इंडिया कहा जाता है| असल में भारतवर्ष इस देश का प्राचीन नाम है, जिसका उल्लेख वेदों और उपनिषदों में भी मिलता है|

इंडिया नाम यूनानियों ने दिया था, हिन्दुस्तान नाम मुगलों ने दिया था| संविधान सभा में इस मुद्दे पर 18 सितंबर 1949 में बहस हुई थी| संविधान के पहले अनुच्छेद में लिखा था इंडिया यानि भारत जो राज्यों का संघ होगा| इस पर हरी विष्णु कामत ने संशोधन प्रस्ताव रखा था, उन्होंने कहा कि देश भर से जो नाम सुझाए जा रहे हैं, वे भारत, हिन्दुस्तान, हिन्द, भारतभूमि और भारतवर्ष हैं, इन पर विचार किया जाना चाहिए| उन्होंने कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि नए नामकरण की जरूरत नहीं देश को इंडिया तो कहा ही जाता है, लेकिन जो लोग भारत, भारतवर्ष या भारतभूमि का सुझाव दे रहे हैं, उनका तर्क है कि यह इस धरती का सबसे पहला नाम है|

डाक्टर आम्बेडकर इसे समय की बर्बादी कह कर विषय को टालना चाहते थे, इस पर आम्बेडकर और कामत में तू तू मैं मैं भी हुई| लेकिन कामत ने देश का नाम भारत रखने का प्रस्ताव रख दिया था| इस प्रस्ताव पर लंबी बहस हुई, जिसमें कमलापति त्रिपाठी, सेठ गोविन्द दास, श्रीराम सहाय, हरगोविंद पन्त ने भी हिस्सा लिया, सभी का तर्क था कि इंडिया को हटा कर सिर्फ भारत किया जाए| लेकिन जवाहर लाल नेहरू और डाक्टर आम्बेडकर अपने प्रारूप पर ही अड़े थे|

संविधान सभा में भारत नाम पेश करने वालों के तर्क थे कि इंडिया विदेशियों का दिया हुआ नाम है जबकि प्राचीनकाल में भारतभूमि के अलग अलग नाम रहे हैं, जैसे जम्बूद्वीप, भारतखंडे, हिमवर्ष, अजनाभवर्ष, भारतवर्ष और आर्यवर्त, लेकिन भारत ही प्रचलित नाम था| इतिहासकारों के मुताबिक़ ईसा से करीब ढाई हजार साल पहले कौरवों पांडवों के बीच हुए युद्ध को महाभारत कहा गया था| इस युद्ध में भारत की भौगोलिक सीमा में आने वाले लगभग सभी साम्राज्यों ने हिस्सा लिया था, इसलिए इसे महाभारत कहा गया था| यानि भारत इस देश का कम से कम पांच हजार साल पुराना नाम तो है ही|

जब संविधानसभा में सहमति नहीं बन रही थी, तब कमलापति त्रिपाठी ने सुझाव दिया कि देश का नाम इंडिया अर्थात भारत रखा गया, लेकिन इसे भारत अर्थात इंडिया कर दिया जाए| इस पर वोटिंग हुई, कई और नामों पर भी वोटिंग हुई, लेकिन दक्षिण भारतीय सदस्यों ने अन्य सभी नामों पर आपत्ति की थी, इसलिए वोटिंग में सभी प्रस्ताव गिर गए थे|

आज़ादी के बाद अनेकों बार यह मांग उठती रही है कि एक नाम किया जाए, किसी देश के दो नाम कैसे लिखे जा सकते हैं| नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से इस तर्क को बढावा दिया| उन्होंने प्रधानमंत्री के विमान में लिखे इंडिया की जगह पर पहले भारत लिखवा कर पीछे इंडिया लिखवा दिया था| वह लगातार गुलामी के चिन्ह खत्म करने की वकालत करते रहते हैं। इसी लिए इंडिया गेट के पास बनी केनोपी, जिसमें पहले जार्ज पंचम की मूर्ति लगी थी, उसमें सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति लगवा दी थी|

उन्होंने गुलामी के चिन्ह मिटाने के लिए अमृतकाल में भारत की नई संसद का निर्माण करवाया, विपक्ष ने नई संसद के उद्घाटन का भी बहिष्कार किया था| इंडिया को हटा कर देश का नाम सिर्फ भारत करने की यह मांग नई नहीं है| तीन साल पहले 2020 में इस संबंध में सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गई थी| जिसमें कहा गया था कि सुप्रीमकोर्ट भारत सरकार को अनुच्छेद एक में संशोधन करके देश का नाम सिर्फ भारत करने का निर्देश दे।

लेकिन तत्कालीन चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि संविधान में पहले से ही भारत नाम का उल्लेख है| हालांकि कोर्ट ने तब यह भी कहा था कि याचिका को संबंधित मंत्रालय को भेजा जाना चाहिए और याचिकाकर्ता संबंधित मंत्रालय से अपनी मांग रख सकते हैं|

पिछले दशकों में देश भर के कई शहरों और राज्यों के नाम भी बदले गए हैं| लेकिन देश के नाम से इंडिया हटाना संभव नहीं है, क्योंकि इसके लिए संविधान संशोधन करना पड़ेगा। मोदी सरकार के पास राज्यसभा में मुश्किल से बहुमत का जुगाड़ है, इसलिए मोदी सरकार इस मुद्दे को चुनावी एजेंडे के रूप में इस्तेमाल करने के लिए संसद के विशेष सत्र में रख सकती है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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