Rahul Gandhi Image: अगर यह धर्मयुद्ध है, तो कौरव कौन और पांडव कौन?

राहुल गांधी ने अपनी पदयात्रा से यह तो साबित किया है कि वह नरेंद्र मोदी के खिलाफ संघर्ष में सबसे आगे हैं। लेकिन मोदी का मुकाबला करने के लिए अभी उन्हें बहुत लंबा सफर तय करना है।

Bharat jodo yatra Will Rahul Gandhi be able to change his image by talking about Kauravas Pandavas?

Rahul Gandhi Image: राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के अंतिम पडाव पर हैं| सिर्फ 15 दिन का सफर बाकी है| 20 जनवरी को वह जम्मू पहुंचेंगे और 26 जनवरी को श्रीनगर में झंडा फहरा कर वापस दिल्ली लौट आयेंगे। कांग्रेस अत्यधिक उत्साहित है कि जिस मकसद से यात्रा शुरू करवाई गई थी, राहुल ने उसमें सफलता हासिल की है| वह कुकरमुत्तों की तरह उग रहे विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों को पछाड़ चुके हैं|

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कभी राहुल गांधी को पूरी तरह खारिज कर चुके शरद पवार ने उनकी तारीफ़ के पुल बांधने शुरू कर दिए हैं| राहुल गांधी को कोई महत्व नहीं देने वाली ममता बनर्जी ने अपने सांसद शत्रुघ्न सिन्हा से राहुल गांधी की तारीफ़ में बयान दिलवा दिया है| नीतीश कुमार ने कह दिया है कि अगर राहुल के नाम पर विपक्ष में सहमति होती है, तो वह भी सहमत हैं| कम से कम विपक्ष की राजनीति में यह सब राहुल गांधी की यात्रा की सफलता के उदाहरण हैं|

राहुल गांधी की इस यात्रा के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में अत्याधिक उत्साह है, उन्हें लगता है कि राहुल गांधी अपनी पप्पू की छवि तोड़ने में कामयाब रहे हैं| पप्पू की उनकी छवि टूटी या नहीं, इसका जिक्र बाद में करते हैं। यह सच है कि राहुल गांधी ने कांग्रेस को फिर से ज़िंदा करने की सफल कोशिश की है। कितना सफल हुए, यह तो चुनावों में ही पता चलेगा| लेकिन राहुल गांधी की यात्रा में वे लोग भी शामिल हुए, जिनका कांग्रेस से कोई सीधा ताल्लुक पहले कभी नहीं था| राहुल गांधी को देखने के लिए भीड़ भी खूब उमड़ी|

ट्विटर और टीवी चेनलों की डिबेट से राजनीति करने, हवाई जहाज से उतर कर करोड़ों रूपए की गाड़ियों से रोड शो करने और और मीलों मील सड़क पर चलने में बहुत फर्क है| कांग्रेस इस हवा को बनाए रखना चाहती है, इसलिए अब दो महीने का "हाथ से हाथ जोड़ो" प्रोग्राम शुरू करने का एलान किया गया है| इन दो महीनों में कांग्रेस को ब्लाक स्तर पर सक्रिय किया जाएगा| इसके बाद अप्रेल से नई रूपरेखा बनेगी, क्योंकि 2024 का रास्ता अभी बहुत दूर है|

राहुल गांधी अभी हरियाणा में थे, तो उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान कई बार कौरवों और पांडवों का जिक्र किया| कांग्रेस को पांडव बताया, जो न्याय और धर्म के प्रतीक हैं और भाजपा, आरएसएस और मोदी को कौरव बताया जो अन्याय और अधर्म के प्रतीक हैं| कांग्रेस बार बार यही गलती करती है, वह समझ नहीं पा रही कि आरएसएस ने 1947 में विभाजन के समय लाखों हिन्दुओं की रक्षा और मदद की थी| देश के करोड़ों हिन्दुओं में आरएसएस के प्रति सम्मान है|

राहुल गांधी समझ नहीं पा रहे कि नरेंद्र मोदी हिन्दू ह्रदय सम्राट बन चुके हैं| कांग्रेस नेता उन्हें कभी रावण कहते हैं, कभी मौत का सौदागर कहते हैं, कभी खून की दलाली करने वाला, और अब कौरव कह दिया| कुरुक्षेत्र में पूजा करके राहुल ने हिन्दुओं के मन में जो साफ्ट कार्नर बनाया था, उसे अपनी जुबान से फिर धो दिया| मोदी के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब हिन्दुओं का मोदी से मोहभंग हो रहा हो| अभी तक नरेंद्र मोदी ने ऐसा कोई काम नहीं किया है कि हिन्दुओं का उनसे मोहभंग होता दिख रहा हो।

जहां तक विपक्ष का नेता बनने की बात है, तो राहुल गांधी विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बनने में जरुर कामयाब हुए हैं। कोई क्षेत्रीय नेता ऐसा नहीं है, जिसकी समूचे विपक्ष में स्वीकार्यता हो जाए| राहुल गांधी ने अपनी पदयात्रा से यह तो साबित किया है कि वह नरेंद्र मोदी के खिलाफ संघर्ष में सबसे आगे हैं| लेकिन नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने के लिए अभी उन्हें बहुत लंबा सफर तय करना है, वह भी खुद को पांडव और मोदी को कौरव कहने जैसी गलती के बिना|

पदयात्रा से लोकप्रियता हासिल करना अलग बात है और चुनाव अलग बात है| राहुल गांधी ने अपनी यात्रा में फिर से नोटबंदी और जीएसटी जैसे घिसेपिटे जो मुद्दे उठाए हैं, उन पर 2019 का चुनाव हो चुका है| या फिर उन्होंने आरएसएस, हिंदुत्व और वीर सावरकर के विरोध के जो मुद्दे उठाए हैं, वे कांग्रेस का वोटबैंक बढाने में सहायक नहीं हो सकते| हां, बेरोजगारी, महंगाई की जो बात राहुल कर रहे हैं, ये मुद्दे देश के हर नागरिक के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं|

बेरोजगारी और महंगाई से लोग त्रस्त हैं, लेकिन भारत में वोट अभी भी समीकरणों पर होता है| देश की राजनीति में समीकरण अभी भी धर्म और जाति का है| चुनावों से पहले आप जितने भी नीतियों के मुद्दे उठा लीजिए, मोदी की नीतियों की जितनी चाहे आलोचना कर लीजिए, विकास पर सवाल उठा लीजिए, कितना भी अडानी अंबानी कर लीजिए, आखिर जब टिकटों का बंटवारा होगा, और जब वोटिंग होगी तो वह जाति और धर्म के आधार पर ही होगी|

राहुल गांधी इन दोनों ही मुद्दों पर मात खा रहे हैं, न उनके पास कहीं जातीय आधार है, न धर्म का आधार है| मोदी खुद पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं, पिछड़ी जातियां दावा कर रही हैं कि ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत से ज्यादा है| और मोदी खुद ओबीसी होने के साथ साथ बिना लागलपेट हिंदुत्व की राजनीति भी कर रहे हैं| चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस को नरेंद्र मोदी से बड़ी लकीर खींचनी होगी, जो कहीं दूर दूर तक दिखाई नहीं देती|

आखिर में राहुल गांधी की उस पप्पू वाली छवि पर कुछ बातें कर लेते हैं, जिस पर उन्होंने खुद कहा है कि उन्होंने अपनी भारत जोड़ो यात्रा में उस राहुल गांधी को मार दिया है| हालांकि यह किसी हद तक सच है, लेकिन पूरी तरह सच यह भी नहीं है। जैसे हरियाणा में ही उन्होंने दो-तीन ऐसी बातें कही हैं, जो उनकी छवि को जस का तस बनाए रख रही है|

उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि उनकी यात्रा के दौरान अगर कोई गिरा तो साथ चलने वालों ने यह नहीं पूछा कि वह हिन्दू है, सिख है, मुस्लिम है या ईसाई है, हिन्दुस्तान ने उसे उठाया, पानी पिलाया, अगर पट्टी की जरूरत थी, तो पट्टी की और यात्रा में आगे लेकर चले| भाईचारे का यह उदाहरण बहुत ही हास्यस्पद सा लगता है| यात्रा में जो लोग साथ चल रहे हैं, वे किसी गिरे हुए को सड़क पर ही छोड़ कर तो आगे नहीं बढ़ सकते| क्या राहुल गांधी खुद अपने सहयात्री को सड़क पर गिरा छोड़कर आगे बढ़ सकते हैं|

हिन्दी में बोलते हुए राहुल सही शब्द का चुनाव नहीं कर पाते| उनके पास सही शब्दों का भी अभाव है| अगला हास्यस्पद उदाहरण देखिए, उन्होंने कहा कि आपने महाभारत पढ़ी है, पांडवों ने नोटबंदी की थी क्या, गलत जीएसटी लागू की थी क्या, क्या वे ऐसा करते| अब इस तरह के उदाहरण सिर्फ हास्य ही पैदा करते हैं।

वह कुरुक्षेत्र से होकर आगे बढ़ रहे थे, इसलिए रात को किसी ने उन्हें महाभारत की एक संक्षिप्त कहानी सुना दी होगी। लेकिन कहानी सुनते समय पांडव तो याद रहे, कौरव नाम ही भूल गए| उन्होंने कहा कि एक तरफ पांडव थे, दूसरी तरफ संगठन था|

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    यह क्या कम था कि राहुल ने यहाँ तक कह दिया कि पांडवों के साथ हर धर्म के लोग थे| अब लोग पूछेंगे कि क्या द्वापर युग में ईसाई और मुस्लिम थे, यह किस महाभारत में लिखा है| इस तरह की बातें करके राहुल अपनी छवि नहीं बदल सकते| यही राहुल और कांग्रेस की समस्या है।

    यह भी पढ़ें: Centre vs Regional Parties: संविधान से ऊपर क्षेत्रीय दलों की दादागीरी?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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