Banchhada Community: एक ऐसा समुदाय जिसे वेश्यावृत्ति को ही पेशा बनाना पड़ा
Banchhada Community: उस दिन नीमच से ट्रेन सुबह पांच बजे निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंच गई थी। सितम्बर की उस सुबह दिल्ली में हल्की-फुल्की बारिश हुई थी। स्टेशन से बाहर निकलने पर अच्छी चहल-पहल मिली। दुकानें खुल गई थी, हर आदमी वहां भागा जा रहा था, मानों किसी के पास वक्त ना हो। यह सब दिमाग में चल ही रहा था कि किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रख दिया। पीछे मुड़कर देखा तो एक ऑटो वाला था, 'चलना है क्या?' उसने सिर हिलाकर अपने ही अंदाज में पूछा था।

ऑटो वाले के इस सवाल से पुनः नीमच पहुंच गया। वापस एक दिन पहले, नीमच। वहां अपने डेरे के आसपास से गुजरने वाले हर एक शख्स से बांछड़ा समुदाय की युवतियां भी यही सवाल करती है, 'चलना है क्या?'
जैसे आज निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर आने वाले हर एक व्यक्ति से 'चलना है क्या' पूछने का लायसेन्स ऑटो वालों के पास होता है, उसी तरह बांछड़ा के डेरों में यह अधिकार युवतियों का होता है। यहां दिल्ली में ऑटो वालों से बात बनी तो उसके आटो में बैठना होता है और वहां नीमच में बांछड़ी के साथ बात बनी तो वहां भी 'बैठना' होता है।
बांछड़ा समाज पिछले कई दशकों से नीमच-मंदसौर (मध्य प्रदेश) में परंपरा के नाम पर यौनकर्म (सेक्सवर्क) पर जीवन यापन कर रहा है। इस समाज की लड़कियां यौनकर्मी बन जाती हैं। यहां लड़कियां बाहर से नहीं आती, ना बांछड़ा परिवार कोठा चलाता है।
यहां तो बेटियां परिवार में जन्म लेती हैं और परिवार में बड़ी होती हैं। जन्म लेने और बड़े होने के क्रम में परिवार की बेटियां कब यौनकर्मी बन जाती हैं, यह बेटियों को भी नहीं पता लेकिन यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
नीमच और मंदसौर में बांछड़ा समुदाय के दर्जनों मोहल्ले हैं और दर्जनों मोहल्लों में दर्जन-दर्जन भर घर। घरों से पुरूष नदारद, आप उन घरों में दिन में जाएं, चाहें रात में। परिवार में महिलाएं ही मिलेंगी।
बांछड़ा परिवारों को लगता है कि घर में किसी अन्य पुरुष को पाकर आने वाले अतिथि सहज नहीं रहते। जब उन्हें पता चलता है कि वह जिसके साथ बैठने जा रहा है, उसका पति बाहर खाट पर बीड़ी पी रहा है तो कौन सा अतिथि बांछड़ा के दरवाजे पर रुकेगा? वो मानते हैं 'अतिथि हमारे लिए देवता हैं। उनसे ही हमारा घर चलता है। हमारा पेट भरता है।'
भारत जैसे देश में जहां जीबी रोड (दिल्ली), कबाड़ी बाजार (मेरठ), सोनागाछी (कोलकाता), कमाठीपुरा (मुंबई) जैसे कई बड़े रेड लाइट इलाके हैं। उस देश में किसी का यौनकर्मी होना, कोई खबर नहीं है लेकिन बांछड़ा समुदाय की कहानी सामान्य यौनकर्मियों से अलग है।
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इसलिए सड़क के किनारे बसे बांछड़ाओं के गांव, उन गांवों में बसे बांछड़ा परिवार। उन परिवारों में बच्चे, मां, पापा, बुआ, दादी सारे रिश्ते मौजूद हैं। ऐसे रिश्ते भारत के किसी रेड इलाके में नहीं मिलते। रेड लाइट इलाकों में कोठे होते हैं। बांछड़ा के डेरे होते हैं।
इन परिवारों में बसने वाली महिलाओं की तीन श्रेणियां हैं। पहली जो यौनकर्मी हैं। दूसरी जो एक जमाने में यौनकर्मी थी और तीसरी जिन्हें आने वाले समय यौनकर्मी होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
बांछड़ा समाज से आने वाली पिंकी से सगरग्राम में मुलाकात हुई। पिंकी गुस्से में थी- "हमारे समाज के लोगों को ही बुरी नजर से क्यों देखा जाता है, जबकि बड़े शहरों में लड़कियां कॉल गर्ल बन रहीं हैं। उनकी कहानी कभी क्यों नहीं दिखाते? बड़े-बड़े शहरों में लड़कियां तरक्की और नौकरी के लिए सभी तरह के काम करने को तैयार हैं। फिर सारी बदनामी हमारे समाज की ही क्यों होती है? उन पर कोई कहानी क्यों नही बनाते आप लोग?"
पिंकी के गुस्से को समझा जा सकता है, पिंकी उन गिनती की बांछड़ा लड़कियों में है, जिसने यौनकर्मी होना स्वीकार नहीं किया। उसने कोटा (राजस्थान) के एक लड़के से शादी की। लेकिन बांछड़ा समाज का होना उसके लिए अभिशाप हो गया है। जो भी उसे मिलता है, उसे यौनकर्मी की नजर से ही देखता है। मानों वह सेक्स के लिए सहज उपलब्ध हो।
नीमच को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि बांछड़ा अंग्रेजों के समय में राजस्थान से नीमच लाए गए थे। उन दिनों जो अंग्रेज अपनी पत्नियों के साथ भारत नहीं आए थे, वे भारतीय महिलाओं का शारीरिक शोषण करते थे। इस स्थिति को देखकर स्थानीय राजा आहत हुए। उसके बाद ही राज्य में बांछड़ा परिवारों को लाने का निर्णय लिया गया।
बांछड़ाओं के आने के बाद स्थानीय महिलाओं के साथ अंग्रेजों की जोर जबरदस्ती बंद हुई। 1947 में अंग्रेज देश से चले गए, और बीस साल बाद 1967 में सीआरपीएफ नीमच में आ गई। नीमच सीआरपीएफ का पहला कैम्प बताया जाता है। उसके बाद बांछड़ा यहीं के होकर रह गए। वे कहीं नहीं गए।
मीडिया में जब-जब बांछड़ाओं को लेकर बड़ी खबर बनी, उसके तुरंत बाद उनके पुनर्वास की बात हुई। उन्हें सड़क के किनारे से हटाया गया और फिर जब खबर पुरानी हुई, सब लोग इन्हें भूल गए और यह फिर वापस वहीं सड़क के किनारे-किनारे आ बसे। यानी प्रशासनिक स्तर पर जब भी इस समाज को मुख्यधारा में लाने का प्रयास हुआ तो वह प्रशासनिक या सरकारी अक्षमता के कारण ही असफल हो गया। बांछड़ा समुदाय यौनकर्म के दलदल से बाहर ही नहीं निकल पाया।
समय के साथ बांछड़ा एक बात और समझ गए हैं कि मीडिया इनकी सगी नहीं है। चाहे-अनचाहे यह संदेश उन तक पहुंच गया है कि मीडिया से उन्हें किसी तरह का फायदा नहीं हो सकता। मीडिया वाले सिर्फ इन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए इनके बीच आते हैं। उसके बाद फिर एक दिन बांछड़ाओं की पंचायत में यह निर्णय हुआ कि कोई भी बांछड़ी किसी मीडिया के कैमरे के सामने नहीं आएगी।
लेकिन कुछ युवतियां बात करने के लिए तैयार हो जाती है। एक के बाद एक सप्ताह भर में अपनी यात्रा के दौरान बांछड़ाओं के दर्जन भर से अधिक मोहल्लो में जाना हुआ।
नया गांव की तरफ भी जाना हुआ। नया गांव माने राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा। वहीं सड़क के किनारे ट्रक ड्राइवरों को रिझाती एक लड़की नजर आई। वह धीरे-धीरे मेरी तरफ आई, बातचीत के लिए। इसी बातचीत में जाना उसका नाम करीना है।
इसी यात्रा में एक बांछड़ा डेरे में अफगानी सी लड़की पर नजर गई। बांछड़ा के डेरे में उनकी कद काठी से अलग अफगानी लड़की को देखकर चौंकना लाजमी था। स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि अब डेरों में बाहर की लड़कियां भी आकर रहने लगी हैं। उनकी थोड़ी कमाई हो जाती है लेकिन यह सब पहले नहीं होता था।
इस संबंध में एक बांछड़ी ने दूसरी बात बताई। उसने कहा - ''आया होगा कोई कश्मीरी और छोड़ गया होगा कोख में।'' उसी ने बताया- ''बच्चा किसी का हो, हम अपना लेते हैं। हम अपने और पराए का भेद नहीं करते। यदि बच्चा गर्भ में आ गया, लड़का हो या लड़की, कोई बांछड़ी उसे गिराती नहीं है। बच्चे को रोकने की हमारी सारी कोशिश गर्भ में आने से पहले की होती है।''
जैतपुरा के बाबूभाई बांछड़ा समाज से ही आते हैं। वे बातचीत में साबित करना चाहते थे कि बांछड़ा यौनकर्मियों का समुदाय होने के बावजूद दूसरे यौनकर्मियों की तरह नहीं है। वे बता रहे थे कि बांछड़ा समाज के लोग अपनी लड़की को कभी जबरन यौनकर्मी नहीं बनाते।
हर बांछड़ा परिवार एक लड़की को शादी के लिए बचाकर रखता है, उसे इस माहौल से दूर रखा जाता है। बाबू भाई का दावा यह भी है कि परंपरा के नाम पर बांछड़ाओं में जरूर यौनकर्म होता है लेकिन हम अपनी लड़की को बिना उसकी इच्छा के किसी के सामने नहीं परोसते।
इसी तरह बांछड़ाओं के पचासों किमी में पसरे डेरे हैं जहां आनेवालों में नेता, अफसर, आम आदमी सभी शामिल हैं। बांछड़ा समाज ने यौनकर्म को ही अपनी परंपरा मान लिया है और इससे बाहर के जीवन की कल्पना करना भी शायद छोड़ दिया है।
लेकिन यह समाज अपनी इच्छा से ऐसा नहीं बना। इसे ब्रिटिश हुकूमत द्वारा ऐसा बनने पर मजबूर किया गया। क्या अब स्वतंत्र भारत में इतने बड़े समुदाय को यौनकर्म के दलदल से बाहर नहीं निकाला जा सकता?
अगर किसी कुप्रथा का जन्म हो सकता है तो उसका अंत भी किया जा सकता है। उसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। उम्मीद करनी चाहिए कि शीघ्र ही बांछड़ा समाज में मजबूरी वश आई यह बुराई भी सदा के लिए समाप्त हो जाएगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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