Congress on Ram Mandir: राम मंदिर को लेकर उहापोह में क्यों हैं कांग्रेस?
Congress on Ram Mandir: इसमें कोई शक नहीं है कि बाइस जनवरी 2024 की तारीख देश के सांस्कृतिक क्षितिज पर नयी इबारत दर्ज करने जा रही है।

इसी आधार पर यह मानने से गुरेज नहीं है कि जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को वामपंथी इतिहासकार नकारते रहे हैं, अयोध्या में रामलला की मूर्ति की स्थापना के साथ वह मूर्त रूप लेने की ओर अग्रसर है।
इस पर भी संशय नहीं है कि अयोध्या में भगवान रामलला की मूर्ति की चिर प्रतीक्षित प्राण प्रतिष्ठा के बाद देश की राजनीति भी बदलने जा रही है। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी को इससे जुड़ी राजनीति को लेकर संशय है। राम मंदिर न्यास ने 22 जनवरी के ऐतिहासिक दिन के लिए कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी को निमंत्रित कर रखा है। लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अब तक फैसला नहीं ले पाया है कि उसे इस समारोह में शामिल होना चाहिए या उसे सिरे से नकार देना चाहिए।
अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने जो राजनीति शुरू की, शायद वही कारण है कि कांग्रेस ना तो राम मंदिर को स्वीकार कर पा रही है और न ही उसे खुलकर नकार पा रही है। राममंदिर का ताला खोलने के अलावा कांग्रेस की जितनी भी कोशिशें रही हैं, वे राम मंदिर के विरोध में रही हैं। अलबत्ता इस विरोध के लिए वह राजनीति को धर्म से अलग करने का तर्क देती रही है। लेकिन जब संदर्भ अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों को लेकर आता रहा है तो सेकुलरवाद के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय की मजहब आधारित राजनीति को तवज्जो देने से वह कभी नहीं हिचकी।
कांग्रेस ने आजादी के बाद अपने वोटबैंक का जो ताना-बाना विकसित किया, उससे वह अल्पसंख्यकों के थोक वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रही। केंद्रीय राजनीति में राष्ट्रीय मोर्चा और संयुक्त मोर्चा के उभार के पहले तक कांग्रेस ही अल्पसंख्यक वोटरों की पहली पसंद रही। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के उभार के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस के बजाय भाजपा से दो-दो हाथ करते नजर आए स्थानीय दलों मसलन समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का दामन थाम लिया।
राममंदिर आंदोलन के उभार के वक्त कांग्रेस उहापोह में रही। राष्ट्रीय दल होने के नाते उसे अल्पसंख्यक केंद्रित राजनीति की सीमा का भान था। इसीलिए वह राममंदिर के खिलाफ वैसा कड़क स्टैंड नहीं ले पाई, जैसा मजबूरी या मौके पर चौका मारने की नीयत से मुलायम और लालू ने लिया। इसलिए ये दोनों नेता अपने-अपने राज्यों में अल्पसंख्यकों के चहेते बन गए।
इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ। उसका पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक हाथ से निकल गया। झीने आवरण में जारी उसके अल्पसंख्यकवाद की पोल राममंदिर आंदोलन ने खोल दी तो उसका पारंपरिक सवर्ण वोट विशेषकर ब्राह्मण वोट बैंक भी साथ छोड़ गया। उन्हीं दिनों दलितों के नए रहनुमा भी उभर आए तो दलितों ने भी कांग्रेस को टा-टा बाय-बाय करने का मन बना लिया।
अव्वल तो कांग्रेस को उसी वक्त उहापोह से निकल कर मजबूत राजनीतिक रूख अख्तियार करना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस हमेशा आधे-अधूरे मन के साथ कभी अल्पसंख्यकवाद को मजबूत करने की ओर बढ़ती रही तो कभी सवर्णों को साधने की दिशा में आगे बढ़ी। उसके पास ठोस वोट बैंक बनाने को लेकर ना तो कोई ठोस योजना नजर आई, ना ही वह कभी मजबूत रुख ले पाई।
यह उहापोह राहुल की कांग्रेस में ज्यादा दिखा। कभी राहुल कुर्ते के उपर से जनेऊ पहनकर मंदिर-मंदिर माथा टेकते नजर आए तो कभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए बहुसंख्यक वोटरों के हितों को किनारे रखते गए। गुजरात के 2017 के विधानसभा चुनावों में मंदिर-मंदिर माथा टेकना हो या फिर कर्नाटक के 2018 के चुनावों में मंदिरों का दर्शन करना हो या फिर लोकसभा चुनाव के वक्त देश के कथित सेकुलर रूप को बचाने का दावा हो, राहुल वाली कांग्रेस हर बार उहापोह में नजर आई।
यही उहापोह रामलला के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा के वक्त भी दिख रहा है। इसकी मोटी वजह यह है कि कांग्रेस समझ नहीं पा रही है कि उसे राम का साथ देना चाहिए या नहीं। इसकी बड़ी वजह है कि बीते कर्नाटक चुनाव से कांग्रेस के पाले में मुस्लिम वोट बैंक थोक के भाव से लौट रहा है। इसका असर तेलंगाना में भी दिखा। कांग्रेस को यह भ्रम हो गया है कि उत्तर प्रदेश का नौ प्रतिशत और बिहार का 14 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता उसकी ओर लौट रहा है। कांग्रेस को लगता है कि असम का मुस्लिम वोटर भी उसी के पास लौटेगा।
हालांकि आनुपातिक रूप से सबसे ज्यादा मुस्लिम वोट बैंक की हिस्सेदारी वाले पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति खास मजबूत नजर नहीं आ रही। वहां के मुस्लिम वोटरों की पहली पसंद अब भी ममता बनर्जी ही हैं। कांग्रेस को उहापोह में रखने में राहुल और प्रियंका के वामपंथी सलाहकार मंडल की राय भी है। हिंदुत्ववादी राजनीति के संदर्भ से वामपंथी सोच को सदा से परहेज रहा है, हालांकि अल्पसंख्यक राजनीति को लेकर उसकी धर्म केंद्रित राजनीति के विरोध का विचार पता नहीं कहां तिरोहित हो जाता है।
राहुल और प्रियंका की वामपंथी सलाहकार मंडली भी इसी राय की है। इसलिए वह रामलला के विग्रह के प्राणप्रतिष्ठा समारोह से कांग्रेस को शायद दूर रहने की सलाह दे रही है। राममंदिर को लेकर अतीत में कांग्रेस और उसके कद्दावर नेताओं ने ऐसी गलतियां की हैं, जिनकी वजह से बहुसंख्यक वोटरों के बड़े हिस्से में नाराजगी रही। साल 2012 में जयराम रमेश यह कहने से नहीं हिचके थे कि रामंदिर से कहीं ज्यादा पवित्र शौचालय है। इन दिनों उनका यह बयान चर्चा में है और कांग्रेस को सफाई देनी पड़ रही है।
राममंदिर मुद्दे को केंद्रीय राजनीति की धुरी बनते देख लगता है कि कांग्रेस में भी दुविधा बढ़ रही है। कांग्रेस का एक वर्ग सोच रहा है कि अयोध्या के प्राणप्रतिष्ठा समारोह में शामिल होना चाहिए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को राम मंदिर ट्रस्ट ने आमंत्रण नहीं भेजा है। इसे लेकर लगता है कि सिद्धारमैया को तकलीफ है। यही वजह है कि उनके एक चहेते विधायक होलालकेरे आंजनेय ने कहा है कि सिद्धारमैया खुद राम हैं। क्या हुआ कि उन्हें बुलावा नहीं मिला। वे अपने गांव के राममंदिर में जाकर भगवान राम की पूजा करेंगे। यह बात और है कि उनके इस बयान को लेकर सिद्धारमैया ने असहमति भी जताई है।
राजनीति में राम नाम की अहमियत को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी समझने लगे थे। शायद यही वजह है कि उन्होंने राम गमन पथ पर आने वाले छत्तीसगढ़ के इलाकों के पुनरूद्धार और वहां समारोह आदि करने की शुरूआत कर दी थी। इसके बावजूद बीते विधानसभा चुनावों में बहुसंख्यक वोटरों ने उनकी बजाय राम की सीधी राजनीति करने वाली भाजपा पर ही ज्यादा भरोसा किया।
वैसे अब कांग्रेस के कुछ बाहरी सलाहकार उसे सलाह देने लगे हैं कि अगर कांग्रेस को मुख्यधारा की राजनीति में बने रहना है तो रामंदिर की प्राणप्रतिष्ठा समारोह में शामिल होना चाहिए। यह सच है कि राममंदिर को लेकर उत्तर प्रदेश के एक कांग्रेसी मंत्री ने पिछली सदी के अस्सी के दशक में आवाज उठाई थी। अगर तभी से कांग्रेस राममंदिर को लेकर उहापोह की बजाय एक संतुलित रूख अख्तियर किए रहती तो किंचित अल्पसंख्यक वोट बैंक भले ही खिसकता, लेकिन बहुसंख्यक वोटरों के एक बड़े वर्ग की वह चहेती बनी रह सकती थी। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई और उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में अप्रासंगिक होती चली गई।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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