Assembly Elections: युवा और महिला मतदाताओं पर होगा जीत हार का दारोमदार

Assembly Elections: पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दलों के सियासी गणित में जोड़-घटाव स्वाभाविक है। लेकिन चुनाव आयोग के आंकड़ों पर भरोसा करें तो इन चुनावों में सबसे अहम भूमिका युवा मतदाताओं की होने जा रही है। माना जा रहा है कि जिन्होंने युवाओं को साध लिया, जीत उसके हाथ लगने की संभावना ज्यादा है। इसकी वजह है, इन राज्यों में नए वोटर बने कुल मतदाताओं की संख्या। पांचों राज्यों में पहली बार करीब साठ लाख वोटर मतदान करने वाले हैं। जाहिर है कि उनमें पहली बार वोट डालने का उत्साह है और वे अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग भी पूरे उत्साह से करेंगे।

जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें जनसंख्या के लिहाज सबसे बड़ा राज्य मध्य प्रदेश है। यहां सबसे ज्यादा 22 लाख 36 हजार नए वोटर बने हैं। राज्य में 230 विधानसभा सीटें हैं। इस लिहाज से देखें तो औसतन हर सीट पर करीब 9722 नए वोटर होंगे। लेकिन प्रति सीट नए वोटर के लिहाज से राजस्थान की स्थिति मध्य प्रदेश से बेहतर है। राजस्थान विधानसभा चुनावों में पहली बार करीब 22 लाख चार हजार वोटर वोट डालने जा रहे हैं। राज्य की 200 विधानसभा सीटों के लिहाज से देखें तो हर सीट पर करीब 11020 नए वोटर होंगे। इसी तरह छत्तीसगढ़ में सात लाख 23 हजार नए वोटर बने हैं। जिनका प्रति सीट औसत आठ हजार 33 हो रहा है। इसी तरह मिजोरम में 50 हजार 611 नए वोटर पहली बार वोट डालेंगे। यानी प्रति विधानसभा इनकी औसत संख्या करीब साढ़े बारह सौ है। इसी तरह तेलंगाना में 8 लाख 11 हजार नए वोटर बने हैं। जिनका प्रति विधानसभा औसत 6815 बैठता है।

Assembly Elections 2023: victory and defeat will be depend on youth and women voters

नए वोटरों के रूझान और उससे पड़ने वाले सियासी प्रभावों के पहले तीनों राज्यों में महिला वोटरों की संख्या पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि पिछले कुछ चुनावों से महिलाओं के मतदान का रूझान अपने परिवारों से कुछ अलग नजर आया है। पहले माना जाता रहा कि परिवार के पुरूष मुखिया के वैचारिक रूझान के हिसाब से ही महिलाएं भी वोट देती रही हैं। लेकिन अब महिलाएं अपनी पसंद के हिसाब से वोट डालने लगी हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी की जीत के पीछे महिलाओं और युवा वोटरों का साथ माना गया था।

छत्तीसगढ़ और मिजोरम ऐसे राज्य हैं, जहां पुरूष वोटरों की तुलना में महिला वोटरों की संख्या ज्यादा है। छत्तीसगढ़ के एक करोड़ एक लाख पुरूष वोटरों की तुलना में महिला वोटरों की संख्या एक करोड़ दो लाख है। जाहिर है कि हर सीट पर करीब 1111 महिला वोटर पुरूष वोटरों की बनिस्बत ज्यादा हैं। इसी तरह मिजोरम में करीब चार लाख 13 हजार पुरूष वोटरों की तुलना में महिला वोटरों की संख्या करीब चार लाख 39 हजार है। हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में ऐसी स्थिति नहीं है। राजस्थान में दो करोड़ 74 लाख वोटरों के सामने करीब दो करोड़ 52 लाख ही महिला वोटर हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश के दो करोड़ 88 लाख पुरूष वोटरों के अनुपात में महिला वोटरों की संख्या दो करोड़ 72 लाख ही है। इसी तरह तेलंगाना के करीब एक करोड़ 59 लाख पुरूष वोटरों की तुलना में महिला वोटरों की संख्या एक करोड़ 58 लाख है।

इन आंकड़ों पर फौरी तौर पर निगाह देने की जरूरत विगत के मतदान में में युवा और महिला वोटरों की भागीदारी का रूझान है। दोनों वर्गों के मतदाताओं ने जिसे चाहा, जीत उसे ही हासिल हुई। विगत के हिमाचल चुनावों में महिलाओं ने कांग्रेस को सबसे ज्यादा समर्थन दिया, जिसकी वजह से कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले कुल 36 हजार से कुछ ज्यादा मत मिले और वह जीत हासिल करने में कामयाब रही। कुछ ऐसी ही स्थिति कर्नाटक में भी रही। वहां के स्थानीय मुद्दों खासकर पांच गारंटी और महंगाई ने महिलाओं और युवाओं को ज्यादा लुभाया। इस लिहाज से देखें तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में भी महिला और युवा वोटर बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। शायद यही वजह है कि तीनों ही राज्यों के दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों की कोशिश महिलाओं और युवाओं को रिझाने की है। महिला सम्मान निधि और युवाओं को बेरोजगारी भत्ता आदि देने के जो दनादन वायदे किये जाते रहे, उसकी वजह यही रही।

साल 1989 के चुनावों के पहले तत्कालीन राजीव सरकार ने युवाओं के मतदान के लिए उम्र सीमा को 21 से घटाकर 18 साल कर दिया था। राजीव को उम्मीद थी कि उन्हें युवाओं का साथ मिलेगा। साल 2014 के ठीक पहले सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने के पीछे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की सोच सचिन को सम्मानित करने के साथ ही इसके जरिए युवाओं में पैठ बनाने की थी। यह बात और है कि दोनों ही बार कांग्रेस का दांव नाकाम रहा। चुनावी पंडित मानते हैं कि राजीव की हार में नए बने करोड़ों वोटरों ने बड़ी भूमिका निभाई थी।

हाल के वर्षों में महिलाओं ने जिस तरह खुलकर अपनी पसंद के हिसाब से मतदान करना और उम्मीदवार को चुनना शुरू किया है, वह अब छुपा नहीं है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में विपरीत हालात के बाद नीतीश को जीत मिली, उसकी बड़ी वजह महिलाओं का समर्थन रहा। इसी तरह 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में योगी सरकार को महिलाओं ने खूब समर्थन दिया। पश्चिम बंगाल में ममता के साथ महिला वोटर पूरे दम के साथ खड़ी रहीं। इन चुनावों के नतीजे सामने हैं।

इस लिहाज से देखें तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों पर बड़ा दारोमदार महिलाओं पर ही होगा। छत्तीसगढ़ में तो महिलाएं पुरूषों के मुकाबले ज्यादा ही हैं, इसलिए वहां तो यह साफ लग रहा है कि जिधर महिलाएं गईं, उसी के नेता के सिर ताज होगा। उनके वोटों में अगर युवाओं का साथ मिल गया तो उस दल के लिए वह सोने पर सुहागा ही होगा।

अभी इन तीनों राज्यों में चुनावी तापमान धीरे-धीरे बढ़ रहा है। उम्मीद की जा रही है कि तीनों राज्यों के मैदान में सियासी छक्का लगाने के लिए उतरने वाले दल अपने-अपने हिसाब से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की भरपूर कोशिश करेंगे, ताकि बाजी उनके ही हाथ लगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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